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संसद को और नकारा मत बनाओ सचिन!

सचिन तेंदुलकर अब राज्य सभा के सदस्य बनेंगे। राज्य सभा यानी संसद का उपरी सदन, जहां बिना चुनाव लड़े लोग घुस सकते हैं। माननीय सांसद बन के। अजीब लगा। अजीब इसलिए कि- संसद और सांसद का मतलब क्या है? लोकतांत्रिक अधिकारों के तहत देश की सेवा, समाज की सेवा- जी हाँ! लोग ऐसा ही कहते हैं और हम भी ऐसा ही मानते हैं। पर इस सेवा का रास्ता – यकीनन क्रिकेट के मैदान में चौके-छक्के लगा कर, बेशुमार दौलत इकट्ठा कर, न ही अपने बोली लगवाकर (आई.पी.एल. में) तय किया जाता है। जो लोग ज़मीन से जुड़ कर नेता बनते हैं – ज़रा उनसे पूछिए कि कठिन मेहनत, लोगों की गालियाँ, नाराज़गी झेलने के बाद भी उन्हें कितना अवसर मिलता है (ना विश्वास हो तो, उत्तर-प्रदेश के चुनाव में, कड़ी मेहनत कर हार का स्वाद चखने वाले राहुल गांधी जी से पूछिए)।

सचिन तेंदुलकर अब राज्य सभा के सदस्य बनेंगे। राज्य सभा यानी संसद का उपरी सदन, जहां बिना चुनाव लड़े लोग घुस सकते हैं। माननीय सांसद बन के। अजीब लगा। अजीब इसलिए कि- संसद और सांसद का मतलब क्या है? लोकतांत्रिक अधिकारों के तहत देश की सेवा, समाज की सेवा- जी हाँ! लोग ऐसा ही कहते हैं और हम भी ऐसा ही मानते हैं। पर इस सेवा का रास्ता – यकीनन क्रिकेट के मैदान में चौके-छक्के लगा कर, बेशुमार दौलत इकट्ठा कर, न ही अपने बोली लगवाकर (आई.पी.एल. में) तय किया जाता है। जो लोग ज़मीन से जुड़ कर नेता बनते हैं – ज़रा उनसे पूछिए कि कठिन मेहनत, लोगों की गालियाँ, नाराज़गी झेलने के बाद भी उन्हें कितना अवसर मिलता है (ना विश्वास हो तो, उत्तर-प्रदेश के चुनाव में, कड़ी मेहनत कर हार का स्वाद चखने वाले राहुल गांधी जी से पूछिए)।

लोकसभा की कठिन डगर और राज्यसभा की आसान राह, संसद के दो-विरोधाभासी चेहरों की मिसाल है। लता मंगेशकर, विजय माल्या, जया बच्चन जैसे ना जाने कितने लोग राज्यसभा में घुस आये और चले गए और फिर आये। जनता-जनार्दन के लिए क्या किये पता नहीं। ऐसे में सवाल ये उठता है कि -राज्यसभा के सदस्य होने के लिए कोई पात्रता (सेवा या ज़मीनी लगाव के सन्दर्भ में) तय है या नहीं? या फिर, जिसके पास पैसा है, नाम है और शोहरत है, वो पात्र है? सचिन के पास नाम-शोहरत और पैसा सब-कुछ है, क्या इसीलिए सचिन राज्यसभा के लायक हैं? या फिर सचिन ने अपनी करोड़ों के दौलत को (बिल गेट्स की तरह) समाज-सेवा के लिए न्योछावर किया है?

सचिन कोई टाटा-बिरला-अम्बानी तो हैं नहीं कि ५० करोड़ का बँगला खरीदने और करोड़ों का बैंक-बैलेंस रखने के बावजूद, करोड़ों रुपये आम आदमी के लिए खर्च कर रहे हैं? विजय माल्या और सचिन में (इस लिहाज़ से) क्या फर्क है? दोनों अपनी-अपनी उपलब्धियों को अपने-अपने निजी हित के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। दोनों समाज-सेवा के लिहाज़ से कोई बहुत जाना-पहचाना नाम नहीं हैं। ये बात इसलिए कहना ज़रूरी हो गया है – क्योंकि राज्यसभा को एकदम से नकारा बना देने पर आतुर हमारी राजनीतिक पार्टियों को सोचना पड़ेगा। ये भी बताना पड़ेगा कि – राज्यसभा का औचित्य क्या है? सिर्फ बिल पास कराने तक या कहीं ज़्यादा विस्तृत?

आज देश के कोने-कोने में में कई ऐसे लोग हैं, जो समाज के लोगों को बेहद राहत पहुंचा रहे हैं। कई ऐसे लोग हैं, जिन्होंने समाज में (लोगों के लिए) अविस्मरणीय योगदान दिया है। अपनी ज़िंदगी का एक-अच्छा खासा हिस्सा खर्च कर दिया, लोगों का जीवन संवारने में। पर गुमनामी का बादल कभी-कभार, किसी पुरस्कार के रूप में ही छंटा। ये लोग लोकतांत्रिक व्यवस्था और उस से जुड़े अधिकार के लायक कभी नहीं समझे गए। ऐसा क्यों हुआ, राजनीतिक पार्टियों को ये अब साफ़ करना चाहिए। आज लोगों को सचिन भले ही भगवान लग रहे हों, पर याद कीजिये २० साल पहले का दौर, जब कपिल-देव और सुनील गावस्कर भगवान थे। आज? सिर्फ कमेन्ट्री या विज्ञापन।

पर लाल-बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, सरदार पटेल, अटल बिहारी वाजपेयी जैसे लोग आज भी शिद्दत के साथ याद किये जाते है (बात गर देश-सेवा और राजनीति की हो तो)। इसके अलावा- विदेशों में सेलेब्रिटीज, अपनी कमाई हुई राशि का अच्छा-खासा हिस्सा, ज़रूरतमंद लोगों पर खर्च करते हैं। हिन्दुस्तान में, सेलेब्रिटीज, बैंकों में जमा करने और अपनी शानो-शौकत पर। सचिन के कोई १० ऐसे सामाजिक कार्य (विस्तृत पैमाने पर) ज़रूर जाना चाहूंगा, जो उन्हें राज्य-सभा का सदस्य बनाए जाने की पुरजोर वकालत करते हों। ध्यानचंद और सचिन जैसे लोग निःसंदेह भारत-रत्न के हक़दार हैं पर राज्य-सभा के हक़दार किस कूबत पर ये पता नहीं चल पा रहा।

हाल ही में झारखंड में एक एन.आर.आई. को भाजपा की तरफ से राज्यसभा का उम्मीदवार इस बिना पर बना दिया गया कि वो पैसे वाले हैं (हालांकि काफी छीछालेदर के बाद निरस्त कर दिया गया)। मतलब? पैसा-शोहरत और नाम – ये राज्यसभा का मेम्बर होने की काबिलियत बनती जा रही है। क्या राज्य-सभा इसीलिए बनी है? किसी का पैसे वाला, अच्छा खिलाड़ी या अच्छा एक्टर होना, राज्यसभा की सदस्यता का पैमाना नहीं बनना  चाहिए। क्या देश में ऐसे लोगों की कमी है जो समाज के लिए अच्छा काम कर रहे हैं? या उनकी कमी है – जो समाज के लिए अच्छा काम करने वालों को राज्यसभा का मेम्बरान होने के काबिल नहीं समझते? सचिन के प्रशसंकों (मैं भी उनमें से एक हूँ) को ये समझना पड़ेगा कि राज्यसभा एक सम्मानित सदन है और उसमें बैठे कई लोगों ने समाज सेवा के सन्दर्भ में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है और फिर इस सदन के हक़दार बने। यानी एक पैमाना जिसे सख्ती से लागू किया जाना चाहिए।

एक खिलाड़ी या कलाकार अच्छा समाज-सेवी हो सकता है और अच्छा नेता हो सकता है पर बिना समाज सेवा के राज्यसभा का मेवा खाने वाला…..? हम लोग नेताओं को गाली देते हैं कि वो जनता का काम ईमानदारी के साथ नहीं करते हैं। और हम से कई लोग खुश होते हैं जब सचिन जैसे लोग बिना जनता की सेवा किये नेता बन जाते हैं। अजीब है हम लोग। एक तरफ गाली और दूसरी तरफ धन-शोहरत और नाम का इस्तेमाल कर नेता बने लोगों का खैर-कदम। सचिन एक महान बल्लेबाज हैं। मैदान पर उनको बारम्बार सलाम। पर राज्यसभा में बिना कुछ किये घुस जाने पर बेहद अफ़सोस। अंत में इतना ही कहूंगा कि – हमारी संसद में घुसकर कई बाहुबलियों और अपराधियों ने इसे नकारा बनाने की कोशिश की है (ना विश्वास हो तो अन्ना से पूछिए), ऐसे में विजय माल्या, लता मंगेशकर और सचिन तेंदुलकर जैसे लोग इसे और नकारा न बनाएं। मान भी जाओ सचिन।

लेखक नीरज टेलीविजन पत्रकार हैं.

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