सतह पर नजर आया भाजपा के विरोध का सच

कल विधानसभा में नीतीश कुमार ने विश्वास का मत हासिल कर लिया। भाजपा ने अपनी दोस्ती निभाते हुए लड़ने के पहले ही हथियार डाल दिया। तारीफ़ करनी होगी राजद के 22 विधायकों और दो निर्दलीय दिलीप वर्मा और ज्योति रश्मि का जिन्होंने नीतीश कुमार को विधानसभा में औकात दिखा दी। औकात दिखाने का मतलब यह कि इन दोनों निर्दलीय विधायकों को खरीदने के लिए नीतीश कुमार ने एड़ी चोटी का जोर लगाया। तरह-तरह के प्रलोभन दिये मगर इन दोनों विधायकों ने अपना जमीर नहीं बेचा।

जमीर बेचकर का धद्म राजनीति करने वाली भाजपा ने अंततः अपनी दोस्ती निभाते हुए भविष्य का संकेत दे दिया। कल जैसे ही भाजपा ने विधानसभा के वाक आउट किया यह स्पष्ट हो गया कि नीतीश कुमार के लिए मैदान साफ़ हो गया है। नीतीश कुमार के पक्ष में 126 और विरोध में केवल 24 मत पड़े। 24 में 22 राजद के और 2 निर्दलीय विधायकों के मत शामिल रहे। जबकि भाजपा के पास 91 विधायक थे और अगर उसने ईमानदारी से प्रयास किया होता तो निश्चित तौर पर कल विधानसभा में एक नया इतिहास रचा जाता।

लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ऐसा नहीं होने के लिए एक कारण की आवश्यकता थी। इस आवश्यकता की औपचारिकता को निभाने के लिए भाजपा ने अपने ही दल के अति पिछड़ा वर्ग के एक विधायक व पूर्व मंत्री डा प्रेम कुमार को मोहरे के रुप में खड़ा किया। मतलब यह कि डा प्रेम कुमार के कारण भाजपा में टूट की संभावना थी। बताया जा रहा है कि डा कुमार ने विपक्ष के नेता के रुप में नंद किशोर यादव की ताजपोशी का विरोध किया था। भाजपा के वरिष्ठ नेता व विधानमंडल में विपक्ष के नेता सुशील कुमार मोदी ने साफ़ किया कि भाजपा डा कुमार के विरुद्ध पार्टी के संविधान के तहत कोई फ़ैसला लेगी।

सच अब किसी ने नहीं छुपा है। सब कुछ आइने की तरह साफ़ हो गया है। दरअसल बिहार में एनडीए का अलग होना न तो नरेंद्र मोदी का विरोध करना है और न ही देश में धर्म निरपेक्ष शक्तियों को एकजुट करना है। असल में बिहार में नीतीश कुमार का जनाधार घटता जा रहा था। वजह यह कि नरेंद्र मोदी के कारण अल्पसंख्यक उनके साथ जाने से कतरा रहे थे और इसका फ़ायदा राजद को मिल रहा था। दूसरा यह कि सवर्ण मतदाता भी अब एनडीए को अपना समर्थन देने से हिचक रहे थे। हिचक की वजह यह कि नीतीश और मोदी की सरकार में एक जाति विशेष का बोलबाला था। इसका परिणाम महाराजगंज में देखने को मिला। वहां जनता ने करीब डेढ लाख के अंतर से जदयू के कद्दावर मंत्री पी के शाही को हरा दिया।

ऐसी स्थिति में एनडीए यानी भाजपा और जदयू का गठजोड़ बना रहे इसके लिए दोनों के लिए तलाक का अभिनय करना जरुरी हो गया। भाजपा ने पहले ही तय कर रखा है कि वर्ष 2014 में वह किसके नेतृत्व में चुनाव लड़ने वाली है। नीतीश कुमार ने खुद को एनडीए से अलग कर मुसलमानों को अपने साथ लाने का प्रयास किया है। आने वाले समय में ये दोनों फ़िर से एक साथ सत्ता के मजे लेंगे, यह कल उस समय ही साबित हो गया जब भाजपा ने बिना विरोध किए विधानसभा में वाक आउट किया। इसका संकेत पहले ही जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव ने दे दिया है। अपने आका यानी लाल कृष्ण आड्वाणी को देश का अगला पीएम बनाने की शर्त पर उन्होंने पहले ही कह रखा है कि अगर भाजपा उन्हें नरेंद्र मोदी से अधिक तरजीह दे तब वे एनडीए में वापस लौट सकते हैं।

खैर अब नीतीश कुमार और भाजपा दोनों के पास पर्याप्त समय है कि दोनों अपने-अपने मिशन में जुट जायें। रही बात वामपंथी और कांग्रेस जनों की जिन्होंने नीतीश कुमार को अपना समर्थन दिया है, उनके बारे में तो यही कहा जा सकता है कि दोनों ने दीवार पर लिखी इबारत को पढा है। वे अब इसके सहारे अपनी राजनीति करेंगे। भांड़ में गयी बिहारवासियों के मुद्दे और धर्मनिरपेक्षता। वैसे भी कांग्रेस और भाजपा का साझा चरित्र रहा है। दोनों ब्राहम्णवादी पार्टियां हैं और दोनों ने दंगे करवाए। कांग्रेस के उपर सिक्ख दंगे और भागलपुर का दंगा करवाने का आरोप सिद्ध हो चुका है। अब धर्मनिरपेक्षता महज जनता को ठगने का औजार बन कर रह गया है।

बहरहाल सूबे में नयी राजनीति का आगाज हो चुका है और निशाने पर लालू हैं। मूल लड़ाई अभी भी लालू बनाम अन्य है। देखना है लालू अब अपने अलग-अलग मुखौटा धारण कर चुके दोनों विरोधियों पर किस तरह जीत दर्ज करते हैं। इतना अवश्य है कि बिहार की जनता ने राजनीति में हुए नये आगाज का अंजाम कल अपनी आंखों से देख लिया है और निश्चित तौर पर इसका फ़ायदा लालू को मिलेगा।

लेखक नवल किशोर कुमार बिहार में पत्रकार हैं तथा अपना बिहार ब्‍लॉग का संचालन करते हैं.

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