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सत्य हमेशा व्याख्याओं पर निर्भर करता है : प्रियदर्शन

आगरा। ‘कल्पतरु एक्सप्रेस’ के हर माह आयोजित होने वाले मीडिया विमर्श की सातवीं शृंखला के अंतर्गत एनडीटीवी-इंडिया के वरिष्ठ संपादक प्रियदर्शन ने कहा कि भाषा हमारे सरोकार से बनती है और सरोकार कोई भारी शब्द नहीं, यह चीजों और स्थितियों के साथ हमारे जुड़ाव से पैदा होता है। इसके बिना खबर बेजान और मृत हो जाती है। सरोकारी पत्रकारिता के लिए मूल शर्त है कि सामने का समाज आपको आंदोलित करता हो।

आगरा। ‘कल्पतरु एक्सप्रेस’ के हर माह आयोजित होने वाले मीडिया विमर्श की सातवीं शृंखला के अंतर्गत एनडीटीवी-इंडिया के वरिष्ठ संपादक प्रियदर्शन ने कहा कि भाषा हमारे सरोकार से बनती है और सरोकार कोई भारी शब्द नहीं, यह चीजों और स्थितियों के साथ हमारे जुड़ाव से पैदा होता है। इसके बिना खबर बेजान और मृत हो जाती है। सरोकारी पत्रकारिता के लिए मूल शर्त है कि सामने का समाज आपको आंदोलित करता हो।

उन्होंने कहा कि यह बुनियादी बात है कि आपके शब्दों को ताकत और अर्थ कहां से मिलता है। हर शब्द की एक छवि होती है। जैसे हम अगर कहते हैं कि बालकनी में लड़की उदास है, तो हर व्यक्ति के भीतर एक अलग लड़की होगी और उसकी उदासी भी अलग-अलग होगी। निर्मल वर्मा कहते थे कि गरीबी और दरिद्रता में अंतर है। गरीबी में स्वाभिमान है, जबकि दरिद्रता में एक ओछापन है। पत्रकारों से समय के नये विमर्शों से जुड़ने का आग्रह करते हुए उन्होंने पाउलो फ्रेरे का उदाहरण देते कहा कि पाउलो गरीब शब्द का उपयोग नहीं करना चाहते, वे इसकी जगह ‘उत्पीड़ित’ शब्द का प्रयोग करना चाहते हैं। यह शब्द व्यवस्था  के उत्पीड़न के बारे में बताता है।

शब्दों के निहितार्थों पर बात करते उन्होंने आगे कहा कि लोहिया शब्दों को मांजने की बात करते थे। भाषा की बहुत सी तहें होती हैं। हम मां से जिस आत्मीय भाषा में बात करते हैं उसी में पिता से नहीं करते। शब्द  हमारे संबंधों के स्तरों के बारे में बताते हैं। लिखने में सहज भाषा के प्रयोग पर बल देते उन्होंने कहा कि भाषा को सहज होना चाहिए, सरल नहीं। इस संदर्भ में उन्होेंने कविवर भवानी प्रसाद मिश्र की पंक्तियां उद्धृत कीं- जिस तरह हम बोलते हैं उस तरह तू लिख और इसके बाद हमसे बड़ा तू दिख। उन्होंने कहा कि हमारी भाषा में हमारे पुरखे बोलते हैं और कई बार हम उनके पूर्वाग्रहों को भी साथ लिए चलते हैं। जिनमें हमारे लैंगिक पूर्वाग्रह भी शामिल हैं। हमें उससे जूझना चाहिए।

कुछ उदाहरण देते उन्होंने कहा कि नये विमर्श में इस पर विचार हो रहा कि ‘हिस्ट्री’ शब्द, ‘ही स्टोरी’ ही क्यों  हो, वह शी स्टोरी भी तो हो सकती है। कैमरामैन की जगह ‘कैमरापर्सन’ क्यों ना कहा जाए। चर्चित कवि धूमिल ने कभी लिखा था- जिसकी पूंछ उठायी, मादा पाया। पर आज इस पर विचार हो रहा कि धूमिल का यह ढंग न्यायपूर्ण नहीं। संवेदना के अस्मितावादी दौर से हम बाहर आ चुके हैं। आज स्त्री पहली बार भाषा में समाज में अपने तौर-तरीकों के साथ आ रही है और आज उस पर ज्यादा हमले भी हो रहे हैं।

स्त्री पर लिखने के तरीके पर चोट करते उन्होंने कहा कि यह गलत तरीका है कि हम लिखते हैं कि उसकी इज्जत तार-तार कर दी या लूट ली। जिसने अपराध किया इज्जत उसकी जानी चाहिए। ऐसी खबरें लिखते समय हमें सतर्क और संवेदनशील होना चाहिए। ‘विधवा’ शब्द के इस्तेमाल का विरोध करते उन्होंने कहा कि सोनिया गांधी राजीव गांधी की विधवा नहीं पत्नी हैं। पुरुषों को अगर ‘विधुर’ नहीं बोलते तो स्त्री को क्यों बोलेंगे। बलात्कार शब्द पर भी विचार की मांग करते हुए उन्होंने कहा, पश्चिम में इसे अब रेप सर्वाइवर कह रहे हैं। उन्होंने कहा कि सत्य हमेशा व्याख्याओं पर निर्भर करता है। वह इस पर निर्भर करता है कि आप उसे कहां से देख रहे हैं।

भाषा में चले आ रहे पूर्वाग्रहों पर बोलते उन्होंने कहा कि देशभक्ति की आड़ में राष्ट्रवाद का पूर्वाग्रह भी बढ़ा है, जबकि देश हमें अपनी जमीन और गांवों से जोड़ता है यूरोप में भी कंट्रीसाइड कहा जाता है गांव को। देशों के बीच युद्ध को भी अंध राष्ट्रवाद की नजर से ना देखने की सलाह देते उन्होंने कवि, पत्रकार रधुवीर सहाय की पंक्तियां याद कीं- सीमा के इस पार पड़ी थीं लाशें, सीमा के उस पार पड़ी थीं लाशें। देश के मसले नेताओं और अफसरों के दिमाग से नहीं तय किए जाने चाहिए बल्कि उन्हें  एक पत्रकार की तथ्यपरक दृष्टि से देखा जाना चाहिए। हमारे अवचेतन में बनता देश असली देश से अलग होता है।

राष्ट्रवाद के इस प्रसंग पर ‘कल्पतरु एक्सप्रेस’ के समूह संपादक पंकज सिंह ने विचारक, कवि रवीन्द्र नाथ टैगोर को याद करते कहा कि गांधी से अपनी बहस में टैगोर ने राष्ट्रवाद के खतरों की ओर इशारा किया था। हमें भी देशभक्ति और राष्ट्रवाद में फर्क करना होगा। उन्होंने गांधी की उस ‘ताबीज’ का जिक्र किया जिसमें गांधी ने अंतिम आदमी को ध्यान में रखने की बात कही है। हमारे सारे क्रियाकलाप और विचारशीलता के केन्द्र में अंतिम पीड़ित मनुष्य होना चाहिए और तब हमसे कभी गलती नहीं होगी। कार्यक्रम के अंत में ‘कल्पतरु एक्सप्रेस’ के कार्यकारी संपादक अरुण कुमार त्रिपाठी ने कहा कि प्रियदर्शन ने अपनी बातों से पत्रकारिता का जो खाका खींचा है वह एक मुकम्मल कोलाज है। एक पत्रकार समाज की प्रयोगशाला का वैज्ञानिक है, जिसे सचेत होना चाहिए।

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