सपा के गूंगे-बहरे दलित प्रतिनिधि

क्या कारण है कि समाजवादी पार्टी के दलित वर्ग के प्रतिनिधि दलित सवालों पर न सदन में बोलते हैं और न सदन के बाहर । क्या वे समाज से कट गये हैं अथवा भयवश कुछ बोलने या करने से डरते हैं ? ये वही काम करते हैं जो मुलायम करने को कहते हैं । यदि ऐसा है तो यह न केवल लोकतंत्र बल्कि देश और समाज के लिए खतरनाक है ।

उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की सेवाओं में जिस तरह सरकार ने सवर्ण जातियों के हित में आरक्षण के नियम को बदला, वह बिल्कुल हीं ऐसी सरकार से अपेक्षित नहीं था, जो समाजवादी भी है लहियावादी हे और ओबीसी-हितैषी भी मानी जाती है। सबसे विद्रूप तो यह है कि समाजवादी पार्टी के किसी भी विधायक और सांसद ने इसके विरुद्ध कोई आवाज नहीं उठायी। यह किस तरह का प्रतिनिधित्व है, जो अपने ही वर्ग के न्यायोचित मुद्दे की अनदेखी करता है? आखिर ये सांसद और विधायक सामाजिक न्याय की उसी धारा से तो आते हैं, जिसे स्थापित करने के लिये दलित-ओबीसी ने अपनी कुरबानियॉं दी थीं। फिर सवाल उठता है कि दलित/ओबीसी वर्ग के ये प्रतिनिधि किनका प्रतिनिधित्व करते हैं? क्या इनका एकमात्र ध्येय अपना निजी भला करना ही है?

यही स्थिति सपा के अनुसूचित जाति के उन दलित सांसदों और विधायकों की है, जो आरक्षित सीटों से जीत कर आये हैं। हाल की ही बात है, जब संसद में कॉंग्रेस ने दलितों के लिये पदोन्नतियों में आरक्षण देने संबंधी बिल पेश किया था, तो मुलायम सिंह यादव ने न केवल उसका विरोध किया, बल्कि उसके विरोध में लोक सभा में बिल फड़वानेे से लेकर हंगामा भी करवाया था और बिल को स्थगित करवाने हेतु विभिन्न प्रकार की अशोभनीय हरकत की । जिस निर्लज्जता के साथ उन्होंने अपना दलित-विरोधी चेहरा संसद को दिखाया था, उसी निर्लज्जता के साथ उनके दलित सांसदों और विधायकों ने भी अपना दलित-विरोधी चेहरा दिखाया था। अपने आका के आदेश पर लोकसभा में उस बिल को फाड़ने वाला सपा का सांसद भी अनुसूचित जाति का ही था। एक दलित सांसद ने ऐसी शर्मनाक दलित-विरोधी हरकत क्यों की ? स्पष्ट है कि वह सांसद स्वयं को अपने वर्ग से ज्यादा मुलायम सिंह यादव का वफादार साबित करना चाहता था। ऐसे नेता जो खुद गुलाम बने रहना पसन्द करते हैं, जाहिर है कि वे दलितों को भी गुलाम ही बनाये रखना चाहेंगे।

बिहार में नीतीश कुमार की अगुवाईवाली सरकार के चार दलित मन्त्रियों-सर्वश्री, रमई राम ,श्याम रजक जीतनराम माझी और सत्यदेवनारायण आर्य ने मुख्यमन्त्री नीतीश कुमार को यह लिखकर दिया था कि अगर बिहार में पदोन्नति में आरक्षण लागू नहीं किया गया, तो दल और सरकार की साख पर गम्भीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, सामाजिक न्याय की धारा उलटी दिशा में बहेगी । साथ हीं साथ मंत्रियों ने सरकार को गुमराह करनेवाले सामान्य प्रशासन विभाग के अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का अनुरोध किया । इनमें से कुछ मंत्रियों ने श्री रमई राम के अगुआई में इस तरह का दलित विरोधी प्रस्ताव मंत्रिमंडल से पारित होने की स्थिति में सरकार से त्यागपत्र देने तक की बात कही । अनसूचित जाति/जनजाति कर्मचारी संघ बिहार ने राजधानी पटना सहित प्रदेश के विभिन्न जिलों में इसे लागू करने के लिए मशाल जुलुश निकाले । यही नहीं, बिहार राजय अनुसूचित जाति

आयोग ओर दलित विधायकों ने भी सरकार पर दबाव बनाया था। अन्ततः नीतीश कुमार के नेतृत्ववाली बिहार सरकार ने दलितों के पदोन्नत्तियों में आरक्षण को लागू करने हेतु सर्वोच्च न्यायालय के निदेशों के आलोक में प्रक्रिया पूरी कर शासनादेश निर्गत किया । इस प्रकार बिहार दलितों को पदोन्नति में आरक्षण देने का 21 अगस्त सन् 2012 में शासनादेश निर्गत करनेवाला देश का पहला प्रदेश बन गया । नीतीश कुमार के इन कदमों की न केवल बिहार के दलितों ने बल्कि पूरे देश के दलितों ने भी सराहना की ।

लेकिन उत्तर प्रदेश में सपा के एक भी दलित मन्त्री और विधायक ने पदोन्नतियों में आरक्षण लागू करवाने हेतु न तो अखिलेश सरकार पर दबाव बनाया और न तो कोई बयान ही दिया। सपा विधायक दल में दलित जातियों के 56 विधायक हैं जिनके बल पर उत्तर प्रदेश की सरकार टिकी हुई है। ये चाहे तो अखिलेश-मुलायम की सरकार एक क्षण में गिरा सकते हैं। किन्तु ये दलित मंत्री- विधायक अपने दल के गंूगे बंधुआ मजदूर बने हुए हैं और उत्तर प्रदेश की सपा सरकार ने न केवल पदोन्नतियों में आरक्षण को समाप्त किया बल्कि वह चुन-चुनकर दलित अधिकारियों को प्रताड़ित और दंडित भी कर रही है । वह दलितों की सुविधाओं को एक-एक कर समाप्त कर रही है, निष्प्रभावी बना रही है और सपा के दलितों के रहनुमा अपनी गुलामीगिरी का सार्वजनिक प्रदर्शन बड़ी शान से कर रहे हैं । जब कभी व्यक्तिगत रूप से उनके इन कार्यो पर कोई उॅगली उठायी जाती है तो उनका घिसा-पिटा बेशर्मी भरा उत्तर होता है कि दलित समाज अब हमारा क्या बिगाड़ सकता है ? मुलायम तो हमारा बना-बिगाड़ भी सकता है । हम वास्तव में मुलायम के बनिहार हैं, इससे ज्यादा कुछ नहीं । वे यह भूल जाते हैं कि इन्हीं दलितों और भूखे नंगों की आवाज उठाने की कीमत पर हीं वे आरक्षण का लाभ लेकर ऐश कर रहे हैं। ऐसे गैर जिम्मेदार प्रतिनिधियों से हम क्या उम्मीद कर सकते हैं ?

सपा के आजम खॉं ने जब अयोध्या में चौरासी कोस परिक्रमा के संबंध में अशोक सिंघल और मुलायम सिंह यादव के बीच तीन घंटे तक चली मुलाकात और समझौते के खिलाफ हुॅकार भरी, मुजफ्फरनगर दंगे में अपनी कुटनीति के तहत दंगा रोकने मेें विफल रहने पर भी चोरी-सिनाजोरी संबंधी बयान दिया और दिलवाया तो मुलायम की घिग्घी बंध गई और मुलायम आजम खॉ के विरूद्ध कोई कार्रवाई नहीं कर सके  बल्कि पार्टी में लोगों द्वारा विरोध करने पर आजम खॉ का बचाव भी किया। यदि दलित मंत्री-विधायक और सांसद आजम खॉ को देख कर भी सबक लेते तो वे दलितों के प्रतिनिधि कहलाने के हकदार होते । पर हाय रे, सपा के दलित प्रतिनिधि ये तो ऐसे नाकारा निकले जिनका नाम लेने में भी शर्म आती है । ये आरक्षित सीटांे के प्रतिनिधि कहलाने के सबसे अयोग्य हैं । जिस पार्टी में 56 विधायक दलित जातियों से हों, और सब के सब गूॅंगे-बहरे हों, तो उस पार्टी की सरकार को दलितों का उत्पीड़न करने से कैसे रोका जा सकता है? ऐसे में दलितों का उत्पीड़न करने में उस सरकार के हौसले तो हमेशा बुलन्द ही रहेंगे। यह सरकार इन्हीं नाकारा और गुलाम दलित वर्ग के प्रतिनिधियों के बल पर इलाहाबाद में दलित-पिछड़ों के आरक्षण समर्थक आन्दोलन को कुचल रही है और उनके नेताओं को जेल भेज रही है। इसलिये हमारे सामने आज यह सबसे बड़ा सवाल है कि दलित वर्ग के लोग आखिर कब तक ऐसे नाकारा लोगों को अपना प्रतिनिधि बनाते रहेंगे? 

लेखक ई. राजेन्द्र प्रसाद सामाजिक चिंतक है. उनसे संपर्क 09472575206 के जरिए किया जा सकता है.

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