सपा राज की सभी लोकलुभावन योजनाओं पर गुंडाराज-जंगलराज भारी पड़ेगा

: मिशन 2014 में रोड़ा बन सकते हैं अखिलेश के अधिकारी : सरकार पर नौकशाहों का शिकंजा : उत्तर प्रदेश में 2014 के लिए एक बार फिर ‘बिसात’ सजने लगी है। वैसे तो लोकसभा चुनाव में करीब डेढ़ वर्ष का समय बाकी है लेकिन केन्द्र की राजनीति जिस तरह पल-पल करवट बदल रही रही है, उससे इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है कि आम चुनाव की डुगडुगी कभी भी सकती है। इसी आशंका ने विभिन्न दलों के नेताओं का चैन छीन रखा है। सांसद अपनी सीट बचाने के लिए मिलनसार दिखने लगे हैं तो जो लोग सांसद हैं तो नहीं लेकिन सांसदी का सपना जरूर पाले हैं वह भी टिकट हासिल करने के अलावा जनता जनार्दन की नब्ज टटोलनें में लगे हैं। अदने से लेकर अगड़े तक सभी नेता इस बात को लेकर चिंतित हैं कि राजनीति का ‘गिरगिट’ अबकी कौन सा रंग बदलेगा।

लड़ाई दिल्ली की गद्दी के लिए हो रही है तो इसके लिए रास्ते विभिन्न राज्यों से तलाशे जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में तो आजकल कुछ ज्यादा ही तेजी दिखाई दे रही है। राज्य में कम से कम तीन ऐसे नेता हैं जो 2014 में प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं या फिर अपने आप को समझ रहे हैं। इसमें कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी का नाम सबसे ऊपर है तो सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव और बसपा सुप्रीमों मायावती राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं है को अपनी उम्मीद का आधार बनाए हुए हैं। राज्य के चार बड़ी राजनैतिक पार्टियों में भाजपा से जरूर कोई नेता प्रधानमंत्री पद का दावेदार नजर नहीं आ रहा है।

लोकसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस और भाजपा की रणीनीति तो दिल्ली से बन रही हैं लेकिन मुलायम-मायावती यूपी में ही अपनी जड़े तलाश रहे हैं। नेताओं द्वारा जनता के सामने जाने के लिए टोटके अजमाए तो मुद्दे तलाशे जा रहे हैं। नेतागण अपने दामन के दाग साफ दिखाने को एक तरफ तो विरोधियों की टोपी उछाल रहे है तो दूसरी तरफ जनता को भ्रमित भी किया जा रहा है। दोनों ही दलों के नेताओं द्वारा जनता को जीतने के लिए वैसे तो तमाम उपाय किये जा रहे हैं लेकिन सबसे खास बात यह है कि सपा और बसपा दोनों ही 2014 के आम चुनाव उसी आधार पर लड़ने जा रहे हैं जिसके कारण एक (समाजवादी पार्टी) को 2007 के विधान सभा चुनाव में तो दूसरे (बसपा) को 2012 के विधान सभा चुनाव में शिकस्त खानी पड़ी थी।

बहुजन समाज पार्टी विधान सभा चुनाव में बुरी तरह से हारने के बाद भी आम चुनाव ‘सर्वजन हिताय,सर्वजन सुखाय’ को आधार बना कर लड़ेगी वहीं समाजवादी पार्टी 2007 की तरह सरकारी खजाने का मुंह जनता के लिए खोल कर जीत की उम्मीद लगाए बैठा है। सपा अपने पिछले शासनकाल की तरह से इस बार भी किसानों का कर्ज माफी, कन्या विद्याधन, बेरोजगारी भत्ते जैसी तमाम योजनाओं के सहारे जीत का सपना पाले है लेकिन वह यह बात भूल गई है कि इन सब योजनाओं पर तत्कालीन सपा राज का गुंडाराज-जंगलराज भारी पड़ा था। बसपा ने सपा के गुंडाराज को खूब भुनाया।

बसपा का नारा ‘चढ़ गुंडों की छाती पर, मोहर लगाओ हाथी पर’ ऐसा कारगर हुआ कि मुलायम चारो खाने चित हो गये। बसपा ने पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। यह और बात थी कि माया का जादू भी उनकी जनता के साथ संवादहीनता और भ्रष्टाचार के कारण खत्म हो गया। जनता का बसपा से मोह भंग हुआ तो समाजवादी पार्टी एक बार फिर विकल्प बनने को बेताब दिखी। मुलायम को फिर मौका मिलेगा तो प्रदेश में गुंडे राज की वापसी हो सकती है इससे जनता हलकान थी तो सपा ने नया दांव अखिलेश पर लगाया जिन्होंने लगभग सभी सभाओं में बस एक ही बात दोहराई कि अबकी सपा को मौका मिला तो कानून व्यवस्था से किसी को खिलवाड़ नहीं करने दिया जाएगा। अखिलेश युवा थे, लोगों ने उनको परखा नहीं था, इसीलिए जनता ने उनकी बातों पर विश्वास किया, लेकिन यह विश्वास अखिलेश के सत्ता संभालते ही तार-तार होने में कुछ दिन भी नहीं लगे। महिलाओं से छेड़छाड़, बलात्कार, लूटपाट और हत्याओं की घटनाओं के अलावा भी तमाम तरह के अपराधों की बाढ़ आ गई तो दूसरी तरफ प्रदेश दंगे की चपेट में घिर गया।

सपा ने नेता ही नहीं मंत्री तक मार्यादाएं तोड़ते नजर आए। राज्यमंत्री का दर्जा पाए नवरलाल गोयल ने लखनऊ में जो किया वह शर्मनाक है। एक हिंदी दैनिक के फोटोग्राफर को मारा पीटा और बंधक बनाया। आखिरकर उन्हें बर्खास्त होना पड़ा है। गोंडा में सीएमओ को बंधक बनाने की घटना ठंडी भी नहीं पड़ पाई थी और बदायूं में तेल माफियाओं ने वहां के जिला पूर्ति अधिकारी को जिंदा जलाने की कोशिश करके बता दिया कि अराजक तत्वों के हौसले कितने बुलंद हैं। उस पर पुलिस महानिदेशक ने जिला पूर्ति अधिकारी को ही आड़े हाथों लिया कि क्यों वह बिना पुलिस को साथ लिए छापा मारने चले गए।

सरकार की फजीहत और सपा नेताओं की हरकतो से हालात बेकाबू देख मुलायम सिंह यादव अपनी ही सरकार और नेताओं को नसीहत देने लगे तो नेतागण उनकी नसीहतों को एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल रहे हैं।सरकार की अनुभवहीनता का फायदा उठा कर नौकरशाही बेलगाम होकर काम कर रही है। बसपा राज में जिन नौकरशाहों के कारण मायावती की किरकिरी हुई थी, वह समाजावादी शासन में भी अपनी जड़े मजबूती के साथ जमाए हुए हैं। नेता से लेकर नौकरशाह तक एक-दूसरे की काट करने और नीचा दिखाने में जुटे हैं। इंस्पेक्टर अपने एसपी को सपा का करीबी होने की धौंस देता है तो राज्य के प्रमुख सचिव तक की राह में उनके ही करीबियों द्वारा रोड़े अटकाए जाते हैं।

हालात इतने गंभीर हो गए हैं कि अखिलेश भी कभी-कभी इसमें अपने आप को अनफिट महसूस करते हैं। इसी के चलते उन्हें अक्सर अपने फैसलों पर यूटर्न तक लेना पड़ जाता है। दबाव की राजनीति ने अखिलेश सरकार की चमक फीकी कर दी है। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि ओछी राजनीति करने वाले कुछ नेता और मुलायम के करीबियों द्वारा अखिलेश के  मुंह में शब्द डालकर बुलवाए जा रहे हैं। इसका ताजा उदाहरण गत दिनों लोहिया निर्वाण दिवस पर लखनऊ में देखने को मिला। लोहिया पार्क में कार्यक्रम का आयोजन किया गया था।

मंच पर मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह के अलावा सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव आदि वरिष्ठ नेता और मंत्री विराजमान थे। इन्हीं सपाईयों के बीच मंच पर विराजमान एक पुराने पत्रकार साहब सबके उत्साह की वजह बने हुए थे। लोहिया के निर्वाण दिवस वाले दिन ही राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी भी दो दिवसीय दौरे पर लखनऊ पहुंचने वाले थे। उनके आने का समय हो गया था और प्रोटोकॉल के हिसाब से हवाई अड्डे पर मुख्यमंत्री को भी मौजूद रहना था। समय की गंभीरता को देखते हुए लोहिया निर्वाण दिवस पर मुख्यमंत्री ने सबसे पहले भाषण दिया। वह राष्ट्रपति की आगवानी करने की जल्दी में थे। एक तरफ अखिलेश का भाषण चल रहा था तो दूसरी तरफ पत्रकार महोदय नेताजी के साथ कानाफूसी में लगे थे। इसी बीच उन्होंने एक पर्ची भी नेता जी को थमाई।

इन सब बातों से बेफिक्र अखिलेश भाषण खत्म करके जैसे ही चलने लगे तो उनके हाथ में पत्रकार महोदय ने वो ही पर्ची पकड़ा दी जो नेताजी के हाथ में थी। उसमें क्या लिखा था यह तो किसी को नहीं पता चला लेकिन अखिलेश की भांव भंगिमा बता रही थी कि वह इससे खुश नहीं थे। उन्होंने बाद में घोषणा करने की बात कही लेकिन उनकी चल नहीं पाई। अखिलेश ने दोबारा माइक संभाला और रिक्शा चालकों की लाइसेंस फीस एक रूपया करने की घोषणा कर दी। चारों तरफ तालियां बजने लगी। मुख्यमंत्री इसके बाद फिर चलने को हुए लेकिन इस बार भी उन्हें रोक लिया गया। अबकी से उनके श्रीमुख में शब्द डालकर कहलाया गया कि कन्या विद्याधन योजना का नाम बदल कस्तूरबा गांधी कन्या विद्याधन योजना किया जा रहा है। फिर ताली बजी लेकिन कस्तूरता गांधी से सपा का क्या रिश्ता है यह कोई नहीं समझ पाया। निश्चित ही जब सार्वजनिक मंच पर सीएम पर इतना दबाव बनाया जाता है तो मंच के पीछे की तस्वीर तो और भी भयावह होगी।

युवा मुख्यमंत्री के लिए चारों तरफ से मुश्किलें खड़ी की जा रही हैं। सरकार वह चला रहे हैं। नाकामयाबी का ठीकरा भी उनके ही सिर फूटता है, लेकिन फैसले किसी और के होते हैं। उनके एक नहीं तमाम मंत्री और खासकर पंचम तल(मुख्यमंत्री सचिवालय) पर बैठे नौकरशाह परेशानी का कारण बने हैं। दबाव के कारण ही युवा सीएम ने कई ऐसे भ्रष्ट नौकरशाहों को मलाईदार पदों पर बैठा दिया है जिनकी जगह जेल न सही हासिये पर तो जरूर होनी चाहिए थी। यह सब तब हो रहा है जबकि ऐसे नौकरशाहों की मलाईदार पदों पर नियुक्ति से हाईकोर्ट भी खुश नहीं है।दबाव का ही नतीजा था जो अखिलेश अपनी पसंद का मुख्य सचिव तक नहीं नियुक्त कर पाए। कहा जाता है कि सत्ता हासिल करने के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पसंद न पसंद को सपा प्रमुख ने मुस्लिमों को लुभाने के लिए दिल्ली से बुलाकर जावेद उस्मानी को मुख्य सचिव बनवा दिया।

यह और बात है कि 1978 बैचे के आईएएस अधिकारी जावेद उस्मानी की छवि स्वच्छ और साफ-सुथरी हैं। उनके फैसले बिना किसी दबाव के होते हैं।यह और बात है कि उनकी खिलाफ भी लाबिंग हो रही है।वह इलाज कराने जाते हैं तो उनकी विदाई की चर्चा शुरू हो जाती है और छुट्टी लेते हैं तो अटकले लगने लगती हैं।जावेद उस्मानी अगर टिके हुए हैं तो इसकी वजह उनका मुलायम के करीबी होना है। वह जब मुलायम दूसरी बार मुख्यमंत्री बने थे तो उनके सचिव रह चुके थे। वैसे उस्मानी के खिलाफ मुलायम के कान भरने वाले चुप नहीं बैठे हैं। इसी तरह से मुख्यमंत्री अपने लिए प्रमुख सचिव भी अपनी पसंद का नहीं बना पाये। अखिलेश ने 1984 बैच के आईएएस अधिकारी संजय अग्रवाल को अपना प्रमुख सचिव बनाये जाने की घोषणा भी कर दी थी, लेकिन कुछ घंटों के भीतर ही उन्हें अपना आदेश बदलना पड़ गया। उनकी जगह 1980 बैच के आईएएस अधिकारी राकेश गर्ग ने ले ली जो आज तक अपने पद पर विराजमान हैं। कहा जाता है कि संजय अग्रवाल की अनदेखी सीएम को पंचम तल पर तैनात एक आईएएस सचिव स्तर अधिकारी के कारण करनी पड़ी थी जो पिछली मुलायम सरकार में भी काफी ताकतवर जानी जाती थीं।

समाजवादी सरकार जिस तरह से चल रही है उससे तो यही आभास होता है कि वह उसी रास्ते पर चल रही है जिससे पहले माया गुजरी थीं। माया को मनमानी के कारण अदालत की फटकार कई बार पड़ी थी तो समाजवादी सरकार के साथ भी ऐसा ही हो रहा है। हाईकोर्ट इस बात से बेहद खफा है कि भ्रष्ट नौकरशाहों को महत्वपूर्ण पदों पर बैठाया जा रहा है। हाईकोर्ट आईएएस अधिकारी राकेश बहादुर और संजीव शरण की तैनाती से नाराज दिखा। उसने पूछा भी कि क्यों संजीव और राकेश की तैनाती हुई। कई पुलिस अफसर भी संदेह के घेरे में हैं। कई पुलिस अधिकारी सीधे आरोप लगाते हैं कि जब हमारा विभागीय मुखिया ही लेनदेन में विश्वास करता है तो हम लोग पीछे क्यों रहें। कई नौकरशाह और पुलिस अधिकारी तो सरकारी अधिकारी कम नेता ज्यादा लगते हैं।

समाजवादी पार्टी की मजबूत पकड़ वाले इलाकों आगरा, एटा, इटावा, मैनपुरी के पुलिस अधीक्षक इस बात की मिसाल हैं। उन पर अक्सर ही समाजवादी पार्टी के लिए काम करने का आरोप लगता रहता है। सैफई, इटावा में जो अपराधकी घटनाएं बढ़ रही हैं उसके पीछे अधिकारियों की नेता वाली मानसिकता भी कम जिम्मेदार नहीं है। नेताओं के सहारे राजनीति करने में माहिर कई बड़े अधिकारियों ने किसी न किसी नेता को अपना गॉड फादर बना रखा है। सपा राज में एक इंस्पेक्टर की भी इतनी हैसियत है कि वह एसपी तक से भिड़ जाता है। हापुड़ में यह नजारा पिछले दिनों देखने को मिला। हापुड़ के एसपी ने एक पुलिस निरीक्षक को इस बात कि लिए फटकार लगाई कि वह अपने इलाके में अपराध नियंत्रित नहीं कर पा रहा है, इस पर निरीक्षक उनके भिड़ गया और जब एसपी ने उसे सस्पेंड कर दिया तो उसने अपने आकाओं के माध्यम से ऐसा दबाव बनाया कि एसपी साहब हो 12 घंटे के भीतर उसका सस्पेंशन खत्म करना पड़ गया।

इसी प्रकार कुछ दिनों पूर्व मथुरा की पुलिस अधीक्षक एन आर पद्मजा से मुख्यमंत्री अखिलेश ने बात करनी चाही तो उनका मोबाइल बंद निकला। उनको फोन पर मैसेज किया गया तो रिस्पांस आया कि मैम जैसे ही फ्री होंगी बात कर लेंगी। इस पर मुख्यमंत्री के स्टाफ ने मथुरा के जिलाधिकारी को फोन मिलाया और उनसे कहा कि वह एसपी साहिबा की सीएम साहब से बात कराएं। तब कहीं आधे घंटे बाद बात हो पाई। अगर यह घटना माया राज में होती तो अंदाजा लगाया जा सकता था कि एसपी साहिबा का क्या हाल होता। यह चंद घटनाएं समाजवादी सरकार की विश्वसीयता पर शासन पर उसकी पकड़ की सही जानकारी देती है। समाजवादी सरकार की अनुभवहीनता के कारण जिस तरह से नौकरशाही उस पर हावी होती जा रही है उससे तो यही लगता है कि कहीं अखिलेश के अधिकारी सपा के मिशन 2014 में रोड़ा न साबित हो जाएं। ऐसे अधिकारियों के बल पर सपा का 60 सीटें जीतने का सपना शायद ही पूरा हो पाए।

लेखक अजय कुमार लखनऊ में पदस्थ हैं. वे यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों और पत्रिकाओं में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. अजय कुमार वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं.

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