सबसे बड़े हिन्दी अखबार के शीर्षक ‘आसमानी दावे कर छुपा गए असलियत’ में ग़लत है ‘छुपाना’

LN Shital : देश के सबसे बड़े हिन्दी अखबार में एक शीर्षक है – 'आसमानी दावे कर छुपा गए असलियत'। इसमें ग़लत क्या है? ग़लत है 'छुपाना'। हम याद रखें कि Poetry, ख़ास तौर पर उर्दू Poetry में 'छुपाना' शब्द इस्तेमाल किया जाता है, जबकि गद्य या Prose में 'छिपाना' शब्द का प्रयोग किया जाना चाहिए। इसी तरह, 'लापरवाह' तो लोग होते हैं, लेकिन ज़ुल्फ़ें 'बेपरवाह' ही हुआ करती हैं। भले ही वे किसी हसीना की हों या किसी और की। ये अन्तर हैं तो बहुत सूक्ष्म, लेकिन हैं बहुत महत्त्वपूर्ण।

एक मित्र ने पूछा है कि 'बर्बादी की कगार पर' सही है या 'बर्बादी के कगार पर'। हम जान लें कि 'कगार' पुल्लिंग है, और 'का', 'के', 'की' का निर्धारण उस शब्द के लिंग के अनुसार होता है, जिसके ठीक पहले इनमें से कोई एक आता या आती है। जैसे – बेटी का बाप। यहाँ बेटी स्त्रीलिंग है, और बाप पुल्लिंग।

एक अन्य मित्र Manimala Sharmaji ने सम्भावना जतायी कि शायद 'मिष्ठान' ही सही शब्द है। यहाँ भी समझ लीजिए कि संस्कृत में मूल शब्द है – 'मिष्ट', जिसका अर्थ है स्वादिष्ट या मधुर।'मिष्ट' के साथ 'अन्न' की सन्धि से शब्द बना – 'मिष्टान्न', जो कालान्तर में हिन्दी का शब्द बन गया – 'मिष्ठान्न'। यानि, संस्कृत में 'मिष्टान्न', और हिन्दी में 'मिष्ठान्न'। लेकिन 'मिष्टान' या 'मिष्ठान' तो हरगिज़ नहीं।

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LN Shital : हिन्दी के पठन-पाठन में एक हिमालयी ग़लती यह हुई कि हमें 'पर्यायवाची शब्द' बताये और रटाये गये। जबकि, पर्यायवाची शब्द होते ही नहीं। हमसे पूछा जाता था, और बच्चों से आज भी पूछा जाता है – 'पानी' के पर्यायवाची बतायें। हम झट से बता देते हैं – जल, नीर, तोय, वारिद आदि। जरा सोचिए, यदि हम 'गंगाजल' की जगह 'गंगातोय' या 'गंगानीर' लिखें, तो कैसा लगेगा? या फिर 'नेत्ररोग' की जगह 'नयनविकार' और 'अपने खुद के पैरों पर खड़े होने' की जगह 'अपने निजी चरणों पर खड़े होने' की बात लिखने या बोलने लग जायें तो क्या यह एक बहुत बेहूदी बात नहीं होगी? तात्पर्य यह है कि शब्द पर्यायवाची नहीं होते, बल्कि हर शब्द का अपना एक परिवार होता है। हम, प्रसंग के अनुरूप, उनमें से कोई एक उपयुक्त शब्द इस्तेमाल कर लेते हैं। जैसे बिल्ली प्रजाति या सर्प प्रजाति होती हैं, वैसे ही शब्द-परिवार होते हैं। 'Invitation' के लिए हिन्दी में दो शब्द हैं। जब invited व्यक्ति या व्यक्तियों के लिए खान-पान की व्यवस्था हो तो 'निमन्त्रण', और जब खाने-पीने के लिए कुछ न हो तो 'आमन्त्रण'। जैसे – विचार आमन्त्रित किये जाते हैं, और लंच के लिए मेहमान निमन्त्रित किये जाते हैं।

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LN Shital : देशी कट्टा, ज़िन्दा कारतूस, कट्टे या तमंचे की नोक और आरोपी। आप इन चारों शब्दों को अखबारों में खूब पढ़ते हैं, और समाचार चैनलों पर दिन-रात सुनते हैं। पर, ये चारों ही बिल्कुल ग़लत हैं। कट्टा तो विदेशी होता ही नहीं, वह होता ही देशी है, और वह जुगाड़ से अवैध तौर पर बनाया जाता है। इस लिए उसके साथ 'देशी' शब्द जोड़ना फ़िजूल है। कारतूस तो कारतूस होता है। ज़िन्दा या मुर्दा नहीं। इस्तेमाल नहीं किया है तो कारतूस कहिए और इस्तेमाल कर लिया है तो कारतूस का खोखा कहिए। वैसे, 'ज़िन्दा कारतूस' अँगरेज़ी के 'Live Cartridge' का बेहूदा अनुवाद है। हिन्दी के कूप-मण्डूक अनुवादकों ने अनुवाद में केवल एक ही 'स्वर्णिम सिद्धान्त' को अपनाया है – 'हमने नहिं कछु सोच विचारा, हम माखी पै माखी मारा!' अब आइए 'आरोपी' शब्द पर चर्चा करें। लगभग सभी लोग समझते हैं कि 'आरोपी' वह व्यक्ति होता है, जिस पर कोई आरोप होता है। जैसे, चारा घोटाले के 'आरोपी' लालू यादव। यह एक बहुत गम्भीर ग़लती है। 'आरोपी' का सही अर्थ है – वह व्यक्ति, जिसने किसी व्यक्ति पर कोई आरोप लगाया है। जिस व्यक्ति पर आरोप लगाया जाता है, उसे कहते हैं – आरोपित। इसी तरह, कट्टे या तमंचे की कोई नोक नहीं होती। हाँ, चाकू या छुरे की नोक ज़रूर होती है। कट्टे या तमंचे की तो नाल होती है। इस लिए, लिखा जाना चाहिए – चाकू की नोक पर, कट्टे के ज़ोर पर, या फिर कट्टा या चाकू दिखाकर।

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LN Shital : 'आप तत्काल दिल्ली रवाना हो जायें।' इस वाक्य में ग़लत क्या है? लगभग सभी लोग इसे सही ही मानेंगे। लेकिन यह ग़लत है, क्योंकि यहाँ 'तत्काल' शब्द की जगह 'तुरन्त' शब्द का इस्तेमाल किया जाना चाहिए था। 'तुरन्त' का मतलब है 'इसी समय' और 'तत्काल' का आशय होता है – 'उसी समय'। यानि, जब हम 'Present Tense' या 'Future Tense' में बात करते हैं तो 'तुरन्त' का प्रयोग किया जाता है, और 'Past Tense' में 'तत्काल' का। इसी तरह, 'अधिकांश' शब्द का बेहद ग़लत इस्तेमाल धड़ल्ले से किया जाता है। जैसे – 'अधिकांश लोग'। याद रखिए कि जो संज्ञाएँ गिनी जा सकती हैं, उनके लिए 'ज़्यादातर' या 'अधिकतर' शब्दों का इस्तेमाल होता है। केवल उन्हीं संज्ञाओं के साथ 'अधिकांश' शब्द का इस्तेमाल किया जाना चाहिए, जो तोली जाती हैं, गिनी नहीं जातीं। जैसे – 'अधिकांश गेहूँ, अधिकांश सब्ज़ी'।

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LN Shital : 'मुझे अपने बेटे को स्कूल छोड़ने के लिए बस स्टॉप तक जाना पड़ता है।' हम, अकसर, इसी तरह के ग़लत वाक्य बोलते और सुनते हैं। ऐसे वाक्यों में 'जाना पड़ता है' की जगह 'जाना होता है' वाक्यांश का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। गौरतलब है कि जहाँ हमारा कोई भी कृत्य, कर्त्तव्य-बोध या दायित्व-बोध जुड़ा होता है, वहाँ हमें 'होता है' का प्रयोग करना चाहिए। हम याद रखें कि जहाँ कोई काम अपनी इच्छा या मन के विरुद्ध 'करना पड़ता' है, केवल वहीं 'पड़ता है' का इस्तेमाल करना चाहिए। एक दिलचस्प बात! अपने बड़े आत्मीय जनों के लिए एक पारम्परिक सम्बोधन है – 'बाबूजी'। अमिताभ बच्चन अपने पिताश्री हरिवंश राय बच्चन जी के लिए इस सम्मानजनक सम्बोधन का ही इस्तेमाल करते हैं। वैसे भी, सरकारी दफ़्तरों में 'क्लर्कों' और 'हेड क्लर्कों' के लिए क्रमशः 'बाबू' और 'बड़े बाबू' शब्द खूब प्रचलित हैं। बाबू गुलाब राय एक बहुत बड़े साहित्यकार थे। एक अपमानजनक सम्बोधन, कालान्तर में, एक सम्मानजनक सम्बोधन में कैसे तब्दील हो जाता है, उसका सबसे सटीक उदाहरण है 'बाबू' शब्द। अंगरेज सबसे पहले बंगाल आकर जमे थे। उन्हें क्लर्की के लिए हिन्दुस्तानियों की ज़रूरत थी। इसके लिए उन्होंने स्थानीय बंगालियों को रखा। लेकिन उन्हें बंगालियों में से एक ख़ास किस्म की 'नापसन्द बू' आती थी, जो उनके (यानि बंगालियों के) नियमित मछली-सेवन के कारण स्वाभाविक थी। चूँकि उन बंगाली क्लर्कों को हिन्दुस्तानी सम्बोधन देना था, तो अँगरेजों ने उन्हें नाम दे दिया – 'बा-बू'। तब गोरों की सेवा से जुड़े लोगों के लिए आम समाज में इज्ज़त और रुतबा होना ज़रूरी था ही। इस तरह 'बाबू' अन्ततः 'बाबूजी' हो गये।

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LN Shital : 'No Admission' के लिए हिन्दी में लिखा जाता है 'प्रवेश निषेध'। यह पूरी तरह से ग़लत है। सही है – 'प्रवेश निषिद्ध'। यानि, 'No' या ' Prohibited' के लिए शुद्ध हिन्दी शब्द है – 'निषिद्ध'। हम समझ लें कि 'No Smoking' या 'No Exit' जैसे अँगरेज़ी वाक्यांश 'Passive Voice' में हैं, और 'Passive Voice' में Verb की third form ही इस्तेमाल की जाती है। जैसे, 'Prohibit' की third form हुई – Prohibited'। यानि, उपर्युक्त वाक्यांशों में 'निषेध' शब्द का इस्तेमाल 'Passive Voice' में किया गया है। इस लिए 'निषिद्ध' शब्द का इस्तेमाल ही किया जाना चाहिए। ठीक वैसे ही, जैसे, 'No' या 'Prohibited' के लिए शुद्ध हिन्दी शब्द 'वर्जित' का प्रयोग किया जाता है। गौर कीजिए कि 'उपरोक्त', 'मिष्ठान' और 'श्राप' पूर्णतः ग़लत शब्द हैं। सही शब्द हैं – 'उपर्युक्त', 'मिष्ठान्न' और 'शाप'।

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LN Shital : जब हम किसी से पूछते हैं –आपकी कितनी सन्तानें हैं, तो प्रायः जवाब मिलता है — 'एक लड़का और एक लड़की।' यों तो बात बहुत छोटी लगती है, लेकिन है बहुत बड़ी। 'लड़की' या 'लड़का' शब्द मानव-नर या मादा के अवस्था-सूचक शब्द हैं।ये दोनों ही शब्द सम्बन्ध हीनता को भी दर्शाते हैं। हमारा सही जवाब होना चाहिए –'एक बेटा और एक बेटी।' जैसे ही हम 'लड़की' के लिए 'बेटी' शब्द का इस्तेमाल करते हैं, उसके साथ शुचिता, पवित्रता और एक नाज़ुक एहसास से भरी गरिमा जुड़ जाती है। क्या हम अपनी पत्नी के लिए मात्र 'औरत', माता-पिता के लिए 'बुढ़िया-बुड्ढे' या बहन के लिए 'लड़की' शब्द का इस्तेमाल करते हैं? निश्चित है कि नहीं। इसी तरह, कोई भी काम या तो 'सम्पन्न' किया जाता है या 'किया' जाता है। लेकिन, कभी भी 'ख़त्म' नहीं किया जाना चाहिए।

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LN Shital : अकसर फ़िल्मी और छोटे परदे की अदालतों में जज को, फ़ैसला सुनाते समय, यह कहते हुए दिखाया जाता है – "गवाहों के बयानों को मद्देनज़र रखते हुए…।" यह वाक्यांश पूरी तरह से ग़लत है। अकेले 'मद्देनज़र' शब्द का मतलब ही है कि 'ध्यान में रखते हुए'। इस तरह, स्पष्ट है कि 'मद्देनज़र' शब्द के साथ कभी भी 'रखते हुए' नहीं लगाना चाहिए। कई लोग 'कलमबद्ध' शब्द का इस्तेमाल करते हैं। वे समझ लें कि उर्दू में 'क़लमबन्द' होता है, और हिन्दी में 'लेखनीबद्ध'। बाग़ान, कागज़ात, ज़ेवरात, गण, अनेक, मालूमात, जवाहरात आदि कुछ ऐसे शब्द हैं, जिनके बहुवचन गढ़ने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि वे पहले से ही बहुवचन (ज़ेवर – ज़ेवरात) हैं।

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LN Shital : जो गन्ध बेचने का कारोबार करते थे, उन्हें गन्धी कहा जाता था। अंगरेज़ी की 'कृपा' से जिस तरह अनेक 'ठाकुर' टैगोर हो गये, बहुतेरे 'सिंह' सिन्हा हो गये, 'शिन्दे' सिन्धिया हो गये; उसी तरह 'गन्धी' गान्धी हो गये। यह सब इन समुदायों के सम्पन्न लोगों ने ख़ुद को 'अभिजात्य' बनाने-दिखाने के चक्कर में किया। 'गन्धी' का 'गान्धी' होना तो चल गया। लेकिन बहुत से लोग 'गान्धी' को 'गाँधी' बना रहे हैं, जो पूरी तरह से ग़लत है। अँगरेज़ी के जिन शब्दों में 'N' से पहले 'O' vowel होता है, उनमें क़ायदे से बिन्दी की जगह आधा 'न' आना चाहिए। जैसे – 'Conference' यानि 'कॉन्फ्रेंस'। लेकिन इन दिनों धड़ल्ले से लिखा जा रहा है – 'कांफ्रेंस', जो ग़लत है।

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LN Shital : कीजिये, जाइये, गाइये, रोइये। ये सब ग़लत शब्द हैं। याद रखिए कि अदब से जुड़े जिन शब्दों के आख़िरी तीन अक्षरों में 'अ', 'ओ', 'आ', 'ई' के बाद 'इ'-'ए' की ध्वनि निकलती है, उनके अन्त में 'ये' की बजाय 'ए' लगाना चाहिए। जैसे – 'पहचानिए', 'करिए', 'सोइए', 'लीजिए', 'खाइए' आदि।

'कार्रवाई' और 'कार्यवाही'।

इन दोनों शब्दों के प्रयोग में बहुत अन्तर है। जब हम कोई 'Action' करते हैं, तो 'कार्रवाई' शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। जैसे – भ्रष्ट अधिकारी के खिलाफ़ कारवाई। लेकिन, जब हम किसी भी मीटिंग या बैठक की 'Proceeding' की बात करते हैं, तो 'कार्यवाही' शब्द का उपयोग ही किया जाना चाहिए। जैसे — विधानसभा सत्र की कार्यवाही। एक मित्र ने 'गढ़' शब्द का अर्थ पूछा है, सो जान लें कि 'दुर्ग', 'किले', 'शाही ठिकाने' या 'हिसार' को ही 'गढ़' कहा जाता था।

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LN Shital : ज़्यादातर लोग नहीं जानते कि 'लिये' और 'लिए' शब्दों में क्या अन्तर है। वे नहीं जानते कि ' लिए' का इस्तेमाल कहाँ करना चाहिए, और 'लिये' का कहाँ। 'लिये' क्रिया यानि Verb है। हम कहेंगे –"ओ भाई! मेरा मोबाइल कहाँ लिये जा रहे हो?" या कहें कि –"वह महिला अपनी बिटिया को गोद में लिये हुए थी।" 'लिए' विभक्ति यानि Preposition है। जहाँ अँगरेज़ी में 'To' और 'For' का इस्तेमाल होता है, वहाँ हिन्दी में 'लिए' का प्रयोग किया जाना चाहिए। जैसे -"खुदा तक पहुँचने के लिए पहले खुद तक पहुँचो।" या फिर –"परीक्षा पास करने के लिए कड़ी मेहनत तो करनी ही होगी बेटा। मज़ेदार बात – हममें से शायद ही कोई जानता होगा कि 'गढ़' शब्द मूलतः न तो हिन्दी का है, न संस्कृत का है, और न ही उर्दू या फ़ारसी का है। दरअसल, यह शब्द पुर्तगाली भाषा का है।

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LN Shital : प्रणाम, नमस्कार, नमस्ते. हम, इन तीन अभिवादन-सूचक शब्दों के प्रयोग में जमकर घालमेल करते हैं। दरअसल, 'नमस्कार' अपने समकक्ष लोगों को किया जाता है, जबकि अपने से बड़े लोगों को 'नमस्ते' कहकर अभिवादन किया जाना चाहिए। और, जिन बड़ों के प्रति हमारे मन में अत्यन्त आदर होता है, उन्हें 'प्रणाम' किया जाता है। इसी तरह तीन और शब्द हैं — 'अनुरोध', 'निवेदन', 'आग्रह'। इन तीनों के प्रयोग में भी ग़लतियाँ होती हैं। अपने समकक्ष या प्रोटोकॉल में अपने से तनिक छोटे व्यक्तियों से शिष्टाचारवश 'अनुरोध' किया जाता है, जबकि अपने से बड़ों से 'निवेदन' ही किया जाना चाहिए। और, हम जिन लोगों पर, किसी भी नाते से, अपना अपनत्व भरा अधिकार समझते हैं, केवल उन्हीं से 'आग्रह' किया जाना चाहिए।

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LN Shital : बोली एक पगडण्डी की तरह होती है और भाषा किसी राजमार्ग की मानिन्द। पगडण्डी पर चलने वालों को बहुत सी 'लिबर्टी' सहज ही मिल जाती है, जबकि राजमार्ग पर तनिक सी लापरवाही भी जानलेवा साबित हो सकती है। कई ऐसे शब्द हैं, जिनकी वर्तनी में, नासमझी में की गयी मामूली सी ग़लती भी अर्थ का अनर्थ कर डालती है।

उनमें से कुछ शब्द हैं:
फ़र्ज – स्त्री का जननांग
फ़र्ज़ – कर्त्तव्य
गुरु – शिक्षक यानि Teacher
गुरू – गधा
ग्रामीण – गाँव में रहने वाला (villager), Rural
ग्राम्य — गँवार
किश्त — खेती
क़िस्त — Installment
फ़र्ज़ी – काल्पनिक
फ़र्जी – महिला का गाउन

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LN Shital :  तीन शब्द हैं–जाली, नक़ली, फ़र्जी। इन्हीं से बने हैं–जालसाज़ी, नक़्क़ाली, फ़र्जीवाड़ा। मीडिया में, अनजाने में, इन शब्दों के साथ जमकर ज़्यादती होती है। कैसे? आइए जानें। 'जालसाज़ी' का मतलब है, काग़ज़ात में हेराफेरी करना। जैसे, यदि '33' लिखा हो तो उसे हेराफेरी करके '88' बना देना। किसी चेक में लिखे मूल नाम या मूल रक़म को बदल कर कुछ और बना देना। याद रखिए कि 'जालसाज़ी' का तात्पर्य केवल उस अपराध से है, जिसमें मूल इबारत में कूट रचना करके धोखाधड़ी की जाती है। 'नक़्क़ाली' का मतलब उस अपराध से है, जिसमें असली वस्तु या व्यक्ति की नक़ल प्रस्तुत की जाती है। जैसे, कोई व्यक्ति उन लोगों के सामने ख़ुद को महाराष्ट्र के कृषि मन्त्री के रूप में पेश करके कोई धोखाधड़ी करे, जिन्होंने वहाँ के असली कृषि मन्त्री को नहीं देखा। यानि, 'Impersonation' करना। नक़ल के लिए असल का होना अनिवार्य होता है। 'फर्ज़ीवाड़ा' उस अपराध को कहते हैं, जिसमें 'वह सब कुछ' दिखाकर माल बटोरा जाता है, जिसका कहीं कोई वज़ूद होता ही नहीं। जैसे, कहीं कोई सड़क बनायी ही नहीं गयी, लेकिन कागज़ों में सड़क बनी दिखाकर सरकारी खज़ाने से भुगतान ले लिया गया। ऐसा अपने देश में खूब होता है।

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LN Shital : 'नाकामी' या 'Failure' शब्दों के समानार्थी शब्द के तौर पर 'असफलता' शब्द का इस्तेमाल धड़ल्ले से किया जाता है, जो पूरी तरह से ग़लत है। मूल शब्द है 'फल', जिसका एक अर्थ है–'सकारात्मक परिणाम'। यानि, जिस प्रयास का सकारात्मक परिणाम मिले, उस प्रयास को हम सफल प्रयास कहते हैं। लेकिन, जिस प्रयास का सकारात्मक परिणाम नहीं मिल पाये, उसे हम विफल या निष्फल प्रयास कहेंगे। मतलब यह कि 'सफल' शब्द के विपरीतार्थक शब्द हैं–'विफल' या 'निष्फल'। हालाँकि, 'विफल' और 'निष्फल' शब्दों के अर्थों में एक सूक्ष्म अन्तर है। लेकिन, दोनों शब्द अंततः लगभग समानार्थी ही हैं। इसलिए 'असफल' शब्द की न तो कोई ज़रूरत है, और न ही कोई औचित्य। अज्ञानतावश, अनावश्यक और ग़लत शब्द गढ़ने से भाषा विकृत होती है।

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LN Shital : हममें से बहुत से लोग 'निदेश' और 'निर्देश' में अन्तर नहीं समझ पाते। यही नहीं, ज़्यादातर लोग 'निदेश' को ग़लत शब्द मानते हुए 'निर्देश' को सही शब्द बताते रहे हैं। दरअसल दोनों ही शब्द सही हैं। कार्यालयीन कामकाज में 'आदेश' शब्द के गरिमामय स्वरूप में 'निदेश' शब्द का इस्तेमाल होता है। अकसर, पदनाम में अपने से तनिक नीचे के अधिकारियों को, उनकी पदप्रतिष्ठा के मद्देनज़र, निदेश ही दिये जाते हैं, आदेश नहीं। और, किसी भी निदेश में, प्रायः विस्तार से बताया जाता है कि कौन-सा काम किस तरीके से अन्जाम दिया जाना है। दूसरी तरफ़, कलाओं से जुड़ी तमाम गतिविधियों के सफल क्रियान्वयन के लिए 'निर्देश' शब्द का प्रयोग किया जाता है। जैसे, किसी भी फ़िल्म को कोई 'निर्देशक' ही 'निर्देशित' कर सकता है, 'निदेशक' नहीं। इसी तरह, किसी भी विभाग का 'निदेशक' ही हो सकता है, 'निर्देशक' हरगिज़ नहीं। हालाँकि, अंगरेज़ी में 'निदेशक' और निर्देशक' के लिए एक ही शब्द है–'Director'.

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LN Shital : अकसर लोग 'चलने की आज्ञा' माँगते हैं। दरअसल, उन्हें 'आज्ञा' की जगह 'अनुमति' माँगनी चाहिए, क्योंकि 'अनुमति' माँगने पर दी जाती और 'आज्ञा' तो बिना माँगे ही दे दी जाती है। यानि, 'अनुमति' ली जाती है और 'आज्ञा' दी जाती है। 'आज्ञा' तो, हैसियत में बड़े व्यक्ति या सत्तासीन लोग अपनी तरफ़ से खुद-ब-खुद, बिना माँगे ही दे देते हैं। जबकि 'अनुमति' माँगी जाती है, खुद-ब-खुद दी नहीं जाती।

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LN Shital : 'लोकतन्त्र' यानि लोगों का शासनतन्त्र यानि 'Democracy'. इसी 'Democracy' शब्द के लिए बहुत से लोग 'प्रजातन्त्र' शब्द का इस्तेमाल करते हैं, जो पूर्णतः ग़लत है। जब राजा ही नहीं रहे, तो प्रजा कहाँ रह गयी? हमारे यहाँ राष्ट्राध्यक्ष (राष्ट्रपति) का चुनाव होता है, और शासनाध्यक्ष (प्रधानमन्त्री) भी निर्वाचित प्रतिनिधि ही होता है। इसलिए यहाँ 'प्रजातन्त्र' शब्द का प्रयोग लोकतन्त्र का अपमान है। जहाँ राजा होता है, केवल वहीं प्रजा होती है। जैसे– जापान, ब्रिटेन, स्पेन आदि। ऐसे, राजा वाले, जिन देशों में संसदीय शासन प्रणाली होती है, उसे प्रजातन्त्र कहते हैं। यानि भारत में लोकतन्त्र है, और जापान, ब्रिटेन आदि में प्रजातन्त्र।

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LN Shital : 'नेता' यानि 'Leader'। लेकिन, अब यह शब्द राजनैतिक अर्थों में रूढ़ होकर रह गया है। इस तरह, 'नेता' बोले तो एक ऐसा राजनैतिक प्राणी, जो दलगत सीमाओं और स्वार्थों में बंधा है। 'राजनेता' यानि 'Statesman' यानि एक ऐसी महान शख्सियत, जो दलगत स्वार्थों और सीमाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रहित के लिए सोचती और काम करती हो। जैसे–लाल बहादुर शास्त्री, सरदार वल्लभ भाई पटेल, अटल बिहारी वाजपेयी आदि। लेकिन, हम अज्ञानतावश तमाम टुच्चे राजनैतिक प्राणियों के लिए 'राजनेता' शब्द का इस्तेमाल धड़ल्ले से करते हैं। खासतौर पर उनके लिए, जो सत्तारूढ़ हैं। हम ऐसा करके, अनजाने में, अपने राजनेताओं का बहुत अपमान करते हैं।

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LN Shital : स्टेशन पर एक लावारिस बच्चा मिला। बच्चा लावारिस नहीं है। बच्चा तो यतीम है। शादी के बाद जो बेऔलाद होते हैं, वे लावारिस कहे जाते हैं। जिन बच्चों के सिर पर माँ-बाप का साया नहीं होता, उन्हें यतीम कहा जाता है। इसी तरह, सार्वजानिक स्थानों पर अकसर चेतावनी सुनी जाती है – 'लावारिस वस्तुओं को न छुएँ'। निर्जीव चीज़ों के वारिस नहीं हुआ करते, और न ही वे यतीम हुआ करती हैं। ऐसी 'Unattended' वस्तुओं के लिए 'बेगानी' या 'संदिग्ध' शब्दों में से कोई एक शब्द इस्तेमाल किया जा सकता है।

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LN Shital : जन्म से लेकर मृत्यु तक की जीवन-अवधि ही 'आयु' होती है। इस तरह, किसी के जीवित रहते उसकी आयु नहीं पूछी जा सकती। इसी तरह, न ही किसी नौकरी के लिए ' आयु-सीमा' तय कर सकते हैं। 'कितने साल के हैं' या 'कितने साल की हैं' पूछने के लिए 'वय', 'अवस्था' या 'उम्र' शब्दों का इस्तेमाल करना चाहिए। 'आयु-सीमा' या 'age-limit' के लिए 'वय-सीमा' का प्रयोग ही किया जाना चाहिए।

कई अखबारों में संपादक रहे वरिष्ठ पत्रकार एलएन शीतल के फेसबुक वॉल से.

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