समाजवादी लोकतांत्रीकरण की राह पर अखिलेश

: अदना से अदना आदमी भी मुख्यमंत्री तक पहुंच सकता है, अपना दर्द बयाँ कर सकता है : लखनऊ। अखिलेश युवा हैं, उनकी पढ़ाई-लिखाई में प्रोफेशनलिज्म का बहुत महत्व रहा है। जिसे जो काम करना है, ठीक से करे, ईमानदारी से करे, निष्ठा से करे, काम को अपना काम समझ कर करे। यही प्रोफेशनल तरीका है। वह कार्यशैली में हाईटेक हो, पर व्यवहार में पारंपरिक हिंदुस्तानी। सबके प्रति आदर का भाव। अफसरी नहीं। कोई भी किसी दफ्तर में अपना काम लेकर जाय, तो उसका अपनेपन केसाथ स्वागत हो, उसे दुत्कारा न जाय, अफसरी न झाड़ी जाय। आफ्टर आल सभी जनता की सेवा के लिए हैं, कर्मचारी, अफसर और सरकार भी। जनता सबसे ऊपर है, आम आदमी सबसे ज्यादा ध्यान दिये जाने योग्य व्यक्ति है। अखिलेश कुछ ऐसी ही कार्य संस्कृति चाहते हैं। लगे कि सरकार कोई तोप चीज नहीं है, वह जनता के द्वारा, जनता की और जनता के लिए है।

वे जानते हैं कि पूरे तंत्र में पांच साल से एक अजीब तरह की जड़ता और असंवेदनशीलता घर कर गयी है। इसको बदलने के लिए, इसे ज्यादा से ज्यादा जनसंवेदनशील बनाने के लिए स्वयं भी वैसा ही व्यवहार करना पड़ेगा। महात्मा गांधी और डा. राम मनोहर लोहिया का मानना था कि नेता को विशिष्ट नहीं होना चाहिए, उसे जनता से अलग नहीं दिखना चाहिए। आम आदमी जिस तरह का जीवन व्यतीत कर रहा है, वही जीवन नेता को भी अपने लिए चुनना चाहिए, तभी वह व्यापक स्तर पर लोगों के साथ तादात्म्य स्थापित कर सकेगा, तभी वह लोगों की समस्याओं को समझ सकेगा और केवल तभी वह उनके समाधान की दिशा में कदम बढ़ा सकेगा। इतिहास गवाह है कि जो नेता जनता से दूर गये, उनको लोगों ने सत्ता से उतार दिया, समय की कब्र में दफ्न कर दिया।

अखिलेश को पता है कि यह फासला नहीं होना चाहिए। इसीलिए वे नयी सरकार की कार्यसंस्कृति में आम जनता को केंद्र में रखकर चल रहे हैं। आप को याद होगा, पहले जब मुख्यमंत्री का काफिला सड़क पर निकलता था तो राजशाही अंदाज में। सारी सड़कें बंद हो जाती थीं, जनता जाय भाड़ में। कितना भी जरूरी काम है, रुको और इंतजार करो या फिर ज्यादा उछल-कूद की तो डंडे खाओ। लोग सोचते थे, ये कैसे जनता के नेता हैं, जिनको जनता की तकलीफों का ही ध्यान नहीं है। कई बार लोग गालियाँ भी देते थे। लेकिन अब अखिलेश के साथ ऐसा नहीं है। कोई ताम-झाम नहीं, कोई काफिला नहीं, किसी को कोई परेशानी नहीं। मुख्यमंत्री निकल जाते हैं, आम लोगों को पता ही नहीं चलता है, उनका रास्ता नहीं रुकता है, उन्हें कोई कठिनाई नहीं होती है।

इतना ही नहीं किसी को भी मुख्यमंत्री से मिलना है तो रास्ते खुले हुए हैं। ज्यादा छानबीन नहीं, रोक-टोक नहीं। कोई अदना से अदना आदमी भी पहुंच सकता है, अपनी बात कह सकता है, अपना दुख बयान कर सकता है। यह मुख्यमंत्री का नहीं जनता का दरबार है और अपने ही दरबार में  आखिर जनता को क्यों कोई दिक्कत होगी। मुख्यमंत्री की शैली है, लोगों के पास होने की। बहुत सहज है कि वे अफसरों से भी ऐसी ही उम्मीद करेंगे। जनता ने तो अपना काम कर दिया है, अब सरकार की बारी है। जिस उम्मीद से, जिस सपने से लोगों ने समाजवादी पार्टी को सत्ता तक पहुंचाया है, वे उम्मीदें, वे सपने टूटने नहीं चाहिए। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को मुख्यमंत्री का यह साफ संदेश है। कोई लिखा हुआ नहीं, उनके व्यवहार से, उनकी अपनी कार्यशैली से। समय से कार्यालय आइये, जनता की पीड़ा कम करने के लिए जितना कर सकें, करिये।

यह सच्चे अर्थों में समाजवादी जनतांत्रीकरण की ओर मुख्यमंत्री अखिलेश के बढ़ते कदम हैं। केवल जनतंत्र कई बार अराजक और सीमित तानाशाही का शिकार हो जाता है। जैसा मायावती के काल में हुआ। सरकार तक जनता की पहुंच ही नहीं थी, सारे रास्ते बंद थे। पर समाजवाद राजनीति की एक जनोन्मुख धारा है। जनता से फासला भी हो और समाजवाद भी हो, यह संभव नहीं है। मुख्यमंत्री इसी समाजवादी लोकतंत्र के सपने को साकार करना चाहते हैं। इसीलिए वे अपने निर्णयों में जनता को शामिल होते देखना चाहते हैं, अपने व्यवहार में जनता के बीच के आदमी की तरह प्रस्तुत होते दिखना चाहते हैं। यह बदलाव की दुधारी तलवार है लेकिन एक युवा नेता इस रास्ते पर चलने की हिम्मत जुटाकर आगे बढ़ रहा है तो हम सबको उसे थोड़ा वक्त देना चाहिए, उसकी मदद करनी चाहिए। अगर लोग इतना कर पाये तो मुख्यमंत्री अखिलेश इससे बहुत ज्यादा वापस लौटा सकेंगे, ऐसा भरोसा बने रहना यकीनन बहुत जरूरी है।

लेखक डा. सुभाष राय अमर उजाला, डीएलए और जनसंदेश टाइम्‍स के संपादक रह चुके हैं. इन दिनों लखनऊ से

प्रकाशित डेली न्‍यूज एक्टिविस्‍ट के प्रधान संपादक हैं. साहित्य, अध्यात्म, आंदोलन से गहरा जुड़ाव रखने वाले डा. सुभाष के लिखे इस लेख को डेली न्‍यूज एक्टिविस्‍ट से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है

 

 

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