समाजशास्त्री नंदी का हंगामे से विचलित होकर सफाई देना उचित नहीं लगता

: विचारों के गणतंत्र की सच्चाई! : प्रख्यात समाज शास्त्री आशीष नंदी ने जयपुर साहित्य सम्मेलन के रिपब्लिक आफ आइडियाज अर्थात ‘‘विचारों का गणतंत्र’’ नामक सत्र में बोल रहे थे। दलितों व पिछड़ों को सबसे ज्यादा भ्रष्ट तो बताया ही, साथ ही पश्चिम बंगाल का उदाहरण देते हुए यह भी कहा कि वहां भ्रष्टाचार सबसे कम इसलिए है क्योंकि वहां पिछले 100 साल में दलितों व पिछड़ों को सत्ता के नजदीक आने का मौका ही नहीं मिला। नंदी के यह बयान देते ही हंगामा मच गया।

सबसे पहले मंच पर उन्हीं के साथ बैठे पत्रकार आशुतोष ने उनके कथन से अपना विरोध दर्ज कराया। उसके बाद तो यह बयान मंच और जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल परिसर की सीमाएं लांघ कर राजनीतिक हल्कों में जा पहुंचा। राजस्थान के मीणा एवं जाट जातियों के कुछ नेता तो जेएलएफ परिसर तक आ पहुंचे। अनहोनी की आशंका को देखते हुए सम्मेलन परिसर में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ानी पड़ी। मामला बिगड़ता देख सम्मेलन के आयोजकों ने शाम होते-होते आशीष नंदी को अपने बयान पर सफाई पेश करने के लिए राजी कर लिया। इसके लिए बुलाए गए संवाददाता सम्मेलन में आकर नंदी ने कहा कि उनके बयान का वह अर्थ नहीं था, जो समझा गया।

वह कहना चाहते थे कि अमीर लोगों के पास और अमीर होने के कई तरीके होते हैं, इन तरीकों से किया गया भ्रष्टाचार आसानी से छुप जाता है। जबकि दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग द्वारा की गई छोटी सी भी गलती बड़ी आसानी से लोगों के सामने आ जाती है। इसके बावजूद ये नेता संतुष्ट नहीं हुए। जिसके फलस्वरूप आशीष नंदी के खिलाफ जयपुर के अशोक नगर थाने में एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज कर लिया गया है। क्या यह है विचारों का गणतंत्र?

श्री नंदी आलोचक और समाजशास्त्री हैं, लेकिन भ्रष्टाचार को किसी जाति से जोड़ा जाना सर्वथा गलत है। बात चाहे किसी भी परिप्रेक्ष्य में कही गई हो, यह बयान हमारे समाज में स्वीकार्य नहीं है। सच्चाई की तह तक जाने की बजाय सीधे-सीधे नंदी को घेरकर बयान बदलवाकर लीपापोती कराना ही वैचारिक गणतंत्र है।सारा घटनाक्रम सबके सामने है।

समाजशास्त्री आशीष नंदी के दो टूक बयान की तह में जाया जाये यानी उसके मर्म को समझा जाये तो स्पष्ट है कि अज्ञानता और संस्कारहीनता ही प्रदूषित आचरण  (भ्रष्टाचार) की बुनियाद है। ज्ञान की पहली सीढ़ी जिज्ञासा  और संस्कार का प्रथम सोपान सत्यनिष्ठा है। अज्ञानता और असंस्कार सवर्णों में भी है, और ज्ञान-संस्कार एससी, एसटी व ओसीबी में, किन्तु उनकी गिनती बहुत कम है, लिहाजा बाहुल्य के अनुसार सवर्ण सदाचारी हैं। यह वैचारिक चिंतन रहा होगा समाजशास्त्री नंदी का।

इस सच्चाई को व्यवहार में देखें, तो छात्रवृत्ति और आरक्षण गैरसवर्णो को अपाहिज बनाने वाली बैशाखी हैं। यहीं से शुरू हो जाता है भ्रष्टाचार। क्योंकि महत्वाकांक्षी सवर्ण आरक्षण का विकल्प रिश्वत देकर निकाल लेते हैं। आरक्षण अथवा रिश्वत देकर पद-प्रतिष्ठा पाते हैं, वे जनसामान्य की दृष्टि में विश्वास पात्र नहीं हो पाते क्योंकि अज्ञानता व संस्कारहीनताजन्य ‘भ्रष्ट-आचरण’ को जनभावना की उपेक्षा का शिकार बना देती है, जिसका परिणाम यह है कि बस्ता, कापी-किताबें, मिड-डे-मील, बजीफा व फीस माफी के बावजूद अभिभावक भार्री आिथक बोझ वहनकर प्राइवेट स्कूल में अपने बच्चों को दाखिला कराता है, यही स्थिति सरकारी अस्पतालों की तुलना में प्राइवेट चिकित्सालयों की है। समाजशास्त्र के मूल-तत्व की अभिव्यक्ति में समाजशास्त्री नंदी का हंगामे से विचलित होकर अनापेक्षित सफाई देना उचित नहीं लगता।

देवेश शास्त्री का विश्लेषण.

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