समाज में मुख्यधारा नामक कोई धारा नहीं होती : अनिल चमाडि़या

‘फारवर्ड प्रेस’ एक मासिक पत्रिका भर नहीं है। यह पत्रकारिता का नया प्रयोग है। उपेक्षा को स्वर देने का घोषित स्तर पर इतना बड़ा प्रयास कुछ गुस्से में और कुछ प्रतिक्रिया में आज तक नहीं हुआ। व्यापक दायरे की सामग्री देने की जो कोशिश ‘फॉरवर्ड प्रेस’ के जरिए की जा रही है, उसे ना केवल निरंतर जारी रखने बल्कि तेजी से विकसित करने की जरूरत है। यह निष्कर्ष भारत की पहली हिन्दी-अंग्रेजी द्विभाषी मासिक पत्रिका ‘फॉरवर्ड प्रेस’ के पत्रकारों की दो दिवसीय कार्यशाला में सामने आया। कार्यशाला 21 व 22 जून 2013 को नई दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में सम्पन्न हुई। कार्यशाला में देशभर के 30 से अधिक पत्रकारों ने भाग लिया।

प्रबंध संपादक के रूप में प्रमोद रंजन के पद संभालने के बाद फारवर्ड प्रेस की प्रगति के प्रयासों की एक कड़ी यह कार्यशाला थी। कार्यशाला की अहम चुनौती और बहस का मुद्दा था कि सूचना तंत्र के इस विकसित युग में मासिक प्रिंट पत्रिका की अलग पहचान और अस्तित्व को कैसे बरकरार रखा जाए।

प्रधान संपादक आइवन कोस्का ने तीन सत्रों में ‘फॉरवर्ड प्रेस’ के इतिहास, दृष्टिकोण और मूल्यों को वैज्ञानिक तरीके से विस्तार से पत्रकारों के सामने रखा। उन्होंने सवाल-जवाब के जरिए अपनी बातें स्पष्ट कीं। ‘फॉरवर्ड प्रेस’ के योगदानी संपादक और ग्लोबल स्टडीज यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर डॉ. थॉम वोल्फ ने ‘वे फॉरवर्ड फॉर बहुजन भारत’ विषय पर महात्मा गांधी, ज्योतिबा फुले, डॉ. अंबेडकर, कार्ल मार्क्स, टॉमस पेन, रॉबर्ट बी. एजर्टन आदि विचारकों के अध्ययन को सार रूप में प्रस्तुत किया। शोधार्थी केविन ब्रिकमन ने भारतीय संविधान और सामाजिक चुनौतियों के संदर्भ में ‘डॉ अम्बेडकर्स प्रोग्रेस-प्रोन प्रीएम्बल’ विषय पर विचार रखे।

‘जन मीडिया’ के संपादक अनिल चमड़िया ने ‘कैसे करें बहुजन पत्रकारिता : किन विषयों को उठाए फॉरवर्ड प्रेस’ विषय पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि हर क्षेत्र में रूप बदल रहा है परंतु परिस्थितियां वही हैं। समाज में मुख्यधारा नामक कोई धारा नहीं होती। असल में यह वर्चस्वधारा है। इस वर्चस्वधारा से मुकाबला करना है तो नदी के किनारे स्थित मोटे तने का पेड़ नहीं छोटी सी मछली बनना होगा जो धारा के विपरीत चलने का प्रयास करती है, अपने जिंदा होने का सबूत देती है। दौड़ने से पहले सोचने की आदत डालनी होगी। दिमाग का दायरा सीमित नहीं रखना होगा और हमेशा धुरी का ध्यान रखना होगा। जय-पराजय का नहीं बल्कि समानता का माहौल बनाना होगा। कार्यशाला का संचालन प्रबंध संपादक प्रमोद रंजन ने किया। चेयरपर्सन श्रीमती सिल्विया कोस्का ने सभी का धन्यवाद दिया।

कार्यशाला कुछ हटकर रही। ‘फॉरवर्ड प्रेस’ के द्विभाषी तेवर की तरह आइवन कोस्का, डॉ. वोल्फ, केविन आदि के अंग्रेजी विचारों का वाक्य दर वाक्य बनारस के संवाददाता अशोक कुमार वर्मा ने हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत किया। ‘फॉरवर्ड प्रेस’ ने संभागियों को ढेर सारी पुस्तकें और पत्रिकाएं आदि अध्ययन सामग्री निशुल्क प्रदान की। संभागियों को रोल प्ले, पीपीडी प्रजेंटेशन के माध्यम से व्यावहारिक जानकारी दी गई। ‘फॉरवर्ड प्रेस’ से जुड़े पत्रकारों को खुद पहली बार पता लगा कि उनके ज्यादातर साथी किसी ना किसी जागरूकता आंदोलन में सक्रिय रहे हैं या किसी प्रतिष्ठित दैनिक में पांच से पच्चीस साल जुड़े रहे हैं या आज भी जुडे़ हैं और ज्यादातर ने कोई ना कोई पुस्तक, शोध या अध्ययन किया है।

कार्यशाला में जिन संवाददाताओं ने भाग लिया उनमें चेयर पर्सन सिल्विया कोस्का, प्रधान संपादक आइवन कोस्का, प्रबंध संपादक प्रमोद रंजन, सहायक संपादक पंकज चौधरी, मुख्य संवाददाता अमरेंद्र कुमार आर्य, विशेष संवाददाता अशोक चौधरी, सासाराम से असलम परवेज, बनारस से अशोक कुमार आर्य, पटना से अरूण कुमार, अहमदाबाद से अरनोल क्रिस्टी, लखनऊ से अनुराग भास्कर, दिल्ली से लीलाधर शर्मा, साहिबाबाद से मुकेश कुमार तिवारी, कोलकाता से पापरी चंदा, बाघा से पंकज कुमार, लुधियाना से राजेश मचल, आगरा से राजीव आजाद, अजमेर से राजेंद्र हाड़ा, अम्बामठ से सचिन गरूड, नारनौल से संजय मान, बरेली से शंभु दयाल वाजपेयी, लखनऊ से शाहीद परवेज, नई दिल्ली से राकेश कुमार सिंह और पालम से विपिन कुमार ने भाग लिया।

अजमेर से राजेंद्र हाड़ा की रिपोर्ट.

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