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सुख-दुख...

सरकारी सेवा में होने के बावजूद मणिकांत वाजपेयी ने जेपी आंदोलनकारियों की खबर को प्रसारित किया

मणिकांत वाजपेयी नहीं रहे। जानकर अति दुःख हुआ, मर्मातंक पीड़ा हुई। सरकारी सेवा में रहने के बावजूद तत्कालीन बिहार की मीडिया में बड़े ही लोकप्रिय पत्रकार थे वाजपेयीजी। भारतीय सूचना सेवा के अधिकारी रहे मणिकांत वाजपेयी की सन 1975 में आपातकाल के बाद पोस्टिंग रांची और बाद में पटना में हुई। पत्र सूचना कार्यालय में सूचनाधिकारी तो रहे ही, लंबे समय तक आकाशवाणी के पटना केन्द्र में समाचार संपादक रहे। सरकारी सेवा में रहने के बावजूद सन 74 के जेपी आन्दोलनकारियों की खबर को प्रसारित करने से परहेज नहीं किया। हां शब्दों के चयन में सर्तकता अवश्य बरती।

मणिकांत वाजपेयी नहीं रहे। जानकर अति दुःख हुआ, मर्मातंक पीड़ा हुई। सरकारी सेवा में रहने के बावजूद तत्कालीन बिहार की मीडिया में बड़े ही लोकप्रिय पत्रकार थे वाजपेयीजी। भारतीय सूचना सेवा के अधिकारी रहे मणिकांत वाजपेयी की सन 1975 में आपातकाल के बाद पोस्टिंग रांची और बाद में पटना में हुई। पत्र सूचना कार्यालय में सूचनाधिकारी तो रहे ही, लंबे समय तक आकाशवाणी के पटना केन्द्र में समाचार संपादक रहे। सरकारी सेवा में रहने के बावजूद सन 74 के जेपी आन्दोलनकारियों की खबर को प्रसारित करने से परहेज नहीं किया। हां शब्दों के चयन में सर्तकता अवश्य बरती।

उस वक्त पटना अखबारों की इतनी बड़ी मंडी नहीं बनी थी। ले दे कर हिन्दी में आर्यावर्त और प्रदीप तथा अंग्रेजी में सर्चलाइट व इंडियन नेशन ही प्रमुख पत्र थे। वाराणसी से प्रकाशित आज ने सन 1977 में अपना कार्यालय खोला था जो आकाशवाणी के निकट ही था। बाद में 1979 में इसका प्रकाशन प्रारंभ हुआ।

मणिकांतजी से मेरे पारिवारिक संबंध जैसे थे। मेरे पिता स्वर्गीय रामजी मिश्र मनोहर को वे बड़े भाई के समान मानते थे। उनके पूज्य पिताश्री का पटनासिटी स्थित मेरी कुटिया में आना जाना बना रहता था। उनके उग्रज हों या अनुज सबों के साथ वैसा ही भाव। पटनदेवी का दर्शन करना हो या तख्त श्री हरिमंदिर में मत्था टेकना, प्राचीन काली मंदिर जाना हो या गांधी सरोवर के सुरम्य तट पर किसी गोष्ठी में शामिल होना हो रूखी-सूख्ी रोटी मेरे खपड़ैलनुमा आवास में ही ग्रहण करते थे। मैं उनका यह वाक्य नहीं भूल पा रहा हूं जब उनके अनुज वेदप्रकाश वाजपेयी को कालेज की व्याख्याता कर नौकरी छुड़वा कर मैने पत्रकारिता की ओर खींचा तो उनका स्पष्ट कमेंट था जिसके ब्लड में जर्नलिज्म हो यदि वह उस ओर बुला रहा है तो जाना चाहिए। इससे पहले वेद प्रकाश पटना में फ्रीलांस जर्नलिस्ट के रूप में भी सक्रिय थे। बाद में वे नभाटा के अंग बने फिर डालटनगंज में एक अखबार के संपादक।

खैर यह तो हुई वेदप्रकाश की बात। सन 77 में मैं उतना परिपक्व पत्रकार तो नहीं था लेकिन बिहार विधान मंडल का सत्र प्रारंभ होने पर आकाशवाणी के समाचार प्रभाग में प्रथम दिन की समीक्षात्मक रिपोर्ट के लिए मणिकांतजी मुझे ही आमंत्रित करते थे। यह सिलसिला लंबे काल तक चला। उस वक्त पटना में ख्यातिनाम पत्रकारों की कोई कमी नहीं थी लेकिन उनका तर्क था नवोदित पत्रकारों को पहले मौका देना चाहिए। इस तर्क पर समाचार भारती के तत्कालीन ब्यूरो प्रमुख घनश्याम पंकज चुटकी भी लेते थे। समाचार संपादन की उनकी अदभुत कला का मैं कायल हूं। जितनी तेजी से वे सिगरेट का धुंआ फेकते थे उतनी ही तेजी से उनकी कलम चलती थी। उनके साथ एक नहीं दर्जनों याता्रएं करने का मौका मिला। ज्यादातर बिहार सरकार के विमान से। एक वाक्या अब भी मेरे जेहन कौंध रहा है जब उन्होंने एक आइएएस अधिकारी को कड़ी फटकार ही नहीं लगाई ओहदेदार पद से चौबीस घंटे के भीतर उतरवा दिया। घटना सन 1982-83 की  रही होगी। तत्कालीन मुख्यमंत्री डा. जगन्नाथ मिश्र के साथ पत्रकारों की टीम सहरसा जिला गयी थी। वीरपुर हवाईपटटी पर विमान के लैंड करते ही वहां के डीएम ने एक कार हमलोगों को दे दी। उसमें मेरे और मणिकांतजी के अलावा यूएनआई के ब्यूरोचीफ रहे डीएन झा, सर्चलाइट के अमलेन्दु नारायण सिन्हा भी शामिल थे।

संवाद संकलन के बाद हमलोंगों की टीम वापस बलुआ बाजार लौट रही थी ताकि वहां से फोन के जरिये समाचार को लिखवाया जा सके। उस वक्त घंटों की मशक्कत के बाद टेलीफोन की लाइन मिलती थी। मोबाइल का जमाना था नहीं। अचानक उक्त आइएएस अधिकारी अचानक आ धमके और कार से पूरी टीम को बेदखल कर एक खटारा जीप दे दी, आपलोग इस पर जाइये। सुनसान सड़क एक ओर निर्जन स्थल तो दूसरी ओर गर्जना के साथ बहती कोसी नदी। डर से हाल बुरा था। इस घटना से मणिकांतजी काफी कुपित हुए । शाम के सात बज रहे थे और साढ़े सात बजे प्रादेशिक समाचार प्रसारित होता था जिसमें न्यूज जाना था। साढ़े सात बज गये, सीएम के काफिले की लाइट दिखी, हमलोग अंधेरे में चिल्ला उठे। सीएम कान में छोटा ट्राजिंस्टर लगाये थे लेकिन न्यूज नहीं सुन जिज्ञासा प्रकट की। तत्कालीन सिंचाई मंत्री उमेश्वर प्रसाद वर्मा जिनके विभाग का कार्यक्रम था मामला जान दुखी इुए।

जहां तक मुझे याद है बलुआबाजार में डा. मिश्र के आवास से ही फोन किया गया कार्मिक विभाग के डीएस मुखोपाध्याय को, कहा गया उक्त अधिकारी की गाड़ी अविलंब सीज कर ली जाये। डीएम को आदेश दीजिये और उन्हें पटना बुला लें। अगले ही दिन कैबिनेट की बैठक थी। तब सीएम ही कैबिनेट की प्रेस ब्रीफिंग करते थे। चेंबर में मणिकांतजी भी मौजूद थे। उक्त अधिकारी को देख भड़क उठे। जान कर आश्चर्य होगा कि उक्त अधिकारी के पक्ष में कोसी क्षेत्र के चार मंत्री और कई विधायक खड़े थे लेकिन मुख्यमंत्री ने उनकी एक न सुनी ओर वाजपेयीजी की बात को गंभीरता से लेते हुए यही कहा- आइएएस अधिकारी का दायित्व बनता है कि वह सुनसार रात में राह चलते लोग की खैरियत पूछे उन्हें गंतव्य तक भिजवाने का इंतजाम करे। लेकिन इस अधिकारी ने  तो मेरे ही अतिथि पत्रकारों को सडक पर उतार दिया। उनका तबादला होगा और अवश्य होगा। तो ऐसे महत्वपूर्ण हस्ताक्षर थे मणिकांत वाजपेयी जिनकी बात को मुख्यमंत्री तक नहीं टाल सके। बाद में क्या हुआ इसकी लंबी कहानी है।

पटना के फ्रेजर रोड पर आकाशवाणी और उसके निकट ही था यूएनआई का बिहार ब्यूरो। छोटे-बड़े राजनीतिज्ञों और पत्रकारों का अडडा। वाजपेयीजी साढ़े सात का बुलेटिन प्रसारित करने के बाद अक्सर यहां आया करते थे। राजनीति पर बड़ी-बड़ी बहसें होती थीं। वाजपेयीजी के तर्क के आगे सब चुप हो जाते थे। अपने जमाने में नवोदित पत्रकारों को प्रोत्साहित करने वाले पत्रकारिता के ऐसे पुरोधा को मेरा शत-शत नमन।

लेखक ज्ञानवर्द्धन मिश्र बिहार के वरीय पत्रकार हैं. पिछले 40 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. ये बिहार के एक ऐसे परिवार से आते हैं जिसकी छठी पीढ़ी पत्रकारिता में सक्रिय हैं. श्री मिश्र दैनिक आज, पटना, पाटलिपुत्र टाइम्स, पटना, हिन्दुस्तान, धनबाद के प्रभारी संपादक और सन्मार्ग रांची के संपादक रह चुके हैं. इनसे संपर्क 09835014480 के जरिए किया जा सकता है.


मूल खबर…

पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी के पिता मणिकांत बाजपेयी का निधन

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