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सरकारें बिलकुल नहीं चाहतीं कि लोग पढ़ें

Dayanand Pandey : बीते 19 मई को दिल्ली में अखिल भारतीय हिंदी प्रकाशक संघ के वार्षिक सम्मेलन में बतौर मुख्य अतिथि जाना हुआ। इस सम्मेलन में मैं ने लेखक-पाठक-प्रकाशक संबंध ख्त्म होते जाने की चिंता जताई और कहा कि अगर सवा अरब के देश में कोई प्रकाशक हिंदी में कुछ सौ या हज़ार किताबें छापता है तो यह सिर्फ़ और सिर्फ़ शर्म का विषय है। चेतन भगत अगर सालाना सात करोड़ रुपए की रायल्टी अंगरेजी में लिख कर ले लेते हैं और एक हिंदी का प्रकाशक इतने का सालाना व्यवसाय भी नहीं कर पाता तो यह बड़ी चिंता का विषय है।

Dayanand Pandey : बीते 19 मई को दिल्ली में अखिल भारतीय हिंदी प्रकाशक संघ के वार्षिक सम्मेलन में बतौर मुख्य अतिथि जाना हुआ। इस सम्मेलन में मैं ने लेखक-पाठक-प्रकाशक संबंध ख्त्म होते जाने की चिंता जताई और कहा कि अगर सवा अरब के देश में कोई प्रकाशक हिंदी में कुछ सौ या हज़ार किताबें छापता है तो यह सिर्फ़ और सिर्फ़ शर्म का विषय है। चेतन भगत अगर सालाना सात करोड़ रुपए की रायल्टी अंगरेजी में लिख कर ले लेते हैं और एक हिंदी का प्रकाशक इतने का सालाना व्यवसाय भी नहीं कर पाता तो यह बड़ी चिंता का विषय है।

पाठकों को कैसे जोड़ा जाए इस पर सोचना बहुत ज़रुरी है। क्यों कि इस वक्त ज़मीनी सचाई यह है कि हिंदी दुनिया के बाज़ार में सब से ज़्यादा बोली और जानी जाने वली भाषा है। और कोई भी भाषा बनती है बाज़ार और रोजगार से। प्रकाशक सरकारी खरीद के अफ़ीम से बाहर निकलें और पाठकों से सीधे जुड़ें। तभी हिंदी के पाठक-लेखक और प्रकाशक के संबंध पुनर्जीवित होंगे। क्यों कि कोई भी व्यवसाय सिर्फ़ सरकारी खरीद के भरोसे ज़िंदा नही रह सकता।

वैसे भी सरकारें बिलकुल नहीं चाहतीं कि लोग पढ़ें। क्यों कि अगर पढ़ेंगे तो सोचेंगे। और सोचेंगे तो सरकार के खिलाफ़ ही सोचेंगे। व्यवस्था के खिलाफ़ ही सोचेंगे। खुशी की बात है कि प्रकाशक दोस्तों ने मेरी इन बातों से न सिर्फ़ सहमति जताई बल्कि तालियां भी बजाईं और इस बारे में नए प्रयास शुरु करने का भरोसा भी दिलाया। इस लिए भी कि वह खुद कटते जा रहे पाठकों की समस्या से से चिंतित दिखे। देखिए कि आगे क्या होता है। बातें और भी बहुत हुईं। फ़िलहाल उस मौके की कुछ फ़ोटुएं यहां हाजिर कर रहा हूं जो मुझे आज ही मिली हैं।

वरिष्‍ठ पत्रकार एवं उपन्‍यासकार दयानंद पांडेय के एफबी वॉल से साभार.

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