सरकार-नवाबों पर भारी पड़ रहे वजीरे आला आजम

समाजवादी सरकार में फिर हचचल है। मुस्लिम सियासत में पैठ बनाने को आतुर आजम साहब फिर नाराज हो गये हैं। उनका निशाना हमेशा सधा रहता है, अबकी बार भी ऐसा ही है। एक तरफ तो उन्होंने अपने गृह जनपद रामपुर में नवाब खानदान के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है तो दूसरी तरफ लखनऊ में उनके निशाने पर अहमद हसन (अखिलेश सरकार में कैबिनेट मंत्री) जैसे कुछ साथी, तमाम नौकरशाह, कुछ अधीनस्थ कर्मचारी और मीडिया चढ़ा रहता है। वह किसी को नहीं छोड़ते, यहां तक कि मुलायम को भी मौका पड़ने पर वह अपने तेवर दिखा देते हैं। फिर भी वह सरकार की ‘नाक के बाल’ बने हुए हैं तो यह उनकी काबलियत ही है। भले ही सपा महासचिव राम गोपाल यादव, सांसद नरेश अग्रवाल, अहमद बुखारी जैसे तमाम नेताओं को आजम मंजूर नहीं हो, लेकिन वह मुलायम की चाहत हैं तो कोई मुंह नहीं खोलता है।
 
अपने बयानों से सुर्खियां बटोरने वाले समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता और नगर विकास मंत्री आजम खान ने अबकी से तो हद ही कर दी। अपना मुस्लिम चेहरा चमकाने के लिए उन्होंने कुछ बड़ा ही निशाना लगा दिया। भले ही ऐसा करने से उन्होंने खूब सुर्खियां बटोरी हो लेकिन पार्टी और अखिलेश सरकार के कई नेता और मंत्रियों को आजम की बदजुबानी रास नहीं आ रही है। इस बार समाजवादी सरकार में कैबिनेट आजम खान के ‘रडार’ पर उनके ही मुख्यमंत्री और पुत्र समान अखिलेश यादव आ गये। आजम की नाराजगी की वजह तो हज हाउस के लिये पैसा नहीं मिलना है, लेकिन इसकी जड़ में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव थे। आजम ने सीएम पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि गाजियाबाद में बनने वाले हज हाउस के लिए वित्त विभाग एक तो समय से धन नहीं मुहैया करा रहा है, दूसरे अनावश्यक अड़गेबाजी डाल रहा हैं। आजम के इस बयान ने सत्ता के गलियारों में हड़कम्प मचा दिया है। आजम के गुस्से का आलम यह था कि उन्होंने यहां तक ऐलान कर दिया कि हज कमेटी अब हज हाउस बनाने की इच्छुक नहीं है, अच्छा होगा कि हज हाउस की इमारत को जमीन सहित किसी दूसरे काम में ले लिया जाए। सरकार जमीन क्या वापस लेगी, परंतु आजम के रूठने व मनाने की घटनाओं में यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि जिसे लोग सरकार का सबसे कद्दावर मंत्री मानते हैं। अगर वह ही सरकार की फजीहत करने का कोई मौका नहीं छोड़ता है तो औरों का क्या हाल होगा। 
 
बात आजम की नाराजगी की कि जाये तो यह पहला मौका नहीं है,जब आजम नाराज हुए हैं। अभी हाल ही में आजम बनाम उनके स्टाफ का झगड़ा पूरी सरकार के लिए मुसीबत बना रहा। इस झगड़े की जड़ में भी आज का गुस्सा ही था। दो महीने पहले विहिप के नेताओं व सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की मुलाकात पर भी आजम का गुस्सा सार्वजनिक हुआ था। उन्होंने यह संकोच भी नहीं किया कि निशाने पर उनके नेताजी हैं गुस्से में आजम ने यहां तक कह दिया कि जो लोग बाबरी मस्जिद की शहादत के दोषी हैं उनसे मुलाकात करने का क्या औचित्य। मुलायम और अखिलेश पर उंगली उठाते समय आजम खान साहब भूल जाते हैं कि आज वह भले ही बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हों लेकिन अतीत में वह बाबरी मस्जिद विध्वंस के सबसे बड़े आरोपी पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के पुत्र राजवीर सिंह और एक समय में कल्याण की करीबी रहीं कुसुम राय के साथ 2003 में मुलायम मंत्रिमडल की शोभा में चार चांद लगाया करते थे। उन्हें तब इस बात से भी गुरेज नहीं था कि बाबरी विध्वंस के आरोपी पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की बैसाखी के सहारे ही मुलायम की समाजवादी सरकार चल रही थी।
 
आजम के लिये ने संविधान की कोई महत्ता है न सरकार का रूतबा। इसी वजह से वह कैबिनेट मीटिंग का बहिष्कार करने का कारनामा भी कई बार कर चुके हैं। किसी बात पर नाराज होकर वे कैबिनेट की कई बैठकों में नहीं गए तो आगरा में हुए अधिवेशन का भी बहिष्कार कर दिया। मुजफ्फरनगर कांड पर वे इतने नाराज हो गए कि कार्यमंत्रणा समिति की बैठक में ही शामिल नहीं हुए जिससे सरकार की भद्द पिट गई। सरकार ने उनसे मेरठ का प्रभार लेकर दूसरे मंत्री को सौंप दिया तो नाराज आजम ने सरकार के खिलाफ आर-पार के लिए उतरने में देर नहीं लगाई। उन्होंने मुख्यमंत्री को चिठ्ठी लिखकर अपने त्यागपत्र की पेशकश तक कर डाली थी। आजम ने स्वास्थ्य विभाग संभालने वाले मंत्री अहमद हसन तक को नहीं छोड़ा, प्रमुख सचिव स्वास्थ प्रवीण कुमार पर आरेाप लगाया कि वे मजहब के आधार पर काम करते हैं। 
 
आजम को गुस्सा जल्दी आता है तो उनके बयान अक्सर सरकार के लिए मुसीबत व किरकिरी बनते रहते हैं। आजम ने एक बार इशारों-इशारों में बुखारी पर हमला बोलते हुए कह दिया कि दाढ़ी रखने से ही कोई मुसलमान नहीं हो जाता। इस पर खूब बखेड़ा हुआ। मौलाना बुखारी को जैसे तैसे मुलायम ने मनाया। एक बार लाट साहब भी आजम के निशाने पर आ गये और उन्होंने बिना किसी संकोच के उन्हें नसीहत दे दी कि जौहर विश्वविद्यालय पर अगर राज्यपाल पुनर्विचार नहीं कर सकते तो उसे विभानसभा को वापस कर दें। आजम के इस बयान से उत्पन्न तनाव को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने राज्यपाल बीएल जोशी से मिलकर शांत कराया। 
 
विधान परिषद चुनाव के वक्त बुखारी के दामाद उमर को पार्टी ने उम्मीदवार बनाया तब भी वह अपना गुस्सा सार्वजनिक किए बगैर नहीं रह पाये थे। उन्होंने कहा जो व्यक्ति 80 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले क्षेत्र से चुनाव नहीं जीत सकता है उसको सपा द्वारा विधान परिषद का प्रत्याशी बनाने का क्या मतलब है। आईएएस अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल के निलंबन प्रकरण में भी आजम सरकार के अलग खड़े नजर आए। सरकार कहती रही नागपाल को एक धर्मस्थल की दीवार गिरने के कारण निलंबित किया गया हैं पर आजम ने 'राम नाम की लूट है लूट सके तो लूट' कहकर सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया। आजम के ताजा गुस्से के बाद यह सवाल उठने लगे हैं कि सरकार के भीतर क्या सब कुछ ठीक ठाक नहीं चल रहा है। आजम जैसे कद्दावर मंत्री को अपनी शिकायत जताने के लिए चिट्ठी लिखने की जरूरत पड़ रही है, जो भी हो विपक्षी दलों को सपा पर निशाना साधने का मौका जरूर मिल गया है। 
 
आजम की सरकार में क्या हैसियत है, इस बात का अहसास नौकरशाही को अच्छी तरह से है। यही वजह थी गाजियाबाद हज हाउस पर वित्त विभाग की टिप्पणियों से गुस्साए आजम खान की चिट्ठी का असर तुरंत ही सरकारी मशीनरी पर दिखा। अल्पसंख्यक विभाग से लेकर वित्त विभाग तक में दस्तावेज खंगाले जाने लगे। मुख्य सचिव ने भी संबंधित विभागों के अधिकारियों को तलब कर पूरे मामले की पड़ताल शुरू कर दी। उन्होंने जिम्मेदार अधिकारियों से इस मामले को जल्दी हल करने को कहा। गौरतलब हो, आजम ने गाजियाबाद हज हाउस में वित्त विभाग की आपत्तियों पर नाराजगी जताते हुए मुख्य सचिव को एक कड़ा पत्र लिखा था। इसी पत्र के बाद अल्पसंख्यक विभाग के सचिव देवेश चतुर्वेदी ने भी पूरे मामले की फाइल तलब की। हज समिति के ऑफिस से लेकर निदेशक अल्पसंख्यक कल्याण से भी मामले की पूछताछ की गई। वित्त विभाग के अधिकारियों ने भी इस मसले पर एक बैठक की।  प्रमुख सचिव वित्त आनंद मिश्र ने भी वित्त विभाग के अधिकारियों को बुलाकर पत्रावलियों में देखा कि उन लोगों ने जो आपत्तियां लगाई है वे नियमों के अनुसार हैं या नही। पता चला कि जो आपत्तियां लगाई है वे प्रावधानों के अनुसार ही हैं। वित्त विभाग की सबसे बड़ी आपत्ति यह थी कि गाजियाबाद हज हाउस के लिए जारी धन लखनऊ हज हाउस में क्यों लगा दिया गया? लेकिन मामला आजम से जुड़ा था तो तमाम किंतु परंतुओं को दरकिनार करके आजम के मनमाफिक रिपोर्ट बनाने की तैयारी शुरू हो गई है।
 
एक तरफ वह अपनी ही सरकार से नाराज हैं तो दूसरी तरफ रामपुर की सियासत में अ़च्छी खासी दखल रखने वाले नवाब खानदान पर हमलावर हो रखे हैं। नवाब खानदान के लिये उनके श्रीमुंख से शायद ही कोई अच्छी बात निकलती हो। यह अदावत पिछले दिनों नये मुकाम पर पहुंच गई। दरअसल, आजम साहब रामपुर शहर में नवाबी दौर में बनाये गये द्वारों को ढहवाने के बाद अब करीब सवा सौ साल पुराने ‘रामपुर किले’ के द्वारों को भी ढहाने के लिये जिला प्रशासन पर दबाव बना रहे हैं। उन्होंने बाकायदा जिलाधिकारी को पत्र लिखकर कहा है कि शहर के बीचों-बीच बना हुआ किला पूरे शहर की सुंदरता को धूप और रोशनी से रोक रहा है और इसे रामपुर वालों के लिये प्रकोप के तौर पर महसूस किया जा रहा है। किले के दोनों द्वार जीर्ण-शीर्ण हो गये हैं, जिससे बड़ा हादसा हो सकता है। इस तरह की इमारतें अपराध का कारण भी बनती हैं। इन दरवाजों में बनी कोठरियों में कुकर्म किया जाता है। अतः इसे ढहा दिया जाये। जिलाधिकारी के लिये आजम की सिफारिश को अनदेखा करना आसान नहीं होगा, वहीं नवाब घराने की बहू और कांग्रेस की पूर्व सांसद नूर बानों का कहना था कि यह इमारत सौ-सवा सौ साल पुरानी है। इसको संरक्षण मिलना चाहिए, लेकिन अगर कोई सनकी वजीर इसे गिराने की बात कहता है तो क्या कहा जा सकता है।
 
लेखक अजय कुमार से ajaimayanews@gmail.com के जरिेए संपर्क किया जा सकता है.

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