सर, चालू टीवी पर प्रोग्राम में कई हिस्से होंगे, जैसे – किलिंग किस, कातिल सिसकी, बचना ए हसीनों आदि

होली पर चालू टीवी चैनल ने सोचा कि कुछ खास, एकदम खास प्रोग्राम होना मंगता। स्पेशल डिस्कशन के लिए प्राइम टाइम के उस भूत को बुलाया गया, जिसकी बाइट्स चैनल के प्राइम टाइम पर चलती थीं। एक देवता भी बुलाया गया। देवता मतलब वह इंसान ही था, पर खुद को देवता मानता था। उसके एक दामाद की समोसों की दुकान थी और दूसरे का कारोबार टमाटर के सॉस का था।

वह देवता हर बीमारी का इलाज ये ही बताता था कि इन वाले समोसों को उस वाले टमाटर सॉस के साथ खाया जाये, तो हर प्राबलम साल्व। किरपा बरसेगी। नहीं बरसी, तो हमारी गलती ना है। किरपा की गलती है। फिर खाओ समोसा और सॉस, किरपा अब बरसेगी। फिर भी ना किरपा ना बरसे, तो हम पे ना बरसो, कहीं और जाकर अपनी समस्या रखो।

तो शो में प्राइम टाइम का भूत था, देवता थे और एक भूतपूर्व डाकू था, जो अब टीवी शो का लेखक बनने की इच्छा रखता था। खैर जी शो में एक इंसान को भी रख लिया। मसला-ए-डिबेट ये रहा कि टीवी चैनल किसकी वजह से चल रहे हैं। टीवी चैनलों की सफलता में किसका रोल बहुत खास है। इंसान ने कहा, 'हमारी स्टोरियों से टीवी चैनल चल रहे हैं- सस्ती कार की स्टोरी, बेकार की स्टोरी, महंगाई की स्टोरी, मजदूरों की पिटाई की स्टोरी, नेताओं की बदमाशी की हाइट की स्टोरी, महंगे पेट्रोल पर आम आदमी की बाइट की स्टोरी, करीब एक करोड़ लोग देखते हैं हमें। आम इंसान के बूते ही चल रहे हैं ये चैनल।'

देवता ने कहा, 'शटअप, पूजा चैनल, तुझ बिना ना दूजा चैनल, देव चैनल, त्रिदेव चैनल, योग चैनल, प्रयोग चैनल, प्रवचन चैनल सिर्फ हमारे बूते चल रहे हैं। किरपा बरसा दें हम, जिसे चाहें उसे तरसा दें हम। हमारे चैनल पर तरह-तरह की मां हैं, तरह, तरह के बाप हैं, हुजूर इन्हे देखने वाले आप हैं। देवता-बाबा लोग ही चैनल चला रहे हैं। हमें देखने वाले ज्यादा हैं, पाँच करोड़।' भूत बोला, 'चोप्प, खून चैनल, मून चैनल, कटारी चैनल, मारामारी चैनल, कब्रिस्तान चैनल; सिर्फ हमारे बूते चल रहे हैं। और इन्हें देखने वाले हैं पचास करोड़। खतरनाक चुड़ैल की बगावत, अमेरिकन भूतनी का बंगलादेशी भूत से लव अफेयर उसमें इंडियन भूत का लव ट्रेंगल, इन स्टोरियों को देखने वाले करोड़ों में है।'

टीवी के दर्शकों के आंकड़े देखे गये। देवता, और इंसान चुप हो गये। इंसान को समझ आ गया कि उसका रोल तो सिर्फ देखने का है, देखते ही रहने का है। डिस्कशन से अचानक भूतपूर्व डाकू और अभूतपूर्व लेखक गायब मिला, वह उस चैनल के चीफ से बातचीत करता हुआ पाया गया। चैनल चीफ और उसके बीच का संवाद इस प्रकार है-

चैनल चीफ ने कहा, 'न्यूज चैनलों के टॉप टेन कार्यक्रमों में से आठ क्राइम के हैं, सो ऐसा क्राइम शो लिखना मांगता, जिसमें क्राइम हो, सेक्स हो, हॉरर हो, टेरर हो, जिसमें बिच्छू बवाली से लेकर लच्छू डकैत तक को और चक्रू चोर से लेकर चालू जेबकट को शो किया जा सका।'

'सर, क्राइम शो कभी लिखा नही है, पर मुझे लगता है कि मैं लिख सकता हूं क्योंकि बेसिरपैर के ख्याल मुझे अकसर आते हैं। इजाजत हो, तो पेश करुं', भूतपूर्व डाकू ने बताया।

चैनल चीफ ने हाथ से रिवाल्वर चलाने का इशारा किया-यानी इजाजत मिल गयी थी।

डाकू शुरु हुआ, 'सर मैं आगरा का रहने वाला हूं। आगरा के पास बाह है। बाह के पास चंबल है। चंबल के पास ग्वालियर है। इन सब इलाकों के आसपास कुछ भूतपूर्व डकैत हैं। इनमें से एक को मैं पकड़ लाऊँगा। उसका प्रचार हम इस तरह से करेंगे-नाहरसिंह का क्राइम शो। पांच हजार लूट और दस हजार अपहरण करने के बाद आत्मसमर्पण करने वाले प्रख्यात सेंसेशनल डाकू नाहरसिंह पेश करेंगे क्राइम शो, सिर्फ और सिर्फ इसी चैनल पर-नाहरसिंह का क्राइम शो।'

वंडरफुल-चैनल चीफ ने कहा।

सर, नाहरसिंह की भारी लंबी-चौड़ी मूंछें होंगी। डरावना होगा हमारा एंकर, जिस दिन कोई डरावनी क्राइम स्टोरी नहीं होगी, वह खुद दहाड़कर पब्लिक को डरा देगा। सर, प्रोग्राम में कई हिस्से होंगे-जैसे किलिंग किस, कातिल सिसकी, बचना ए हसीनों, तेरा माल तड़ीपार, भूतों का कहर। सर क्या शो बनेगा सर, और डर भी रहा है कि कहीं चैनल चीफ उसे भगा न दे।

पर ये क्या, चैनल चीफ कह रहा है, 'तुस्सी तो ग्रेट थिंकर हो जी, कहां छिपे बैठे हो। छोड़ो सब कुछ क्राइम शो बनाओ।'

पर ये क्या? डाकू कह रहा है कि बस एक दिक्कत है-कि शो बनाने में लगता हूं, तो मेरी आत्मा मुझे डांटती है-अबे तू अभी भी डाकू ही है।

चैनल चीफ समझा रहा है डाकू को, 'प्यारे चिंता मत करे, क्राइम शो में इतनी रकम मिलेगी कि उस रकम के नीचे तेरी टुन्नी सी आत्मा दब जायेगी।

डाकू सहमत हो गया है। नाहरसिंह का क्राइम शो जल्दी ही किसी टीवी चैनल पर आयेगा। इस बार होली पर सबसे ज्यादा टीआरपी नाहर सिंह के क्राइम शो की ही होगी। भूतों के शो से भी बहुत ज्यादा, करीब सौ करोड़ लोग देखेंगे इस शो को।

और इंसान का रोल क्या रहेगा, लो जी आप फिर वो ही सवाल पूछ रहे हैं, इंसान का रोल तो सिर्फ देखने का है ना। देखिये, देखिये और क्या जी!

जानेमाने व्‍यंग्‍यकार आलोक पुराणिक के ब्‍लॉग से साभार.

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