साबिर अली प्रकरण भाजपा की अंतर्कलह को दे गया नई ‘खुराक’

लोक कहावत है, ‘सिर मुंड़ाते ही ओले पड़े’। यह लोक मुहावरा चर्चित नेता साबिर अली पर एकदम चस्पा हो गया है। जदयू के तेज-तर्रार प्रवक्ता रहे साबिर अली पिछले दिनों अपनी पार्टी से नाराज हुए थे। क्योंकि, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्यसभा में उन्हें दोबारा नामित करने की सिफारिश नहीं की थी। राज्यसभा में दोबारा भेजने के बजाए उन्हें ऐसी सीट से लोकसभा का टिकट पकड़ा दिया था, जिसमें साबिर अपनी हार तय मान रहे थे। ऐसे में, उन्होंने अपने खांटी सेक्यूलर तेवरों से एकदम ‘यू-टर्न’ लिया और भाजपा के ‘पीएम इन वेटिंग’ नरेंद्र मोदी की तारीफ करने लगे। साबिर की ‘मोदीभक्ति’ देखकर जदयू नेतृत्व ने बगैर किसी देरी के उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया।

इस बीच साबिर अपनी अवसरवादी राजनीति की जुगाड़ तय कर चुके थे। मोदी कीर्तन करते-करते शुक्रवार को वे औपचारिक रूप से भगवा पट्टा धारी बन गए। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव एवं बिहार के संगठन प्रभारी धर्मेंद्र प्रधान ने साबिर को भाजपाई बनाकर भगवा पट्टा पहनाया था। इस एंट्री को लेकर भाजपा नेतृत्व ने यह संदेश देने की कोशिश की थी कि अब तेजी से तमाम दलों के लोग पार्टी में शामिल हो रहे हैं। साबिर ने भी भाजपाई बनते ही मोदी के गुणगान शुरू किए थे। लेकिन, उनकी यह भगवागीरी टिकाऊ साबित नहीं हुई। उन्हें ऐसा झटका लगा है कि उनका पूरा राजनीतिक कैरियर ही अंधे कुएं की तरफ बढ़ गया है।

उल्लेखनीय है कि साबिर के खिलाफ विरोध का पलीता लगाया उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नकवी ने। उन्होंने साबिर की एंट्री के कुछ देर बाद ही ट्वीटर पर तीखा कटाक्ष पोस्ट कर दिया। इसमें कहा गया कि इंडियन मुजाहिदीन के चर्चित आतंकी यासीन भटकल का दोस्त भाजपा में आ गया है। अब आतंकी दाउद इब्राहिम भी पार्टी में आ जाएगा। इस ट्वीटर संदेश ने संघ परिवार में साबिर अली के विरोध की आग भड़का दी। बात ट्वीटर विरोध तक ही नहीं रही, भाजपा के मुस्लिम चेहरे नकवी ने मीडिया से भी कह डाला कि आपराधिक छवि के साबिर को भाजपा में शामिल करके घोर गलत काम किया गया है। इसीलिए वे खुलकर विरोध कर रहे हैं। नकवी ने विरोध किया, तो उत्तर प्रदेश भाजपा के चर्चित नेता विनय कटियार ने भी साबिर को लेकर ‘बजरंगी’ तड़का लगा दिया। उन्होंने इस बात पर हैरानी जताई कि जो शख्स कुछ दिनों पहले तक रोज संघ परिवार को गालियां देता था, मोदी को हत्यारा बताता था। आखिर, उसे कैसे पार्टी में शामिल कर लिया गया?

विरोध का यह सिलसिला संक्रामक वायरस की तरह भाजपा में तेजी से फैला। इसके चलते बिहार भाजपा के कई दिग्गज नेता साबिर प्रकरण को लेकर अपनी भड़ास निकालने लगे। अश्विनी चौबे, गिरीराज सिंह व सीपी ठाकुर जैसे नेताओं ने अपनी नाराजगी जताई। संघ नेतृत्व ने भी संकेत देने शुरू कर दिए थे कि नेतृत्व ने साबिर के मामले में सही फैसला नहीं किया। शुरुआती दौर में विरोध को दबाने की कोशिश की गई। सूत्रों के अनुसार, पार्टी के दो वरिष्ठ नेताओं ने इस मामले में नकवी को भी आड़े हाथों लिया। नेतृत्व के दबाव में ही पार्टी उपाध्यक्ष ने शनिवार की सुबह अपना चर्चित ट्वीट डिलीट कर दिया। इससे शनिवार की सुबह यह संदेश देने की कोशिश की गई कि नेतृत्व इस मामले में ‘डैमेज कंट्रोल’ की कोशिश कर रहा है।

पार्टी के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी ने खुलकर साबिर अली के बचाव की कवायद शनिवार की सुबह-सुबह शुरू की। उन्होंने कह दिया कि नेतृत्व ने सोच-समझ कर ही साबिर को पार्टी में लिया है। ऐसे में, पार्टी के फैसले का सम्मान किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी जोड़ा कि यदि इस चुनाव में कांग्रेस को करारी मात देनी है, तो विभिन्न दलों से आए लोगों के लिए पार्टी में जगह देनी पड़ेगी। इसी तरह से पार्टी का विस्तार होगा। माना जा रहा था कि गडकरी यदि बचाव में उतरे हैं, तो शायद इसके पीछे पार्टी की एक नियोजित रणनीति होगी। लेकिन, ऐसा कुछ नहीं दिखा। क्योंकि, गडकरी की इस पहल के दौर में ही संघ के प्रवक्ता राम माधव ने भी एक ट्वीटर पोस्ट कर दिया। इसमें कहा गया कि साबिर के मामले में नेतृत्व ने पार्टी कार्यकर्ताओं की भावनाओं की अनदेखी की है। तमाम नेता भी विरोध में हैं। इसका सही संदेश नहीं जाएगा।

संघ प्रवक्ता की इस टिप्पणी के बाद ही भाजपा के और तमाम नेता विरोध के लिए उत्साहित हो गए। वरिष्ठ नेता बलवीर पुंज भी विरोध का झंडा उठाकर मैदान में आ गए। उन्होंने कह दिया कि साबिर को पार्टी में शामिल करने का फैसला एक बड़ी भूल है। जितनी जल्दी हो सके, साबिर को भाजपा से बाहर का रास्ता दिखा देना चाहिए। सूत्रों के अनुसार, इस प्रकरण में शनिवार की सुबह संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह को साफ-साफ संदेश भिजवा दिया था। यही कहा कि आप लोग ऐसा तमाशा क्यों करते हैं? जिससे कि कार्यकर्ताओं की भावनाएं आहत होती हों। माना जा रहा है कि संघ प्रमुख का इशारा समझते ही साबिर अली की सदस्यता रद्द करने का फैसला हुआ। जबकि, इसके पहले विवाद को ठंडा करने के लिए एक बीच का रास्ता निकालने की कोशिश हुई थी। इसी के तहत साबिर अली ने बिहार के प्रभारी महासचिव धर्मेंद्र प्रधान को चिट्ठी लिखी थी। इसमें कहा गया था कि उनकी पार्टी सदस्यता स्थगित रखी जाए। जब पार्टी में उनके मामले में सहमति का रास्ता निकले, तभी सदस्यता बहाल की जाए।

लेकिन, संघ नेतृत्व की नाराजगी को देखते हुए भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने इस मामले को लटकाना जोखिम भरा माना। ऐसे में, भाजपा अध्यक्ष ने साबिर की सदस्यता रद्द करने का फरमान जारी कर दिया। यही सफाई दी गई कि साबिर को भाजपा में शामिल कराने की सिफारिश बिहार राज्य इकाई ने की थी। उसने साबिर के बारे में पर्याप्त छानबीन नहीं की थी। इसी से चूक हो गई। इस प्रकरण में साबिर की हालत कटी पतंग की तरह हो गई है। चूंकि, वे मोदी की तारीफ में कसीदे पढ़ने लगे थे, ऐसे में वे फिलहाल किसी सेक्यूलर ब्रिगेड में शामिल होने लायक नहीं रहे। जबकि, भाजपा से कुछ घंटों के अंदर ही उन्हें दूध की मक्खी की तरह निकालकर फेंक दिया गया। साबिर, मुख्तार अब्बास नकवी की भूमिका से खासे आहत हैं। उन्होंने कहा है कि बगैर सबूतों के नकवी ने उन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। ऐसे में, वे जल्दी ही उन पर कानूनी कार्रवाई करेंगे। जबकि, नकवी ने कहा है कि उन्हें साबिर की धमकियों से जरा भी डर नहीं है। साबिर को जानने वाले उनकी हकीकत अच्छी तरह से जानते हैं।

मुश्किल यह है कि नकवी जैसे भाजपाइयों के साथ जदयू के पुराने साथी भी साबिर को घेरने लगे हैं। जदयू के महासचिव के सी त्यागी तो आरोप लगा रहे हैं कि साबिर, भारत-नेपाल के बीच तस्करी करने वालों को भी राजनीतिक संरक्षण देते रहे हैं। साबिर अली का राजनीतिक भविष्य भंवर में फंस गया है। इस प्रकरण को लेकर भाजपा में अंतर्कलह और बढ़ गई है। कई वरिष्ठ नेताओं को नकवी के विरोध का तौर-तरीका ठीक नहीं लगा है। बताया जा रहा है कि गडकरी खास तौर पर नकवी से खफा हैं। उन्हें लगता है कि नकवी ने ही विरोध की आग भड़का दी है। इसके पहले ही चुनावी टिकट बंटवारे को लेकर कई जगह विवाद रहे हैं। जसवंत सिंह जैसे वरिष्ठ नेता तो तमाम मनुहार के बावजूद विद्रोह की डगर पर आगे बढ़ गए हैं। टिकट प्रक्रिया को लेकर वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी से लेकर डॉ. मुरली मनोहर जोशी तक तुनक चुके हैं। ऐसे नेताओं की सूची खासी लंबी है। ये नेता इस बात से हैरान हैं कि चुनावी मुहिम में नरेंद्र मोदी का चेहरा पार्टी से बड़ा कर दिया गया है। पहली बार ऐसा हो रहा है कि कोई व्यक्ति संगठन से बड़ा लगने लगा है।

लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज, आडवाणी की खास करीबी मानी जाती हैं। कई मुद्दों पर पिछले दिनों उनकी नाराजगी बाहर तक झलकी है। पार्टी ने पूर्व रक्षामंत्री जसवंत सिंह को बाड़मेर से टिकट नहीं दिया। इसी को लेकर वे विद्रोही तेवरों में आए हैं। नाराज होकर जसवंत ने पार्टी के नए तौर-तरीकों पर कड़ी टिप्पणियां की हैं। जसवंत सिंह को लेकर शीर्ष नेतृत्व कड़े रुख पर कायम रहा है। लेकिन, सुषमा ने ट्वीटर संदेश में लिखा था कि वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह को टिकट न मिलने का उन्हें व्यक्तिगत तौर पर बहुत दुख है। सुषमा के इस ‘दुख’ के पार्टी में कई राजनीतिक निहितार्थ निकाले गए। इसके पहले भी वे कर्नाटक के मामलों में पार्टी के कुछ फैसलों का विरोध कर चुकी है। वीएसआर कांग्रेस से श्रीरामुल्लु को भाजपा में शामिल करा लिया गया। उन्हें बेल्लारी सीट से टिकट भी दे दिया गया।

जबकि, संसदीय बोर्ड की बैठक में सुषमा ने विवादित छवि वाले श्रीरामुल्लु की एंट्री का विरोध किया था। उन्होंने श्रीरामुल्लु को टिकट मिलने पर भी हैरानी जताई। ट्वीटर संदेश से उन्होंने अपनी नाराजगी सार्वजनिक भी की थी। ताकि, दबाव बन सके। लेकिन, नेतृत्व ने सुषमा की नाराजगी की कोई परवाह नहीं की। उनको ठेंगा दिखाते हुए श्रीरामुल्लु को बेल्लारी की टिकट भी दे ही दी गई। अब साबिर अली के प्रकरण पर पार्टी के अंदर के मतभेद उजागर हो गए हैं। माना जा रहा है कि गडकरी इस बात को लेकर खुश नहीं हैं कि दबाव में साबिर को इतनी जल्दबाजी में बाहर कर दिया गया है। आशंका यही है कि भाजपा के अंदर अंतर्कलह का सिलसिला और बढ़ सकता है। क्योंकि, कई मुद्दों पर अंदर ही अंदर मतभेदों की आग धहक रही है। कई बड़े नेताओं को यह रास नहीं आ रहा कि संघ नेतृत्व ने पार्टी के महत्वपूर्ण आंतरिक मामलों में अपना हस्तक्षेप इतना कैसे बढ़ा दिया है और शीर्ष नेतृत्व चुपचाप संघ काहुक्म बजाने की लिए तत्पर कैसे हो जाता है?

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

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