सामाजिक-राजनीतिक समूहों का कार्यशाला संस्कृति पर कब्जा

देश में लगभग प्रत्येक सरकारी और गैर सरकारी सर्वाजनिक संस्थाओं के साथ निजी संस्थाओं द्वारा वर्कशॉप यानी कार्यशालाएं आयोजित करने में अनुमानत: अरबों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन मीडिया स्टडीज ग्रुप के एक अध्ययन के अनुसार कार्यशालाएं अपने उद्देश्यों को पूरा नहीं कर पा रही है, क्योंकि खासतौर से सरकारी संस्थानों में खास तरह के सामाजिक-राजनीतिक समूहों का कार्यशाला संस्कृति पर कब्जा हो गया है। 

सार्वजनिक क्षेत्र की संस्था आकाशवाणी पर आधारित एक अध्ययन में बताया गया है कि 2011 के दौरान 17 विषयों पर वर्कशॉप (कार्यशाला) का आयोजन किया। इनमें रेडियो एग्री विजन, किसानवाणी ब्रॉडकॉस्ट, प्रबंधन विकास कार्यक्रम, मीडिया एंड जेंडर सेंसेटाइजेशन, लोक प्रसारक सेवा की चुनौतियां, प्रस्तुतिकरण की कला, नेतृत्व कौशल, वाइस कल्चर एंड कम्यूनिकेशन, स्रोता शोध में उभरती तकनीकी, प्रशासनिक सतर्कता, एडवांस कोर्स इन कम्पयूटर एप्लिकेशनंस, पेंशन एंड रिटायरमेंट बेनेफिट, आर्ट ऑफ नोटिंग ड्राफ्टिंग एंड आरटीआई, सेवा में आरक्षण, अनुशासनात्कम कार्रवाई, वित्तीय प्रबंधन और आरटीआई रिकॉर्ड प्रबंधन जैसे विषय शामिल हैं। लेकिन इन कार्यक्रमों में कुछ चुनिंदा लोगों को ही बार बार बुलाया गया है।

वर्ष 2011 के दौरान आकाशवाणी के कर्मचारियों को जिन 17 विषयों की कार्यशाला कराई गई उनमें व्याख्यान देने के लिए 77 विशेषज्ञों को आमंत्रित किया गया। इनमें 12 विशेषज्ञ ऐसे हैं जो एक से अधिक बार प्रशिक्षण कार्यक्रमों में शामिल हुए और अलग अलग विषयों पर बोले। एक विशेषज्ञ ने आठ प्रशिक्षण कार्यक्रमों में हिस्सा लिया और आठ विषयों पर कर्मचारियों को प्रशिक्षित किया और प्रशासनिक प्रशिक्षण के कोर्स को-आर्डिनेशन की जिम्मेदारी संभाली है। गौरतलब है कि इन आठ विषयों पर दूसरे विशेषज्ञों ने भी व्याख्यान दिए पर भुगतान में भी अंतर है। यह अंतर दूसरे विषयों के साथ भी है।

इसी तरह आकाशवाणी द्वारा वर्ष 2012 में दिल्ली, अहमदाबाद, लखनऊ, हैदराबाद, तिरूवनंतपुरम, भुवनेश्वर और शिलांग में कार्यशालाओं का आयोजन किया गया। इन कार्यशालाओं में वे विषय शामिल नहीं रहे जिससे कर्मचारियों के सामाजिक- राजनीतिक पूर्वाग्रह को दूर करने की कोशिश का दावा किया जा सके। हालांकि 2011 की तुलना में 2012 के प्रशिक्षण विषयों में नागरिक और बाल अधिकार जैसे अहम मुद्दों को शामिल किया जाना सराहनीय है। हालांकि इन दोनों वर्षों में तकनीकी विषयों को लेकर प्रशिक्षण पर ज्यादा जोर रहा जो कि आकाशवाणी की जरूरत है। मगर कई विषयों पर दोबारा कार्याशालाएं आयोजित करने की प्रासंगकिता स्पष्ट नहीं हो पा रही है। मसलन मीडिया एंड जेंडर सेंसेटाइजेशन, आर्ट ऑफ नोटिंग /ड्राफ्टिंग एंड ऑफिस मैनेजमेंट, किसान वाणी ब्रॉडकॉस्ट, सेवाओं में आरक्षण आदि।

इस अध्ययन को मीडिया की मासिक शोध पत्रिका जन मीडिया ने नये अंक में प्रकाशित किया है। जनमीडिया के संपादक अनिल चमड़िया के अनुसार आकाशवाणी के कार्यक्रमों के पिछले अध्ययन में भी वैसे ही विविधता का अभाव जैसे कि कार्यशालाओं में विषय और विषय विशेषज्ञों में विविधताओं का अभाव दिखता है। आकाशवाणी का उद्देश्य देश के संपूर्ण समाज को संतुष्ट करने की कोशिश करना है और उसके उद्देश्यों के अनुरूप आकाशवाणी के अधिकारियों व कर्मचारियों के लिए कार्यशालाओं का आयोजन महत्वपूर्ण होता है। लेकिन दुखद पहलू है कि संसद की सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी स्यायी समिति (2006-2007) ने तमाम बिन्दुओं पर अपनी राय/ सिफारिशें की।14 लेकिन प्रशिक्षण कार्यक्रमों पर कोई सुझाव नहीं दिया।

जन मीडिया में प्रकाशित शोध अध्ययन के अनुसार प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों के निर्माण को अंतिम रूप देने में आकाशवाणी के कर्मचारियों की भूमिका निर्धारित है। प्रशिक्षण (ट्रेनिंग) वह प्रक्रिया है जिसके जरिये कोई संस्थान अपनी जरूरतों के मुताबिक कर्मचारियों को तैयार करता है। यह अध्ययन आकाशवाणी : बहुजन हिताय बहुजन सुखाय के पिछले अध्ययन का विस्तार है।

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