साहित्य जगत में ‘रेवान्त’ की दस्तक

एक ओर जहां साहित्य जगत मे पठनीयता के संकट की बात होती है, दूसरी ओर लघु पत्रिकाओं की अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की प्रतिबद्ध कोशिश, तब पठनीयता के संकट का प्रचार-प्रसार एक सोची-समझी साजिश प्रतीत होती है। बाजारवाद और दृश्य मीडिया के दौर में लघु पत्रिकाओं का संघर्ष सर्व विदित है। ऐसे परिदृश्य मे ‘रेवान्त’ का जुलाई-दिसंबर 2013 अंक, अपनी महत्वपूर्ण सामग्री के माध्यम से महत्वपूर्ण दस्तक देता  है।

संपादकीय मे उस महत्वपूर्ण प्रश्न को पूरी शिद्दत से पुनः उठाया गया है जो अभी तक अनुत्तरित है। वस्तुतः शोषितों-वंचितों मे स्त्री सबसे निचले पायदान पर खड़ी है। विडम्बना तो यह है कि स्त्रियॉं का शोषण जाति-वर्ग की सीमाओं से परे जारी है। संप्रति, सत्ता और पूंजी की सर्वग्रासी एकजुटता ने कला-साहित्य को भी आच्छादित कर लिया है। अफसोस तो यह है कि, साहित्य जिसका मूल धर्म प्रतिरोध होता है, वह भी इस गठजोड़ मे शामिल प्रतीत हो रहा है। पत्रिकाओं और मीडिया के किसी भी माध्यम के द्वारा स्पष्टतः इसे प्रश्नांकित भी नही किया गया, तब संपादकीय मे, ऐसी ‘उत्सवधर्मिता’और ‘लोकार्पण समारोहों’ की ओर इंगित करना साहस का प्रमाण है। भले ही अभी यह अंधेरे मे चीख प्रतीत होती हो परंतु एक आश्वस्ति जगाती है कि वह परंपरा अभी चुकी नही है जो गत वर्ष बिछुड़ गए प्रभृति साहित्यकारों ने प्रारम्भ की थी। संपादकीय वास्तव मे ‘शोक को शक्ति मे बदलने’ का प्रयास है।

पत्रिका की सामग्री साबित करती है कि रचनाएँ रचनाएँ किसी ‘तथाकथित’ बड़ी पत्रिकाओं की मोहताज नही होतीं। तेजेन्द्र शर्मा की कहानी ‘जमीन भुरभुरी क्यों है’ स्त्री शोषण की, देश-काल से परे,समस्या और स्वरूप को व्यक्त करती है। हमारे चतुर्दिक कितनी ‘कोकिला बेन’ हैं जिनका शोषण ऊपरी तौर पर दिखाई नही देता।  परंतु कहानी केवल विलाप नही करती बल्कि कोकिला बेन के संघर्ष के द्वारा उसकी जिजीविषा को उद्घाटित करती है। रचना बिना, किसी लेखकीय वक्तव्य के, कह देती है कि स्त्री का यही अपराजित स्वरूप अभीष्ट है। दीप्ति की ‘ब्रैड पिट आई लव यू’ एक ओर मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करती है तो दूसरी ओर उसके सामाजिक-पारिवारिक कारणो का भी। इलाचन्द्र जोशी की कहानियों के बाद कहानियों मे इस तरह का मनोविश्लेषण कम ही हुआ है। करुणा और मार्मिकता,महेंद्र भीष्म की कहानियों की विशिष्ट पहचान है। कम ही रचनाकार होते हैं, जिनमे यदि लेखक का नाम न भी हो तो रचना पढ़ कर पाठक अनुमान लगा लेता है। ‘क्या कहें’ उसी तरह की रचना है। असीम  करुणा, श्रीपत की कर्तव्य क्षमता की सीमाबद्ध विवशता, माँ-बेटे का रुदन सब कुछ, मामा के क्षुद्र स्वार्थ की बलि चढ़ जाता है।

चंदरेश्वर की ‘कविता नही डकार’ एक नया प्रयोग है। समकालीन विभूतियों को समर्पित, ऐसी रचनाएँ कम ही लिखी गयीं हैं। सुभाष राय की कवितायें मनुष्य होने के अर्थ की तलाश है। किसी देश की पहचान, विभिन्नता मे एकता के कारण होती है। विभिन्न संस्कृतियों के बावजूद मुल्क का चेहरा एक होता है। अधूरा रह जाता चेहरा कवि की अंतरव्यथा है। प्रेम किसी भी  भाषा के काव्य का प्रमुख विषय है। प्रेम की अन्य कविताओं  से अलग कवि की विशिष्टता है कि ये प्रेम एकाकी मन का भाव नही है। इनमे प्रेम सामाजिक सरोकारों से जुड़ा हुआ है। प्रेम, जहां न वासना रह जाती, न कोई चाहत। कबीर की तरह स्वंय को तिरोहित कर सब मे जी उठना। ‘सबकी आँखों का सपना’  कभी तो पूरा होगा। एक कलाकार-कवि का प्रयास उन सपनों के बचाने का ही तो उपक्रम होते हैं। इतिहास का निषेध वही लोग करते हैं जो ‘वर्तमान’ को अपने अनुसार नियंत्रित करना चाहते हैं। वर्तमान की विसंगतियों से मुठभेड़ के बीच इतिहास से साक्षात्कार के दौरान कवि समाज, राजनीति, हिंसा,आतंकवाद, कानून, लोकतन्त्र के ज्वलंत प्रश्नो को उठाता है। कविता समय की दंश भरी विडम्बना को पकड़ने की कोशिश करती है। खंड खंड युग्म का शोक गीत।शंभु बादल की कविताएं चिड़िया, सनीचरा,सरकार आदि कविताएं समय के सवालों को उठाती हैं. उपमा सिंह और राजकुमारी की कविताएं – एक इल्तिजा, समर्पण, प्रतिकार स्त्री-विमर्श को नया आयाम देती हैं।

मैनेजर पाण्डेय यथार्थ का वास्तविक विवेचन किया है कि ‘विज्ञापन आकांक्षा पैदा करते हैं जो कभी पूरी नही होंगी’। यही ‘आकांक्षा और प्रतीक्षा का मायालोक’ (हमारा मीडिया- दृश्य और अखबार,दोनों) यदि किंचित भी संवेदनशील होता, तो इरोम शर्मिला के संघर्ष के मौन स्वर, भगत सिंह की तरह ‘बहरे कानो’ मे गूंज कर उनको ‘जागा’ चुके होते। कौशल जी का कथन इस कटु सत्य हमारे‘लोकतन्त्र के खंडित चेहरे’ को ही बेनकाब नही करता, बल्कि नकली ‘प्रजातन्त्र’ को कटघरे मे खड़ा करता है। यह आलेख ‘अंधेरे का उजाला’  के प्रति आश्वस्त करता है। इस अंक में वरिष्ठ उपनयासकार रवीन्द्र वर्मा के नये लघु उपन्यास पर समीक्षात्मक टिप्पणी भी। कुलमिला कर अंक पठनीय बन पड़ा है और पत्रिका उम्मीद जगाती है।

प्रधान संपादक: कौशल किशोर
संपादक: डॉ अनीता श्रीवास्तव
एक प्रति: 25 रुपये, वार्षिक: 200 रुपये
पत्रिका के नये अंक के लिए इस मोबाइल पर संपर्क करें: 9839356438, 9807519227

लखनऊ से प्रताप दीक्षित की रिपोर्ट.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *