सियासी भंवर में छटपटा रहा उत्तर प्रदेश का आदिवासी समुदाय

कांग्रेस के महासचिव और नेहरू-गांधी परिवार के युवराज राहुल गांधी ने 21 जनवरी, 2012 को उत्तर प्रदेश के आदिवासी बहुल विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र दुद्धी में पहली बार कदम रखा। अंग्रेजों के जमाने में क्राउन स्टेट के नाम से नवाजे गए इस आदिवासी बहुल इलाके की एक सभा से उन्होंने एक साथ कई निशाने साधने की कोशिश की, लेकिन उनकी ये कोशिश सियासी भंवर में फंसे उत्तर प्रदेश के आदिवासियों की छटपटाट को शांत कर पाएगी, ऐसा दिखाई नहीं देता है। इसके पीछे कई वजहें हैं, जिनमें कई कांग्रेस की गलत नीतियों के ही परिणाम हैं।

कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने पहली बार इस इलाके में कदम रखा है जबकि वे उत्तर प्रदेश में सैकड़ों बार आ चुके हैं। दिल्ली में खुद को आदिवासियों का सिपाही बताने वाले राहुल गांधी उत्तर प्रदेश के सबसे पिछड़े और आदिवासी बहुल इलाके में उस समय भी कदम नहीं रखे थे जब यहां के बच्चे कुपोषण और भूखमरी की वजह से दम तोड़ रहे थे। और ये खबर राष्ट्रीय मीडिया से लेकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियां बन रही थी। इतना ही नहीं यहां के बच्चों का भविष्य बर्बाद करने वाले फ्लोराइड युक्त पानी की आवाज संसद में उठने के बाद भी उन्होंने यहां का रुख नहीं किया, जबकि यहां के दो दर्जन से अधिक गांवों में विकलांग बच्चों की कतार लगी हुई है।

स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री और कांग्रेस नेता पं. जवाहर लाल नेहरू ने आदिवासियों की इस धरती पर उद्योगीकरण की नींव रखी थी और यहां की जनता को विकास के सब्जबाग दिखाए थे। 12 जुलाई, 1954 को चुर्क सीमेंट फैक्ट्री का उद्घाटन करते हुए उन्होंने इस इलाके को भारत का स्वीटजरलैंड बनाने की बात कही थी। पंडित नेहरू ने कहा था, "…यह स्थान भारत का स्वीटजरलैंड बनेगा"। इसके बाद यहां एशिया का सबसे बड़ा गोविंद बल्लभ पंत जलाशय रिहंद नदी पर बना, जिसे लोग रिहंद बांध के नाम से भी जानते हैं। इस जलाशय के निर्माण से दुद्धी क्राउन स्टेट समेत कैमूर क्षेत्र के करीब दो लाख आदिवासियों को विस्थापित होना पड़ा था। इन आदिवासियों के पुनर्वास की व्यवस्था आज तक नहीं हो पाई है। वे आज भी अपने हक के लिए दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं।

केंद्र और राज्य की कांग्रेस सरकारों ने यहां के आदिवासियों और किसानों से ये वादा किया था कि रिंहद जलाशय के निर्माण के बाद उनकी पथरीली जमीनों के हलक की प्यास बुझाने के लिए पानी मिलेगा, लेकिन उससे बिजली पैदा की जाने लगी जो देश की राजधानी को रौशन तो कर रही है लेकिन यहां के विस्थापितों और किसानों के घरों का अंधेरा नहीं मिटा रही। इतना ही नहीं, इस जलाशय का प्रदूषित पानी यहां के आदिवासियों और दलितों के घरों के लिए धीमा जहर बन गया है जो उनके नौनिहालों को जमीन पर पड़े रहने के लिए मजबूर कर दे रहा है। रिहंद जलाशय के निर्माण के अलावा आदिवासी बहुल इस इलाके में नेशनल थर्मल पॉवर कॉर्पोरेशन यानी एनटीपीसी की कई इकाइयां भी स्थापित हुईं। फिर निजी कंपनियों ने आदिवासियों की धरोहर को नेस्तनाबूत करना शुरू कर दिया जिनमें हिण्डालको, कनोरिया केमिकल्स, जेपी एसोसिएट्स सरीखी नामी-गिरामी कंपनियां भी शामिल हैं। अब हालात ऐसे हैं कि इस इलाके के आदिवासियों का कोई ही ऐसा घर हो जिसमें कुपोषण या फ्लोरोसिस से प्रभावित सदस्य न हो। उत्तर प्रदेश का आदिवासी बहुल ये इलाका पंडित जवाहर लाल नेहरू का स्वीटजरलैंड तो बन नहीं सका, लेकिन भोपाल जरूर बन गया है जिसका अंदेशा आज से बहुत पहले एक कवि ने ये कहकर जताया था कि कल कालखाना काल बनेगा, सोनभद्र एक दिन भोपाल बनेगा। 

इन सभी बुनियादी समस्याओं के इतर भी एक समस्या यहां के आदिवासियों की है, जो अब पूरे उत्तर प्रदेश के आदिवासियों की समस्या बनकर सामने आई है। वो है त्रिस्तरीय पंचायतों से लेकर विधान सभा और संसद में उत्तर प्रदेश के आदिवासियों का समुचित प्रतिनिधित्व। देश में अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति वर्ग को आरक्षण मिले आठ दशक से अधिक हो चुके हैं, जिनमें भारतीय संविधान के तहत उनकी सामाजिक स्थिति को सुधारने के लिए मिले आरक्षण की अवधि शामिल है… लेकिन उत्तर प्रदेश के आदिवासियों को देश और राज्य की त्रिस्तरीय पंचायतों, विधानमंडल और संसद में उनकी आबादी के हिसाब से आरक्षण अभी तक नहीं मिला है। इतना ही नहीं उनके मूल अधिकार भी उनसे छिन लिए जा रहे हैं। अगर सोनभद्र, चंदौली और मिर्जापुर समेत उत्तर प्रदेश के अन्य आदिवासी बहुल जिलों की सामाजिक स्थितियों का विश्लेषण किया जाए तो इन इलाकों में सबसे दयनीय स्थिति आदिवासियों की है जो देश की आजादी से लेकर अबतक अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। लेकिन उनका संवैधानिक अधिकार राज्य और केंद्र में शासन करने वाली सियासी पार्टियों के कारण अभी भी अदालतों और आयोगों के भंवर में फंसकर दम तोड़ रहा है।

समाज के सबसे निचले स्तर पर जीवन व्यतीत कर रहे उत्तर प्रदेश के आदिवासियों की सत्ता में भागीदारी की बात करें तो अभी तक इनके लिए विधानसभा और लोकसभा में एक भी सीट आरक्षित नहीं है जबकि राज्य में इनकी आबादी 10 लाख से अधिक हो चुकी है। हालांकि सरकार के कागजी पुलिंदों में ये सच्चाई सामने आऩी बाकी है क्योंकि 2011 की जनगणना के आंकड़ों में अगर ये सच्चाई सामने आ गई होती तो उत्तर प्रदेश के आदिवासियों को उनका लोकतांत्रिक अधिकार मिल गया होता। वे इलाहाबाद उच्च न्यायालय में इस मामले में सरकार से केस जीत चुके थे। लेकिन कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए सरकार ने ऐसा होने नहीं दिया। वर्ग विशेष के दबाव और वोट बैंक की राजनीति के चलते कांग्रेस की यूपीए सरकार ने 2011 की जनगणना के साथ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के आंकड़े जारी नहीं किए, जबकि हर बार ये आंकड़े देश की आबादी के आंकड़ों के साथ ही जारी हो जाते थे।

त्रिस्तरीय पंचायतों, विधानमंडल और संसद में उत्तर प्रदेश के आदिवासियों की आबादी के आधार पर उनके प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए लंबे अरसे से मांग की जा रही है लेकिन सियासत के गलियारों में कोई भी उनको उनका संवैधानिक अधिकार देना नहीं चाहता है। इनमें राज्य में राज्य में राज्य कर चुकीं कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी सरीखी पार्टियां भी शामिल हैं। ये मामला राज्य तक ही सीमित नहीं है क्योंकि कानून तो संसद से पास होता है। इसलिए केंद्र की बागडोर संभाल चुकी राजनीतिक पार्टियां भी उत्तर प्रदेश के आदिवासियों के लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन में बराबर की हिस्सेदार हैं। अगर केवल पिछले डेढ़ दशक के दौरान उत्तर प्रदेश के आदिवासियों के संघर्ष और उनके लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन की बात करें तो इस अवधि में राज्य की समाजवादी पार्टी, बहुजन समाजपार्टी, भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के साथ-साथ केंद्र की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकारें भी इस खेल में बराबर की भागीदार रही हैं।

उत्तर प्रदेश के आदिवासियों के अधिकारों पर सियासी खेल का इतिहास-बात शुरू करते हैं कांग्रेस के शासनकाल में पास हुए अनुसूचित जनजाति (उत्तर प्रदेश) कानून-1967 से। इस कानून को कांग्रेस की सरकार ने उत्तर प्रदेश के सबसे निचले तबके यानी आदिवासी पर जबरन थोप दिया जिसके कारण वे आजतक अपने लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित हैं। इस कानून के तहत उत्तर प्रदेश की पांच आदिवासी जातियों (भोटिया, भुक्सा, जन्नसारी, राजी और थारू) को अनुसूचित जनजाति वर्ग में शामिल कर दिया गया। शेष कोल, कोरबा, मझवार, उरांव, मलार, बादी, कंवर, कंवराई, गोंड़, धुरिया, नायक, ओझा, पठारी, राजगोंड़, खरवार, खैरवार, परहिया, बैगा, पंखा, पनिका, अगरिया, चेरो, भुईया, भुनिया आदि आदिवासी जातियों को अनुसूचित जाति वर्ग में ही रहने दिया गया, जबकि इन जातियों की सामाजिक स्थिति आज भी उक्त पांचों आदिवासी जातियों के समान है। इन जातियों के आदिवासी समुदाय ने अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए लड़ाई छेड़ दी, जिसपर उत्तर प्रदेश की सत्ताधारी राजनीतिक पार्टियों ने वोट बैंक की गणित के हिसाब से अपना जाल बुनना शुरू कर दिया, जिनमें भारतीय जनता पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी प्रमुख रूप से शामिल रहीं।

केंद्र की सत्ता में काबिज भारतीय जनता पार्टी की अगुआई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक पार्टी यानी राजग ने राज्य की भारतीय जनता पार्टी के सहयोग से बाजी मारते हुए 2002 में संसद में संविधान संशोधन का निर्णय लिया, जिसमें उसके नुमाइंदों की सत्ता में बने रहने की लालच भी छुपी थी। इसे अमलीजामा पहनाते हुए केंद्र की राजग सरकार ने उत्तर प्रदेश की गोंड़, धुरिया, नायक, ओझा, पठारी, राजगोंड़, खरवार, खैरवार, परहिया, बैगा, पंखा, पनिका, अगरिया, चेरो, भुईया, भुनिया आदिवासी जातियों को अनुसूचित जाति से अनुसूचित जनजाति में शामिल करने के लिए संसद में "अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आज्ञा (सुधार) अधिनियम-2002" पेश किया, जिसे संसद ने पारित कर दिया। हालांकि सियासी पृष्ठभूमि में इस कानून में कुछ विशेष जिलों के आदिवासियों को ही शामिल किया गया था, जिसके कारण आदिवासी बहुल चंदौली जिले के इन जातियों के लोग इस कानून के लाभ से वंचित हो गए जबकि यही वो जिला है, जहां उत्तर प्रदेश की सत्ता को पहली बार नक्सलवाद का लाल सलाम हिंसा के रूप में मिला। इसके बाद तो नक्सली राज्य की सत्ता के लिए नासूर बन गए। फिलहाल "अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आज्ञा (सुधार) अधिनियम-2002 के संसद से पास होने के बाद राष्ट्रपति ने भी इसे अधिसूचित कर दिया।

केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्रालय ने 8 जनवरी 2003 को भारत सरकार का राजपत्र (भाग-2, खंड-1) जारी करते हुए गोंड़ (राजगोंड़, धूरिया, पठारी, नायक और ओझा) जाति को उत्तर प्रदेश के 13 जनपदों महराजगंज, सिद्धार्थनगर, बस्ती, गोरखपुर, देवरिया, मऊ, आजमगढ़, जौनपुर, बलिया, गाजीपुर, वाराणसी, मिर्जापुर और सोनभद्र में अनुसूचित जाति वर्ग से अनुसूचित जनजाति वर्ग में शामिल कर दिया। साथ में खरवार, खैरवार को देवरिया, बलिया, गाजीपुर, वाराणसी और सोनभद्र में, सहरिया को ललितपुर में, परहिया, बैगा, अगरिया, पठारी, भुईया, भुनिया को सोनभद्र में, पंखा, पनिका को सोनभद्र और मिर्जापुर में एवं चेरो को सोनभद्र और वाराणसी में अनुसूचित जनजाति में शामिल कर दिया गया। लेकिन सूबे की कोल, कोरबा, मझवार, उरांव, धांगर, मलार, बांदी, कंवर, कंवराई आदि आदिवासी जातियों को अनुसूचित जाति वर्ग में ही रहने दिया गया, जबकि इनकी भी सामाजिक स्थिति इन जिलों में अन्य जनजातियों के समान ही है। अगर हम इनके संवैधानिक अधिकारों पर गौर करें तो कोल को मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में, कोरबा को बिहार, मध्य प्रदेश एवं पश्चिम बंगाल में, कंवर को मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में, मझवार को मध्य प्रदेश में, धांगड़ (उरांव) को मध्य प्रदेश एवं महाराष्ट्र में, बादी (बर्दा) को गुजरात, कर्नाटक और महाराष्ट्र में अनुसूचित जनजाति वर्ग में शामिल किया गया है। उत्तर प्रदेश में भी इन जातियों के लोगों की सामाजिक स्थिति अन्य प्रदेशों में निवास करने वाली आदिवासी जातियों के समान ही है जो समय-समय पर सर्वेक्षणों और मीडिया रिपोर्टों में सामने आता रहता है। 

उत्तर प्रदेश में "अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आज्ञा (सुधार) अधिनियम-2002" कानून ने एक बार फिर आदिवासी समुदाय के दुखते रग पर हाथ रख दिया। साथ ही "अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आज्ञा (सुधार) अधिनियम-2002" के तहत अनुसूचित जाति से अनुसूचित जनजाति में शामिल हुआ आदिवासी समुदाय सत्ता में अपने भागीदारी के संवैधानिक अधिकार से ही वंचित हो गया। इस कानून के लागू होने से वे त्रिस्तरीय पंचायत, विधानमंडल और संसद में प्रतिनिधित्व करने से ही वंचित हो गए, क्योंकि राज्य में उनकी आबादी बढ़ने के अनुपात में इन सदनों में उनके लिए सीटें आरक्षित नहीं हुईं। ये सामने आने के बाद भी केंद्र की राजग सरकार ने अपनी भूल सुधारने की कोशिश नहीं की। 3 मई, 2002 से 29 अगस्त, 2003 तक राज्य की सत्ता में तीसरी बार काबिज रही बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने भी आदिवासियों के जनप्रतिनिधित्व अधिकार की अनदेखी की। मायावती अनुसूचित जाति से अनुसूचित जनजाति में शामिल हुई आदिवासियों की संख्या का रैपिड सर्वे कराकर उनके लिए विभिन्न सदनों में आबादी के आधार पर सीट आरक्षित करने का प्रस्ताव केंद्र सरकार, परिसीमन आयोग और चुनाव आयोग को भेज सकती थीं, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। हालांकि उन्होंने कानून को राज्य में लागू कर दिया, जिससे आदिवासियों के जनप्रतिनिधित्व का संवैधानिक अधिकार सियासी और कानून के भंवर में फंस गया। 

29 अगस्त, 2003 को समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने राज्य की कमान संभाली। जिसके बाद सरकार ने राज्य के आदिवासी जिलों में विभागीय सर्वेक्षण कराया, जिसमें सामने आया कि राज्य में आदिवासियों की संख्या 2001 की जनगणना के 1,07,963 से बढ़कर 6,65,325 हो गई है। अगर केवल सोनभद्र की बात करें तो इस जिले में अनुसूचित जनजातियों की संख्या तीन लाख 78 हजार चार सौ बयालिस (विभागीय सर्वेक्षण-2003-04 के अनुसार) हो गई, जो सोनभद्र की आबादी के एक-चौथाई (करीब 26 प्रतिशत) से भी अधिक है। वहीं, सोनभद्र में अनुसूचित जाति वर्ग में शामिल जातियों की आबादी 42 फीसदी (जनगणना-2001 के अनुसार) से घटकर 16 फीसदी हो गई। कई-कई ग्राम सभाओं में अनुसूचित जातियों की जनसंख्या नगण्य हो गई। जिसकी वजह से आज भी करीब आधा दर्जन ग्रामसभाएं असंगठित हैं। दुद्धी विकास खंड का जाबर, नगवां विकास खंड का रामपुर, बैजनाथ, दरेव एवं पल्हारी ग्राम सभाएं इसका उदाहरण हैं, जहां वर्ष 2001 की जनगणना के आधार पर अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित हुई ग्राम प्रधानों एवं ग्राम पंचायत सदस्य की सीटों पर योग्य उम्मीदवारों की पर्याप्‍त दावेदारी नहीं होने के कारण ग्राम पंचायत सदस्यों की दो तिहाई सीटें खाली हैं। इस वजह से इन ग्राम सभाओं का गठन नहीं हो पाया है, क्योंकि ग्रामसभा के गठन के लिए ग्राम पंचायत सदस्यों की संख्या दो तिहाई होना जरूरी है। इन ग्राम सभाओं में जिला प्रशासन द्वारा तीन सदस्यीय कमेटी का गठन कर विकास कार्यों को अंजाम दिया जा रहा है।

उदाहरण के तौर पर नगवां विकासखंड का पल्हारी ग्रामसभा। 13 ग्राम पंचायत सदस्यों वाले पल्हारी ग्रामसभा में पंचायत चुनाव-2005 के दौरान कुल 1006 वोटर थे। इस गांव में अनुसूचित जाति का एक परिवार था। शेष अनुसूचित जनजाति एवं अन्य वर्ग के थे। अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 12 ग्राम पंचायत सदस्य के पद खाली हैं, क्योंकि इस पर अनुसूचित जाति का कोई सदस्य चुनाव नहीं लड़ सका। ग्राम पंचायत सदस्यों के दो-तिहाई से अधिक पद खाली होने के कारण पल्हारी ग्रामसभा का गठन नहीं हो पाया है। जिला प्रशासन द्वारा गठित समिति विकास कार्यों को अंजाम दे रही है। इससे छुटकारा पाने के लिए गैर सरकारी संगठनों के साथ गैर राजनीतिक पार्टियां भी आदिवासियों की आवाज को सत्ता के नुमाइंदों तक पहुंचाने के लिए विभिन्न हथकंडे अपना रहे हैं। त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव-2005 के दौरान भी आदिवासियों और कुछ राजनीतिक पार्टियों ने सरकार की नीतियों के खिलाफ आवाजें मुखर की थी। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माले) ने आदिवासियों की इस आवाज को सत्ता के गलियारों तक पहुंचाने के लिए म्योरपुर विकासखंड के करहिया गांव में पंचायत चुनाव के दौरान समानान्तर बूथ लगाकर आदिवासियों से मतदान करवाया था। भाकपा(माले) के इस अभियान में 500 लोगों ने अपने मत का प्रयोग किया। वहीं, राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा पंचायत चुनाव के दौरान लगाए गए बूथ पर मात्र 13 वोट पड़े। अनुसूचित जाति के दो परिवारों (दयाद)के सदस्यों में से एक व्यक्ति नौ वोट पाकर ग्राम प्रधान चुना गया। शेष सदस्य निर्विरोध सदस्य चुन लिए गये।

आदिवासियों और भाकपा (माले) के इस अभियान ने राजनीतिक हलके में हडकंप मचाकर रख दी। इसके बाद भी केंद्र एवं राज्य की सरकार की नीतियों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। इसके बाद भी समाजवादी पार्टी सरकार ने राज्य की त्रिस्तरीय पंचायतों, विधानमंडल और संसद में आदिवासियों की आबादी के अनुपात में सीटें आरक्षित कराने की पहल नहीं की। जिसके कारण उनकी सरकार में मंत्री और दुद्धी विधानसभा से करीब 27 साल तक विधायक रहे विजय सिंह गोंड़ त्रिस्तरीय पंचायतों समेत विधानसभा और लोकसभा का चुनाव लड़ने से वंचित हो गए। उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जनहित याचिका भी दायर की, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। इसके बाद वे सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई। दूसरी तरफ आदिवासी बहुल सोनभद्र के आदिवासियों में अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए जागरूकता बढ़ी और वो लखनऊ से लेकर दिल्ली तक कूंच कर गए, लेकिन 2004 में सत्ता में आई कांग्रेस की अगुआई वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार यानी संप्रग और 13 मई, 2007 में राज्य की सत्ता में आई मायावती सरकार ने उनकी आवाज को एक बार फिर नजर अंदाज कर दिया। इसके बावजूद उत्तर प्रदेश का आदिवासी समुदाय अपने हक के लिए जिला प्रशासन से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक अपनी आवाज पहुंचाता रहा।

आदिवासियों की गैर-सरकारी संस्था प्रदेशीय जनजाति विकास मंच और आदिवासी विकास समिति ने त्रिस्तरीय पंचायतों में उचित प्रतिनिधित्व के संवैधानिक अधिकार की मांग को लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका संख्या-46821/2010 दाखिल की, जिसपर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सुनील अंबानी और काशी नाथ पांडे की पीठ ने 16 सितंबर, 2010 को दिए फैसले में साफ कहा है कि अनुसूचित जनजाति वर्ग में शामिल जाति समुदाय के लोगों का आबादी के अनुपात में विभिन्न संस्थाओं में प्रतिनिधित्व का अधिकार उनका संवैधानिक आधार है जो उन्हें मिलना चाहिए। पीठ ने राज्य सरकार के उस तर्क को भी खारिज कर दिया था कि "अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आज्ञा (सुधार) अधिनियम-2002" लागू होने के बाद राज्य में आदिवासियों की जनगणना नहीं है। पीठ ने साफ कहा कि 2001 की जनगणना में अनुसूचित जाति वर्ग और अनुसूचित जनजाति वर्ग में शामिल जातियों की जनगणना अलग-अलग कराई कई थी और इसका विवरण विकासखंड और जिला स्तर पर भी मौजूद है। जिसकी सहायता से अनुसूचित जाति से अनुसूचित जनजाति में शामिल हुई जातियों की आबादी को पता किया जा सकता है। पीठ ने आदिवासियों के हक में फैसला देते हुए त्रिस्तरीय पंचायतों में सीटें आरक्षित करने का आदेश दिया, लेकिन चुनाव की अधिसूचना जारी हो जाने के कारण पंचायत चुनाव-2010 में उच्च न्यायालय का आदेश लागू नहीं हो पाया। इसके बाद भी राज्य की सत्ता में काबिज बहुजन समाज पार्टी और केंद्र की सत्ता में काबिज संप्रग सरकार ने उत्तर प्रदेश के आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों के लिए कदम नहीं बढ़ाया।

मौके को भांपते हुए विधानसभा दुद्धी के पूर्व विधायक विजय सिंह गोंड़ कांग्रेस का दामन थामने की पृष्ठभूमि रचने लगे। जब कांग्रेस में शामिल होने की पटकथा विजय सिंह गोंड़ ने लिख ली तो उन्होंने अपने बेटे विजय प्रताप की ओर से 2011 के आखिरी महीने में सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका संख्या-540/2011 दाखिल करवाई, जिसके बाद केंद्र सरकार की ओर से उत्तर प्रदेश के आदिवासियों के हक में रिपोर्ट भी दी गई। जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय चुनाव आयोग को तलब किया। केंद्र सरकार, राज्य सरकार और केंद्रीय चुनाव आयोग को सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने 10 जनवरी, 2012 को आदिवासियों के हक में फैसला दिया। पीठ ने अपने फैसले में कहा कि त्रिस्तरीय पंचायतों, विधानमंडल और संसद में उत्तर प्रदेश के आदिवासियों के लिए उनकी आबादी के आधार पर सीटों का आरक्षण सुनिश्चित किया जाए, लेकिन केंद्रीय चुनाव आयोग ने इस प्रक्रिया में दो से तीन माह का समय लगने का हवाला देकर फरवरी-मार्च में होने वाले विधानसभा चुनाव में सीटें आरक्षित करने से इंकार कर दिया। लेकिन यहां पर चुनाव आयोग ने जो बात सुप्रीम कोर्ट में बताई वो कांग्रेस के नुमाइंदों की पोल खोलती है जो खुद को दिल्ली में आदिवासियों का सिपाही बताते हैं।  

चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उसके पास राष्ट्रपति के 2003 के आदेश के अलावा कोई भी अन्य आदेश अथवा निर्देश केंद्र सरकार या उत्तर प्रदेश सरकार से नहीं मिला है। और ना ही किसी आयोग का निर्देश उसे प्राप्त हुआ है। सवाल खड़ा होता है कि खुद को आदिवासियों का सबसे बड़ा हितैषी बताने वाली कांग्रेस और उसके युवराज राहुल गांधी पिछले एक दशक से क्या कर रहे थे जबकि उत्तर प्रदेश के आदिवासियों के प्रतिनिधित्व का मुद्दा विधानमंडल, संसद, अनुसूचित जनजाति मंत्रालय, अनुसूचित जनजाति आयोग, प्रधानमंत्री कार्यालय के साथ-साथ इलाहाबाद उच्च न्यायालय सरीखी संवैधानिक संस्थाओं में भी उठ चुका था। उत्तर प्रदेश के आदिवासियों का ये मुद्दा मीडिया की सुर्खियों में भी छाया रहा। इतना ही नहीं, 10 जनवरी, 2008 को राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग में अनुसूचित जनजाति मंत्रालय के सचिवों के साथ इस मुद्दे पर बैठक भी हुई थी, लेकिन कांग्रेस पार्टी और इसके नुमाइंदे इस मामले पर चुप रहे। 16 सितंबर, 2010 को हाईकोर्ट के फैसले के बाद भी कांग्रेस वाली संप्रग सरकार और राहुल गांधी ने कोई कदम आगे नहीं बढ़ाया।

जब आदिवासी बहुल दुद्धी विधानसभा के पूर्व विधायक विजय सिंह गोंड से कांग्रेस का दामन पकड़ने का फैसला हो गया तो केंद्र की यूपीए सरकार उत्तर प्रदेश के आदिवासियों के हित का ढिंढोरा पिटने लगी और सुप्रीम कोर्ट में उनके पक्ष में रिपोर्ट भी दे दिया। इतना ही नहीं वो 2011 में हुई जनगणना के तहत उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जनजाति वर्ग के आंकड़े भी चुनाव आयोग को मुहैया कराने के लिए तैयार हो गई। ताकि विजय सिंह गोंड़ के रूप में दुद्धी विधानसभा से कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में एक विधायक मिल सके और बहुजन समाज पार्टी के गढ़ (दुद्धी, राबर्ट्सगंज, राजगढ़, चकिया, ओबरा, घोरावल विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र) में सेंध लगाई जा सके। इसे परवान चढ़ाने के लिए नाटकीय ढंग से विजय सिंह गोंड सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने से पहले समाजवादी पार्टी को छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए। लेकिन कांग्रेस और विजय सिंह गोंड़ की रणनीति चुनाव आयोग के हलफनामे से बेकार हो गई। अब फरवरी-मार्च में होने वाले विधानसभा चुनाव में एक बार फिर उत्तर प्रदेश के आदिवासी अपने संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित होने जा रहे हैं। इसका एक ही कारण है। वह है वोटबैंक की सियासत, जिसे देखकर सत्ता के करीब मंडराने वाली सियासी पार्टियों के नुमाइंदे गिरगिट की तरह अपना रंग बदलते हैं। 

इस सियासी खेल में कांग्रेस पार्टी के नुमाइंदों समेत अन्य राजनीतिक पार्टियों के नुमाइंदों का असली चेहरा सामने आ गया है। सियासी भंवर के इस नजारे को देखकर उत्तर प्रदेश का आदिवासी समाज तिलमिला रहा है। राजनीतिक पार्टियों को सबक सिखाने के लिए आदिवासी समाज उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ रही राजनीतिक पार्टियों की गणित को गड़बड़ा सकता है। इसी गणित को मजबूत करने के लिए कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी 21 जनवरी, 2012 को  दुद्धी निर्वाचन क्षेत्र के मुख्यालय दुद्धी नगर गए थे। जहां उन्होंने विजय सिंह गोंड़ की अगुआई में आयोजित की गई कांग्रेस की सभा में आदिवासियों के हितों की रक्षा के लिए एक से बढ़कर एक कसीदे कढ़े, लेकिन आदिवासियों के दिलों में सालों से सुलग रही उपेक्षा की आग को शांत करने में नाकाम दिखाई दे रहे थे। लोगों की जुबान पर एक ही सवाल था कि कांग्रेस के युवराज ने राज्य की त्रिस्तरीय पंचायतों, विधानमंडल और संसद में उत्तर प्रदेश के आदिवासियों के लिए उनकी सीटें आरक्षित करने के सवाल पर एक शब्द भी नहीं बोले। ना ही वनाधिकार कानून के तहत आदिवासी इलाकों में रहने वाले कोल, भील सरीखे अनुसूचित जनजाति वर्ग के लोगों से 75 साल पुराना दस्तावेज मांगे जाने पर ही उन्होंने कुछ कहा। इतना ही नही, वे राहुल गांधी से बुंदेलखंड की तरह कैमूर क्षेत्र के आदिवासी बहुल जिलों के लिए किसी विशेष पैकेज अथवा योजना की भी आशा लगाए हुए थे, लेकिन इसपर भी उन्होंने (राहुल गांधी) ने कुछ नहीं बोला। इन हालातों में राहुल गांधी की दुद्धी सभा सोनभद्र के आदिवासियों समेत उत्तर प्रदेश के आदिवासियों की कसमसाहट को कितना ठंडा कर पाएगी, ये तो अभी भी भविष्य के गर्भ में है और मार्च में ही सामने आएगा। लेकिन जब आएगा तो चौंकाने वाला होगा।

लेखक शिवदास पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

अपने मोबाइल पर भड़ास की खबरें पाएं. इसके लिए Telegram एप्प इंस्टाल कर यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *