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सीएम अखिलेश से बात नहीं हो पाई तो दुखी हो गया लखनऊ का एक युवा पत्रकार

हरेंद्र प्रताप सिंह लखनऊ में एक अखबार में काम करते हैं. उन्होंने अपनी पीड़ा को लिखकर भेजा है. उन्हें दुख है कि सीएम अखिलेश ने उनसे बात नहीं की. उनका मानना है कि यूपी का सीएम सिर्फ दलालों, चापलूसों आदि से ही बात करता है. वह छोटे अखबारों के पत्रकारों को लिफ्ट नहीं देता. हरेंद्र ने जो कुछ लिखकर भेजा है, उसे यहां प्रकाशित किया जा रहा है. -एडिटर, भड़ास4मीडिया

हरेंद्र प्रताप सिंह लखनऊ में एक अखबार में काम करते हैं. उन्होंने अपनी पीड़ा को लिखकर भेजा है. उन्हें दुख है कि सीएम अखिलेश ने उनसे बात नहीं की. उनका मानना है कि यूपी का सीएम सिर्फ दलालों, चापलूसों आदि से ही बात करता है. वह छोटे अखबारों के पत्रकारों को लिफ्ट नहीं देता. हरेंद्र ने जो कुछ लिखकर भेजा है, उसे यहां प्रकाशित किया जा रहा है. -एडिटर, भड़ास4मीडिया


मायावती की राह पर अखिलेश यादव, अखिलेश छोटे पत्रकारों से बात करना तक नहीं समझते मुनासिब

लखनऊ : ''हैलो मैं मुख्यमंत्री आवास से बोल रहा हूं, ऐसे तो न जाने कितने पत्रकार फोन करते रहते हैं, उनके पास समय नहीं है, अभी वो जनता दरबार से थके हुए आए हैं, बात नहीं कर सकते, ज्यादा जरूरी है, तो उनके पीए गजेंद्र चौधरी से बात कर लें.'' यह जवाब मुझे यानि लखनऊ के एक नए अखबार के वरिष्ठ उपसंपादक हरेन्द्र प्रताप सिंह को बुधवार शाम ४ बजकर 5 मिनट पर सीएम हाउस में बैठे व्यक्ति ने फोन पर दिया।

मैंने इसके बाद अखिलेश के पीए गजेंद्र चौधरी को बुधवार को अपने निजी मोबाइल से ४ बजकर २४ मिनट पर कई बार फोन मिलाया, लेकिन उनका फोन बिजी आ रहा था। अखिलेश यादव के मोबाइल पर भी कई बार कॉल की, लेकिन उनका नंबर भी हर बार बिजी आ रहा था। थक-हार कर मैंने सीएम साहब के मोबाइल पर मैसेज भेजा कि अखिलेश भइया मुझे आपका इंटरव्यू लेना है। कृपया बात कीजिए, नहीं तो मेरी प्राइवेट नौकरी भी चली जाएगी। सरकारी  तो इस आरोप के कारण चली गई कि मैं आपका दलाल हूं। आप सीएम बन गए तो छोटे भाइयों को बिल्कुल भूल गए। अगर इस बार भी कोई रेस्पोंस नहीं मिला, तो दोबारा फोन नहीं करूंगा, फिर चाहे आप सीएम बने रहें य पीएम।''

मैं सरकार बनने से पहले भी लखनऊ स्थित सपा पार्टी कार्यालय की कई परिक्रमाएं कर चुका हूं, लेकिन कभी साहब ने अपने दर्शन लाभ देने की जहमत नहीं उठाई। अखिलेश केवल रोजाना उनकी बटरिंग वाली खबरें छापने वाले दलालों, अक्सर उनको दंडवत करने वाले व नामी गिरामी पत्रकारों से ही मिलना पसंद करते हैं, लेकिन उनको कभी भी मुझ जैसी घटिया और चिरकुट पत्रकार से मिलने के लिए टाइम नहीं है। ऐसी ही एक घटना मेरे साथ मायावती के शासन काल में हुई थी। मुझे किसी सिलसिले में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती से मिलना था। मैंने सीएम हाउस के नंबर पर फोन कर मायावती से मिलने की इच्छा जाहिर की, लेकिन ड्यूटी पर बैठे व्यक्ति ने कहा मायावती किसी से बात नहीं करतीं, चाहे वो पत्रकार हो या नेता। एक सवाल के जवाब में उसने कहा कि अपना नाम ननंबर नोट करा दीजिए आप को जरूर बुलाया जाएगा। तब और आज का दिन मैं मायावती के बुलावे के इंतजार में ही बैठा हूं और इधर माननीय यादव जी भी कतई लिफ्ट नहीं दे रहे हैं। इस तरह अगर देखा जाए तो अखिलेश यादव धीरे-धीरे मायावती की राह पर चल रहे हैं। इसका कारण जानने के लिए मैंने गुरुवार दोपहर २ बजकर २८ मिनट पर अपने मोबाइल से अखिलेश को दो बार फोन मिलाया, लेकिन वह कहीं बिजी थे। इसके बाद उनके पीए गजेंद्र चौधरी के नंबर पर दो बजकर २९ मिनट पर दो बार काल की, पहले वो बिजी थे दूसरी बार फोन मिला भी तो उन्होंने हर बार की तरह फोन उठाना मुनासिब नहीं समझा।

छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी पर भले ही कितने ही आरोप क्यों न लगे हों लेकिन जब मैं छत्तीसगढ़ में पोस्टेड था, तो जब भी श्री जोगी  को फोन मिलाता, तो वह तुरंत बात करते थे। एक बार बार केरल में अपने पैरों का इलाज कराने गए थे। मैंने उनका फोन मिलाया तो वह अपना फोन घर पर छोड़ गए थे। घर के किसी सदस्य ने फोन उठाया और बिना झिझक के जोगी जी का केरल का नया नंबर दे दिया। मैंने जब उनके उस नंबर पर फोन किया तो उन्होंने इतनी मुसीबत में होते हुए भी मुझसे बात की और वापस आकर मुझसे मुलाकात भी की। इतना ही नहीं उनके बाद रमन सिंह वहां के सीएम बने हमारे यहां एक रिपोर्टर था। वह एकबार उनका कार्यक्रम कबर करने गया, तो उन्होंने उससे परसनली मुलाकात की, लेकिन यूपी के सीएम की सीट ऐसी है, जो भी बैठता है, सत्ता के नशे में मगरूर हो जाता है।

लखनऊ से कुंवर हरेन्द्र प्रताप सिंह की रिपोर्ट

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