सीमाओं में बंधे राष्ट्रों-देशों को छोड़ें, आओ वापस अपने जंगलों की तरफ चलें

एक बहुत विशाल ऊर्जा का विस्फोट हुआ, सारे ब्रह्मांड में असंख्य तारे और ग्रह टूट कर छितरा गये। लेकिन ऊर्जा खत्म नहीं हुई वरन ब्रह्मांड की एक एक संरचना में समाहित हो गयी और धीरे धीरे सूर्यों एवं ग्रहों की उत्पत्ति प्रशस्त हुई। इन्हीं में एक अपनी पृथ्वी और सूर्य भी थे. सूर्य ने पिता भाव से और माँ पृथ्वी ने अपनी कोख से सृष्टि को जन्म देना आरंभ किया। अरबों सालों तक दोनों रात-दिन मेहनत करते रहे। पिता सूर्य नाभिकीय संलयन से ऊर्जा को केन्द्रित करता और माँ को देता फिर माँ उस ऊर्जा को अपने बच्चों में बाँट देती, माँ पानी लायी और जीवन को सींचना शुरू किया। साइनोबैक्टेरिया, शैवाल, कवक और छोटे छोटे जीवों से जीवन का आधार बना।

लेकिन माँ और पिता अभी भी सतत प्रयास कर रहे थे फिर पेड़, पौधे, जीव, जंतु, खनिजों, धातुओं का ताना बाना बुनता चला गया। आखिरकार दोनों ने अपनी सबसे शानदार और अतुलनीय औलाद "इंसान" को पैदा किया। माँ-बाप फूले न समाये क्योंकि सिर्फ यही एक रचना थी अब तक के खरबों सालों के परिणामस्वरूप जिसमें वो सातों इन्द्रियों को एक स्वरूप में जोड़ सके थे और ये सात इन्द्रियाँ थीं – देखना, सुनना, सूंघना, छूना, बोलना/स्वाद लेना, आभास करना और चलायमान होना।

जिस तरह पहाड़ की चोटी पर पहुँचने पर आत्मसंतुष्टि मिलती है और अथक परिश्रम तथा गिनते हुए दिनों का अंत हो जाता है, लेकिन ठीक उसके दूसरी तरफ एक गहरी ढाल भी दिखती है जिसकी ऊंचाई से गिरते वक़्त न तो परिश्रम की आवश्यकता होती है और न समय का एहसास होता है। अब सवाल ये आता है की पहाड़ की चोटी पर जाने को कहा किसने था जबकि दूसरी तरफ गिरने का खौफ था?

ऊर्जा और स्थूलता का खेल बड़ा निराला है, निरंतर परिवर्तन है। धुआँ हमेशा ऊपर ही उठता है और राख़ नीचे ही गिरती है। पौधा जन्म लेते ही ऊपर को उठता है और जड़ जमीन से चिपकती है। मस्तिष्क ऊपर ही क्यों स्थित है। युगों – युगों से यही सवाल और इसका जवाब ढूँढता मानव खोज पर खोज करता जाता है. मन में छुपी अनंत ऊंचाई की अभिलाषा लिए अर्थात यही अभिलाषा उसको ऊपर खींचती है।

क्या है अणु जहां इलेक्ट्रॉन, प्रोटोन, न्यूट्रॉन नृत्य करते हैं। फिर हिग्स बोसॉन अपनी झलक दिखा कर गायब हो जाता है, दसियों हज़ार श्लोक ऋग्वेद और यजुर्वेद में ऋषि बता जाते हैं। फोटोसिंथेसिस, रेस्पिरेशन, बिजली कौंधने और उससे जीवन विकास, सप्तरंग, अंग प्रत्यारोपण, दधीचि मुनि को अश्व का सिर लगाना, वायु गमन, अंतर्ध्यान, दूरदर्शन, टाइम मशीन, तंत्र साधना, सम्मोहन विज्ञान, मानसिक साधना, सात चक्रों की साधना का सिद्धान्त जैसे जाने कितने अकल्पनीय विज्ञान का प्रतिपादन करते रहे।

कृष्ण बहुत करीब पहुँच गए इस ब्रह्मांड के नियम को ढूंढते ढूंढते और आत्मा का विकास और विनाश समझाया, उन्होने बताया की किस तरह अणु एक तरफ जीवन और जन्म की प्रक्रिया में लगे रहते हैं तथा दूसरी तरफ उनका विनाश और मृत्यु भी निरंतर होती रहती है, कितनी आसान भाषा में वो उस आत्मा अथवा ऊर्जा को एक एक कण या जीव में दिखा देते हैं। अद्भुत विज्ञान दिखता है पुरातन इतिहास में कुबेर का वायुयान, लंका व भारत के बीच आदम-पुल, श्रीलंका का स्वर्ण आभा से जगमगाता शहर, शरीर को हल्का कर हवा मे उड़ने वाले हनुमान का विज्ञान, मैटर डिसप्लेसमेंट द्वारा पदार्थ में ऊर्जा के प्रवाह को नियंत्रित कर शरीरों का स्थानांतरण, कहानियों सा लगता है ना? शायद कृष्ण इस पर शोध करते हुए बहुत आगे चले गए थे और आध्यात्मिकता के सूत्र को मानवता में पिरो कर जन्म और मृत्यु के बंधनों से परे जाने की शिक्षा देने लगे।

इतनी सटीक और आध्य शिक्षा देने के बाद भी उनके श्लोकों में स्वयं की खोज करने की ही शिक्षा मिलती है। उन्होने ब्रह्मांड के प्रत्येक पदार्थ का मानवीकरण करते हुए आत्मविकास की प्रेरणा दी और मानव को भी पदार्थ का ढांचा बता डाला।

पुरातन वेद या गीता की सबसे खास बात ये थी की इनमे कहीं भी किसी धर्म का जिक्र नहीं था बल्कि सिर्फ विज्ञान था। महाभारत काल में इस विज्ञान की पराकाष्ठा दिखती है, चाहे वो संजय की दिव्यदृष्टि का दूरदर्शन हो, कृष्ण का अध्यात्म और पदार्थ के तत्व एवं उसका आत्मा से संबंध का सिद्धान्त हो, अभिमन्यु के द्वारा गर्भ में ही शिक्षा ग्रहण की कथा हो या जंगल रहने वाले अद्वितीय योगी शिव का 'आ'-'उ'-'म' और सृष्टि के साथ मानव का जुड़ाव था।

लेकिन चोटी के दूसरी तरफ तीव्र ढलान का प्रतिविम्ब महाभारत में अश्वत्थामा द्वारा परमाणु बम सरीखे ब्रह्मास्त्र के प्रयोग में आ जाता है। द्वारिका डूब जाती है, सरस्वती नदी का विलोप हो जाता है, वनस्पति, मनुष्य व जीवों का व्यापक संहार होता है, पहले कभी न वर्णित होने वाला थार मरुस्थल साकार होने लगता है और जेनेटिक डिसार्डर की कल्पना सत्य हो जाती है।

इस काल के बाद नागरीय सभ्यता या संभवतः सिंधु सभ्यता विलुप्त हो जाती है और 5000 ई०पू० से लगभग 2000 ई०पू० का इतिहास अंधकार में डूब जाता है। तीन हज़ार साल पहले जंगलों में छिपा सहमा मानव फिर बाहर निकला लेकिन अब तक वो रूढ़ियों, अंधविश्वासों, कर्मकांडों, भगवान से डरा हुआ और विज्ञान हीन हो चुका था। सृष्टि ने फिर से मनुष्य को मौका दिया पनपने का, सृष्टि जीवित थी चूंकि मानव ने अब तक सृष्टि के साथ खिलवाड़ नहीं किया था वो जंगलों, अणुओं की स्थिरता और अध्यात्म को भौतिकता से बहुत दूर रखे हुए था। भारत की भौगोलिक स्थिति ने मानव को जीवन जीने के लिए सबसे सरल व्यवस्था कर रखी थी. ऋतु चक्र, नदियां और उपजाऊ मैदान मानव को आत्म खोज करने के लिए प्रेरित करता रहा और काल दर काल यहाँ का वैज्ञानिक साधु आत्मविद्या के साथ प्राकृतिक जीवन को पोषण देता रहा जिसका जिक्र सिवाय भारत के, विश्व के किसी अन्य इतिहास में नहीं मिलता और यही वजह है की आज भी वो साधु या फकीर के रूप में भारत के जंगलों में अध्यात्म की ऊंचाइयां साधते मिल जाते हैं- विलक्षण श्रेणी मानवों की। पुरातन काल से मध्यपूर्व एशिया का ये भाग सम्पूर्ण विश्व के लिए कौतूहल रहा, विश्व के हर कोने से इंसान यहां आता रहा और बसता चला गया। अद्भुत सम्मिश्रण है इस धरा पर मानव और प्रकृति का।

कितना अच्छा होता की इस जीवन और धरा का हम सदुपयोग कर पाते।

आज का विश्व अलग है, ये विश्व है भौतिकवाद का. भारत जो कभी सूक्ष्म ऊर्जा के स्थानांतरण के सिद्धान्त को प्रयोग करता था वो भी अब भौतिक और स्थूल ऊर्जा के स्थानांतरण के पथ पर अग्रसर हो चुका है। आज सम्पूर्ण विश्व में पदार्थों में निहित ऊर्जा से मानव अपनी जरूरतों को पूरा करने की होड़ में लगा है. खनिज जिन्हें सृष्टि ने भूगर्भ में दबाया क्योंकि वो कार्बन तथा हानिकारक यौगिकों का संकलन है और मानव या जीवित प्राणियों के लिए हानिकारक है. वस्तुतः आज विश्व इनसे उत्पन्न कुप्रभावों का प्रत्यक्ष सामना कर रहा है।

भौतिक संसाधनों का अंध उपभोग और निर्भरता मानव अस्तित्व को अपने अंत की ओर धकेल चुका है। ब्रह्मांड के शाश्वत नियम – “ऊर्जा न नष्ट होती है और न ही उत्पन्न होती है” में आज की स्थिति का पूरा वर्णन है. हम लोग खनिजों को जमीन खोखला कर बाहर निकालते हैं जिससे वो जगह खाली हो जाती है अब उस खाली जगह को भरने के लिए ऊर्जा विस्थापन होता है. चूंकि यहाँ से निकला पदार्थ सतह पर पहुँच चुका होता है तो वहाँ से ऊर्जा को हटाएगा ही. फलस्वरूप भूस्खलन व चक्रवात संबन्धित घटनाएं बढ़ती हैं। गैस, तेल, कोयला जैसे पारंपरिक व खनिज ऊर्जा स्त्रोत जब जलते हैं तो हानिकारक गैसें, धूल, धुआँ इत्यादि के रूप में वातावरण में छा जाते हैं। चूंकि पिता सूर्य की जीवनदायिनी किरणें पृथ्वी पर पड़ती हैं और आवश्यकतानुसार ऊष्मा अवशोषित करने के बाद पृथ्वी उन किरणों को परावर्तित कर देती है. लेकिन जब जमीन में दबे खनिजों को सतह पर लाकर उनका प्रसंस्करण किया गया और इतनी तेज़ी से पृथ्वी अपने मैकेनिज़्म मे बदलाव नहीं कर सकी तो वातावरण से किरणें परावर्तन मे परेशानी होने लगी जिससे ऊष्मा का एक बड़ा भाग पृथ्वी की सतह पर ठहरने लगा, इसके प्रभाव से ध्रुवों पर जमी अथाह बर्फ पिघलना शुरू हो चुकी है साथ ही साथ पारिस्थितिक असंतुलन का एक ऐसा दौर शुरू हो रहा है जिसकी भरपाई मानव प्रजाति कभी नहीं कर पायेगी । प्रकृति को जीवन अनुकूल बनाने के लिए फिर से लाखों सालों के इतिहास को दोहराना पड़ेगा।

* ऊष्मा के संरक्षण से वाष्पीकरण बढ़ेगा, वर्षा अवधि लंबी हो जाएगी, ऋतु चक्र परिवर्तित हो जाएगा, कृषि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, वातावरण विरल हो जाएगा, चक्रवातों-तूफानों-सुनामी तथा भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं से मानव अपनी ही बनाई इमारतों में दफन होगा।

* महामारियाँ मानव का ग्रास करेंगी; नयी नयी बीमारियां उत्पन्न होंगी, विषाणु व जीवाणुओं के डी०एन०ए० में परिवर्तन होगा जिससे वो हमारी दवाओं के विरुद्ध अधिक शक्तिशाली हो जाएँगे।

* खाद्य श्रंखला टूटेगी, जीव भूख से तड़प तड़प कर जान देंगे, मानव भी भूखा शीत मृत्यु की शैय्या में पड़ा होगा। मानवीय अपराधों में असीमित बढ़ोतरी होगी।

* सर्दियों की अवधि बढ़ जाएगी; मैदानी इलाके भी बर्फ से पट जाएँगे उसके बाद अचानक लंबी गर्मी और भयंकर बारिशों से चट्टानी संरचनाओं का क्षरण व मृदा का अपरदन बढ़ेगा।

* छद्म ऊर्जा के स्त्रोत भी काम करना बंद कर देंगे।

* सबसे पहले पर्वतीय व तटीय इलाकों का विनाश होग, उसके बाद शहरों का नाश होगा क्योंकि वहाँ का निवासी पूरी तरह से पराधीन है, पेट भरने के लिए वो गावों के खेतों से आ रहे अनाज तथा सब्जियों पर निर्भर है।

* शहरों में पानी अत्यधिक गहराई पर पहुँच चुका है जिसे बिना बिजली के पाया नहीं जा सकता और नदियों, तालाबों या झीलों का पानी इतना प्रदूषित हो चुका है कि पानी न कह कर जहर ही कहा जाने लगा है ।

विकास की अंध भक्ति मे डूबे शहर, सत्तासीन, नवीन व व्यावसायिक मानव कातर दृष्टि से अपने इष्टों के प्राण आहुति के साक्षी बनेंगे। आज की गई भूल या अनदेखी उस वक़्त काल नजर आ रही होगी।

वर्तमान की एक छोटी गलती विश्व को किस मोड़ पर खड़ा करेगी उसका अंदाज़ लगाना कठिन है जिस प्रकार सिर्फ दो लोगों की क्षुद्र सत्ता भूख ने भारत और पाकिस्तान का विभाजन कराया और आज दोनों देशों को 250 से ज्यादा परमाणु बम दे दिये। आखिर कौन सी दूरदृष्टि थी इनकी, जिसने उनके ही डेढ़ अरब वंशजों को नष्ट करने की राह पर ला खड़ा किया? इसी प्रकार उत्तर कोरिया-दक्षिण कोरिया, फिलिस्तीन-इज़राइल, इराक़-ईरान, चीन-जापान, अमेरिका-रूस, सीरिया, लीबिया, अफगानिस्तान, विएतनाम, यूक्रेन, केन्या, नाइजीरिया इत्यादि किस संतुष्टि के लिए उलझते हैं? वो किससे लड़ना चाहते हैं? वो किसको तबाह करना चाहते हैं? इसका अंजाम क्या होगा?

चाहे पारिस्थितिक असंतुलन हो, धर्मांधता हो, सत्ता संघर्ष हो, सीमाओं में बंधते देश हों या परमाणवीय विनाश का सृष्टि के ऊपर मँडराता खतरा हो. मानव अपने लोभ की वेदी पर विलुप्त होने की कगार पर है।

पृथ्वी का कुछ नहीं बिगड़ेगा वो अपनी संरचना में परिवर्तन कर लेगी, ऊर्जा फिर से बटेगी जीव में, जीवन का फिर से विकास होगा परंतु सृष्टि का सबसे उत्कृष्ट जीव – मानव समाप्त हो जाएगा।

लेकिन शायद मानव अभी भी बच सकता है। ऊर्जा के दो पहलू होते हैं सकारात्मक और नकारात्मक. उसी प्रकार मानव मन में भी सदैव द्वंद चलता रहता है. एक तरफ प्रेम, सौहार्द, वात्सल्य, बंधुत्व, सामाजिकता और नैतिकता का भाव है तो दूसरी तरफ अनीति, कठोरता, घृणा, प्रतिकार, संकीर्णता, निर्दयी क्रूरता का विम्ब है। सभी जीव दोनों पक्षों के वाहक हैं लेकिन सिर्फ मानव ही इन दोनों मे भेद कर सकता है और शांत भाव से आने वाले भविष्य के लिये क्या उचित है उसका विश्लेषण कर सकता है। सम्पूर्ण मानवता दांव पर लगी हुई है और शायद ही ऐसा कोई मानव होगा जो अपनी पीढ़ियों के प्रति चिंतित न हो? कट्टर से कट्टर व्यक्ति का भी कलेजा रो पड़ता है अगर अनजाने से भी किसी अबोध बालक का खून से सना शव देख ले। अनैतिकता व घृणा सिर्फ दूसरों के सामने स्वयं की उत्कृष्टता को साबित करने का मात्र दिखावा होती है जबकि वो कठोर व्यक्ति भी एकांत में प्रेम और वात्सल्य की मूर्ति होता है।

हे मानव अपनी ऊर्जाओं को पहचान। अपने जन्म के प्रयोजन की खोज कर लेकिन भौतिकता से सृष्टि का विनाश मत कर । जीवन जीने की न्यून आवश्यकताएँ और सृष्टि द्वारा उनकी आपूर्ति को समझ।

बहुत संभव है की अधिकतर लोग इस लेख को विकासविरोधी समझेंगे परंतु इस संदर्भ मे उनसे सिर्फ एक ही सवाल है की सांस लेने योग्य वायु न हो, सूखे कंठ को पानी न हो और तुम्हारी संतान तुम्हारा कपड़ा पकड़कर भूख से बिलख रही हो. उस वक़्त तुम किस विकास के पक्षधर होगे? याद रखो केदारनाथ त्रासदी में आदमी लाखों रुपयों में एक–एक पानी की बोतल खरीद रहा था. फिलीपींस का हैयान तूफान, ब्रिटेन की प्रलयंकारी बाढ़, जापान की सुनामी और अमेरिका का पोलर वोर्टेक्स अथवा शीत चक्रवात के रूप मे टनों बर्फ विकास नहीं विनाश की आहट है।

मानव को अपने जीवन को बचाने के लिए स्वयं के संकल्प और क्रियान्वयन की आवश्यकता है न की किसी राजनीतिक इच्छाशक्ति या बाह्य सहायता का इंतजार। राजनीति तथा व्यवसाय सिर्फ दंभ व स्वार्थ की प्रतिपूर्ति करते हैं। स्वविनाश के लक्ष्य की ओर उन्मुख राजनीतिज्ञों, वेद में इंद्र को पुरंदर कहा गया है जो मानसृजित इमारतों, बांधों को नष्ट करता था, जो वणिकों के व्यवसाय का विरोधी था तथा जंगलों में आत्मविद्या की साधना करने वाले साधुओं की रक्षा करता था, जो वास्तव में प्रकृति संरक्षक था। ये था हमारा भारत जिसे जंगलों और प्रकृति के सान्निध्य में असंख्य साधुओं-सन्यासियों द्वारा अनवरत खोज करके लिखा गया है. अत्यधिक नूतन विज्ञान चिरकाल से भारत के जंगलों में पोषण पाता रहा है।

झूठे विकास की तरफ मत भटको, अपने भारत को बचा लो। कुछ कठोर और असहज समाधान हैं जिन्हें करना शायद आपके वश में न होगा परंतु मृत्यु की हकीकत का सामना, बच्चों और ईष्ट जनों का करूण चेहरा आपकी प्रेरणा बनेगा।

    सबसे पहले ज़मीनों की खरीद फरोख्त का व्यवसाय एकदम बंद करें तथा अल्प जरूरत के मुताबिक ही जमीन में कंक्रीट बिछायेँ।

    हर घर में छोटी बगिया बनाएँ जिसमे लौकी, कद्दू जैसी बेल वाली सब्जियाँ या फिर भिंडी इत्यादि जरूरत भर की सब्जियाँ उगा सकें।

    घरों को जमीन से 1-2 फुट ऊंचाई पर बनाएँ तथा उसके नीचे साफ पानी (वर्षा जल) जमा करने का उपाय करें। नालियों व नालों में बालू, मौरंग और बजरी की परत डालें जिसके घर्षण से पानी साफ होता रहे तथा सिल्ट की समस्या से बचने के साथ ही जमीन पानी भी सोखती रह सके, नालियाँ ऊर्ध्व “एल”/बंध आकार की बनाएँ जो पानी को देर तक जमीन पर रोक सकें।

    घरों में भी कीटनाशकों का प्रयोग कम कर दें और यदि करें भी तो उसका प्रवाह कम करें।

    साबुन, लोशनों, डिटर्जेंट का इस्तेमाल कम करें, इनसे मिश्रित पानी नालियों, तालाबों, नदियों व सतही पानी को बर्बाद कर देता है और उसमे मौजूद जैविक श्रंखला की मृत्यु का कारण बनता है. यह पानी किसी के उपयोग के लायक नहीं रह जाता, इससे बदबू, जहरीलापन, मच्छरों और महामारियों का जन्म होता है।

    नदियों में किसी भी प्रकार का कचड़ा या मूर्तियों का विसर्जन न करें, यह अवैज्ञानिक है और न ही वेदों मे वर्णित है।

    तालाबों को पुनर्जीवित करें, उनका अतिक्रमण न करें और न ही कचरा डालने का साधन समझें। इनका हमारे जीवन व कृषि में अप्रतिम योगदान है, जिसकी वास्तविकता समझें. जमीन के नीचे का पानी जहरीले खनिजों व लवणों से युक्त होता है इसीलिए सृष्टि ने इस पानी को मानव की पहुँच से दूर रखा था, पीने योग्य पानी सतत बहता हुआ और ऊपरी परत का ही होता है. गुरुत्वाकर्षण द्वारा खीचें गए खनिजों से भरा जमीन का भीतरी पानी कैंसर, पथरी, हेपाटाइटिस जैसी जानलेवा बीमारियों का जनक है। हम लोगों द्वारा सतह का पानी बर्बाद किया जा चुका है लेकिन यह हम सबके सघन प्रयास से मात्र 2-5 साल की बारिश से फिर से प्राप्त किया जा सकता है।

    तालाबों व नदियों के किनारे वनों व छोटे पौधों को रोपित करें तथा वहाँ से निर्माणों को हटाएँ, लगभग 50-100 घरों के आस पास एक तालाब होना नितांत आवश्यक है। अपनी नदियों तथा तालाबों को स्वच्छ करें।

    जमीन का अतिक्रमण रोकें, खाली पड़ी फैक्ट्रियों और उनकी ज़मीनों का नयी फैक्ट्रियों तथा आवासों के लिए उपयोग किया जाये।

    शहरों में मकानों को आवंटित किया जाये न की बेचा जाये जिससे अमूल्य भूमि का खेती व स्वनिर्भरता के लिए सदुपयोग हो सके साथ ही साथ पैतृक मकान के साथ पीढ़ियों का जुड़ाव रह सके।

    शहरों में न तो सड़कों की कमी है और न ही आदमियों की अनियंत्रित भीड़, बल्कि कारों, बाइकों व ट्रकों का जाम है, इनके ऋण की व्यवस्था को सीमित किया जाये तथा उपयोग को हतोत्साहित किया जाये।

    पब्लिक ट्रांसपोर्ट को सरकार बढ़ावा दे, साइक्लिंग, कार पूलिंग, टैंपो, बसों का उपयोग गौण न समझें बल्कि भविष्य के लिये ऊर्जा का संरक्षण करें।

    प्लास्टिक, काँच, पेपर, तथा आर्गेनिक कचरों को घरों से ही अलग अलग करके उचित निस्तारण करें, अन्न का उपयोग सीमित व जरूरत के आधार पर करें उसका एक दाना भी बर्बाद न करें। जाने कितने भूखे पेट उस दाने का इंतज़ार कर रहे हैं।

    पारिस्थितिक तंत्र के अनुसार नैसर्गिक पौधों व वृक्षों को बढ़ावा दें. सजावटी, प्रसंस्कृत पेड़ पौधे जैव विविधता प्रभावित करते हैं और जलवायु व सामाजिक विकृति लाते हैं।

    परमाणु बमों व सृष्टि को नष्ट करने वाले पदार्थों के घटकों का अध्ययन कर उनको उन्हीं जगहों पर नष्ट किया जाये जहां से उन्हे निकाला गया था। सृष्टि के अपने तंत्र में इनका निस्तारण करने की प्रक्रिया वहीं मौजूद होती है जहां वो यौगिक पाये जाते हैं।

    ऊर्जा व अन्य साधनों का सीमित प्रयोग करें तथा धीरे धीरे उनपर निर्भरता कम करें, जिससे आने वाले समय में जब इनकी कमी हो जाये तब भी हम जीवित रह सकें।

    अतिवादी संस्कृति की पराकाष्ठा मे निहित विनाश का अपने हर कदम पर चिंतन करें, अपने मस्तिष्क के सकारात्मक पहलू को उजागर करें।

पश्चिमी विकास के पक्षधर मेरे दोस्तों जरा विश्लेषण करो उस दशा की जब सीमित ऊर्जा का स्त्रोत खत्म हो जाएगा तब ऊर्जा के अभाव में न बिजली होगी और न ट्रांसपोर्ट के साधन काम कर रहे होंगे उस वक़्त गहरी जमीन में दबा पानी कैसे निकालोगे, नदियों-तालाबों – झीलों का वैसे भी नामोनिशान मिटा चुके होगे, पेट भरने के लिए पौधे, सब्जियाँ या घास पत्ते कहाँ से पाओगे अपनी कंक्रीट या बंजर हो चुकी जमीन पर? भूख और प्यास से तड़पते वक़्त न तुम्हें नैतिकता का ख्याल रहेगा और न समाज का डर लगेगा। राष्ट्र, अनुशासन, राजनीति, प्रांत, धर्म, भाषा, शिक्षा, प्रवचन, संस्कार, वर्ण, सिद्धान्त, पैसा, बिल्डिंगें, पुल, विकास जैसे असंख्य शब्दों का अस्तित्व खत्म हो जाता है पेट के आगे। महंगाई अपने चरम पर होगी और भूखा मानव हर अपराध करने पर विवश होगा क्यों की भूख से अपराध का सीधा रिश्ता है।

हे महामानवों स्वार्थ, वैमनस्य, विकास में छुपे विनाश और वर्तमान की राजनीति मत करो, बल्कि भविष्य की राजनीति करो।

याद करो तुम भारत के जंगलों से निकले हुए वो मानव हो जिन्हें इस ब्रह्मांड की सबसे सरल जलवायु व जीवन मिला है। लौट आओ अपने जंगलों की ओर, और फिर से नष्ट होती प्रकृति तथा मानव संतति को उज्जवल भविष्य दो। तुम संसार के अग्रज हो जहां माँ का सम्मान था, जहां नारी पुरुष का आधार थी, जहां सीताराम, राधेश्याम या गौरीशंकर जैसे शब्दों का अस्तित्व था। जहां विश्व की सबसे उन्नत चिकित्सा व्यवस्था थी। जहां आर्यभट्ट जैसे मानव ने हजारों साल पहले ही पृथ्वी की गोलाई, नक्षत्रों, सूर्य की दूरी, सौर मण्डल, पाई इत्यादि जान लिए थे। जहां स्त्री स्वयंवर मे खुद वर चुनती थी। जहां स्त्री पीढ़ियों की शिक्षक व अभिभावक थी। मातृ और वात्सल्य प्रधान भारत आज गर्त की ओर अग्रसर है क्योंकि वो उन भौतिकवादियों और अत्यंत पिछड़े विश्व का अनुसरण कर रहा है जिनका अनुसंधान, जिनकी रूढ़ियाँ, जिनका विज्ञान, जिनकी सभ्यता हम जंगलियों से हजारों साल बाद की है।

हां हम वो जंगली हैं जिसे दस वर्ष की आयु तक माँ ने पढ़ाया है, जिसका गुरुकुल जंगल है, जिसकी प्रयोगशाला जंगल है, जो 25 से 50 साल तक गृहस्थ है। हम वो जंबूद्वीप वासी हैं जहां जन्म जंगल है, जहां मृत्यु जंगल है, जहां उल्लास जंगल है, जहां प्रलाप जंगल है, जहां एकांत जंगल है, जहां अध्यात्म जंगल है. जहां ऊर्जा का सिद्धांत है, जहां पृथ्वी गर्भ है, जहां विश्व कुटुम्ब है, जहां सीमाएं नहीं हैं, जहां धर्म नहीं है, जहां प्रत्येक जीव आत्मा है, जहां सत्ता की लालसा नहीं है, जहां झूठा दिखावा नहीं है, जहां शान या प्रतीकार नहीं है, जहां मानव शांत है। जहां हजारों सालों से अतिक्रमण में भी जीवित निरपेक्ष साधुओं या फकीरों की वो जमात है जो जंगलों में बैठे इस सवाल का जवाब खोज रहे हैं की –

“मानव क्या है? वो क्यों आया इस धरा पर? क्या वो भी अन्य जीवों की तरह जीवन जीने का यत्न करे और उसके बाद प्राण त्याग दे?”

आओ दोस्तों चलें अब वापस अपने जंगलों की तरफ जहां सीमाओं में बंधे राष्ट्रों की तरह विध्वंस और मृत्यु का विकास नहीं है, जहां विकास है मानव का पारलौकिक विज्ञान, प्रकृति और मानवता में। जहां स्वयं की खोज है……

लेखक राम सिंह यादव कानपुर के निवासी हैं. उनका ब्लाग www.yadavrsingh.blogspot.com नाम से है. राम सिंह यादव से संपर्क yadav.rsingh@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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