सुधीर अग्रवाल को भेजे रिजाइन लेटर में प्रशांत चाहल ने खोली भास्कर, चंडीगढ़ की पोल

सेवा में, श्री सुधीर अग्रवाल जी, मैनेजिंग डायरेक्टर, दैनिक भास्कर कॉर्पोरेशन लिमिटेड, 6, द्वारका सदन, प्रेस कॉपलेक्स, एमपी नगर, भोपाल,  मध्य-प्रदेश। विषय: पद से इस्तीफा देने का नोटिस। महोदय नमस्कार, मैं पिछले 16 महीने से भास्कर समूह का सदस्य हूं। भास्कर के चंडीगढ़ दफ्तर में संपादकीय विभाग में कार्यरत हूं और सिटी लाईफ में बतौर रिपोर्टर काम कर रहा हूं। ग्रुप के सदस्य के तौर पर गुजारे इस कार्यकाल में, जोकि बेहद छोटा है, मैंने हमेशा ही विशेष ध्यान संस्थान की नीतियों को समझने में लगाया। संस्थान की मान्यताओं, उसकी बुनियाद और उन लक्ष्यों को जानने की कोशिश की, जिन्हें कंपनी जीतना चाहती है। अखंडता, विश्वसनीयता और इनोवेशन के दम पर सामजिक-आर्थिक बदलाव लाकर देश का समानित और सबसे बड़ा मीडिया ग्रुप बनने का जो सपना कंपनी देखती है, उसे जीने का प्रयास किया। 
05 मई, 2012 को मैं पहली बार चंडीगढ़ भास्कर के दफ्तर में पहुंचा था। उस वक्त कमलेश सिंह सीपीएच-2 के स्टेट हैड हुआ करते थे और सौरभ द्विवेदी, सिटी लाईफ डेस्क के इंचार्ज थे। भास्कर मैनेजमेंट, सीपीएच-2 की राजधानी चंडीगढ़ से ऑटोमोबाइल्स पर व्हील्ज नाम का एक पाक्षिक सप्लीमेंट निकालने की तैयारी में था। मौलिक कंटेंट जुटाना इसकी पहली शर्त थी। इसके लिए कमलेश सिंह की सरपरस्ती में एक टीम का गठन हुआ, जिसमें एडिटिंग का जि़म्मा गजेंद्र सिंह भाटी और कुलदीप मिश्र को दिया गया। रिपोर्टर चुने गए मैं और देश दीपक खुराना। रिक्रूटमेंट-प्रक्रिया पूरी करने के बाद 11, मई को मेरी ऑफिशियल ज्वाइनिंग हुई, जिसमें मुझे ई-2 ग्रेड के साथ एपलाई कोड 22469 दिया गया। इसके बाद टीम ने सप्लीमेंट पर काम शुरू किया और 14 मई को व्हील्ज का पहला अंक निकाला।
 
करीब पांच महीने चले इस पुल-आउट के हमने 10 अंक तैयार किए। चूंकि हिन्दी प्रिंट मीडिया का अपने आप में यह पहला बेहद प्रोग्रेसिव प्रयास था, इसीलिए चंडीगढ़ मार्केट को फोकस कर रही करीब सभी ऑटो कंपनियों ने एक-एक कर हमसे संपर्क किया। व्हील्ज को लेकर मार्केट में सभी लोग आश्वस्त थे और रेस्पॉन्स बेहद पॉजिटिव था। तमाम बड़ी कंपनियों के इंटरव्यू और टेस्ट-ड्राइव इसके लिए लाइन-अप की जा चुकी थी। लेकिन सक्र्युलेशन, एक ऐसी समस्या रही, जिसका डिपार्टमेंट हल नहीं निकाल पाया। यह अनियमितता पाठक सर्वे में भी दर्ज हुई, पर लाईलाज ही रही। इस बीच ऐसे विज्ञापनदाता, जिन्होंने कंपनी को ऐड दी थी, वो पाठकों तक अखबार नहीं पहुंचने से नाराज हो गए। इसमें होंडा और महिंद्रा जैसे वो दो बड़े क्लाइंट भी थे, जिन्होंने व्यक्तिगत तौर पर मुझसे अपनी शिकायत रखी थी। अंतत: मार्केटिंग डिपार्टमेंट के कहने पर हमें अक्टूबर, 2012 में व्हील्ज को बंद करना पड़ा। इसका आखिरी सप्लीमेंट 24 सितंबर, 2012 को निकला था, जोकि संदर्भ के लिए संलग्न किया गया है।
 
इस बीच मैनेजमेंट ने पदों को लेकर संस्थान में भारी  फेरबदल किए। सिटी लाईफ  देख रहे सौरभ द्विवेदी को  लुधियाना भास्कर के संपादक के तौर पर ट्रांसफर कर दिया गया। पंजाब पॉलिटिकल ब्यूरो देख रही शायदा बानो को सिटी लाईफ का इंचार्ज नियुक्त किया गया। साथ ही व्हील्ज को लेकर मैनेजमेंट की कोई क्लियर रणनीति नहीं होने के कारण ऑटोमोबाइल्स को सिटी लाईफ की ही एक बीट बना दिया गया, जिसका दारोमदार मुझे सौपा गया। इस बदलाव को बेहतर ढंग से निभाने के लिए मैंने टीम की नई हैड शायदा बानो को अपने सुझाव दिए थे। मैंने उनसे कहा था कि ऑटोमोबाइल्स के लिए तीसरे या चौथे पन्ने पर एक साप्ताहिक आधा पेज फिक्स कर दिया जाए, जिसके लिए कंटेंट शहर के स्तर से ही जुटाया जाए। इससे रीडर के लिए लोकल कनेक्ट रहेगा, अखबार को गुड मिक्स मिलेगा और ऑटो इंडस्ट्री के लोकल विज्ञापनदाताओं को आकर्षित किया जा सकेगा। चूंकि यह प्रस्ताव सिटी लाइफ के लिए था, तो इसमें सक्र्युलेशन की भी कोई समस्या नहीं आती।
 
लेकिन, शुरुआत से ही शायदा जी की नजऱ में ऑटोमोबाइल एक ट्रीवीयल बीट रही है, जिसकी खबरें छापना अखबार के लिए खास जरूरी नहीं है। इस बात को लेकर मीटिंग में जितनी बार उनके साथ विमर्श किए गए, वो नाकाम रहे। व्यक्तिगत स्तर पर उनसे बात करने कि कोशिश की गई तो उनका जवाब बेहद निंदनीय था। उन्होंने कहा कि तुम नौकरी की आड़ में अपने शौक पूरे करने की कोशिश मत करो। तुम्हारे एक्सपोजर को मुझे पर्सनल लेवल पर जाकर भी काटना पड़ेगा, तो मैं काट दूंगी। मैडम शायदा के इस रवैये ने नौकरी से जुड़े मेरे पैशन को लगभग मार डाला, जो नौकरी करने का मेरा मुख्य प्रेरणा स्रोत था। यहां तक कि 01, जुलाई 2013 को कंपनी की तरफ से जारी की गई उद्देश्यों और निर्देशों की स्लाइड, जिसमें ऑटोमोबाइल अपडेट्स को टॉप फोकस एरिया में रखने की बात कही गई थी, को भी धता बताकर उन्होंने खारिज कर दिया। (कंपनी द्वारा जारी की गई उद्देश्यों और निर्देशों की स्लाइड संलग्न है) बावजूद इसके मैंने ऑटोमोबाइल की खबरों को लाईफ स्टाइल एंगल से तैयार किया और सिटी लाईफ में अपनी जगह बनाई।
 
इस प्रोफाइल में ही मैंने शहर का हर ऑटो इवेंट, मोटर-स्पोर्ट इवेंट, रैलिंग से जुड़े नामी लोगों के इंटरव्यू और मर्सडीज, आउडी, जगुआर जैसी कारों के रिव्यू को शामिल किया। साथ ही समय-समय पर महिलाओं पर बेस्ड, यंग-अचीवर्स की प्रोत्साहक कहानियों और प्रायर इन्फॉर्मेशन वाली खबरों को कवर किया। इसी दौरान कंपनी ने डीबीसीएल ग्रुप के नाम पर चंडीगढ़ के दादा मोटर्स से एक नई लग्जरी सेडान जगुआर-एक्स जे खरीदी, जिसकी डीलिंग मार्केटिंग हेड केवल साहनी ने की थी। यह कार भोपाल की जगह चंडीगढ़ से ही क्यूं खरीदी गई, शायदा जी ने इसकी छानबीन करने के आदेश मुझे दिए। इसके लिए जब मैंने साफ इनकार किया, तो उन्होंने इसे मेरी नाकामी बताया। साथ ही मुझे बीट से हटाने की बात करते हुए छानबीन की जिमेदारी देश दीपक को दे दी।
 
नीतियों को लेकर अस्पष्टता  और उसकी वजह से पनप रहे  द्वंद यही तक नहीं रहे। शायदा जी की नजऱ में अखबार के लिए प्लानिंग और कंटेंट जुटाने का संज्ञान, हमेशा ही वरीयता क्रम में टीम के सदस्यों को व्यक्तिगत तंज कसने से नीचे रहा है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण बनी गैलप: एपलाई एंगेजमेंट सर्वे-2013 की रिपोर्ट, जिसे कंपनी सालाना अपने कर्मचारियों की वचनबद्धता और कार्यक्षेत्र में संतुष्टि को मापने के लिए करवाती है। इसके लिए दस करोड़ का अच्छा खासा खर्च भी अदा करती है। इस बार सिटी लाईफ का फीडबैक फार्म नवबर, 2012 में भरा गया था, जिसकी रिपोर्ट जून के आखिरी सप्ताह में सामने आई। रिपोर्ट का नंबर था 10800। इसमें सामने आए रिजल्ट काफी हैरतंगेज थे। कर्मचारियों की प्रोग्रेस और उनकी कार्य-मिशन को लेकर समझ (पर्पज) 17 फीसदी घट गई, जोकि लाजिम तौर पर समय के साथ बढनी चाहिए थी।
 
वहीं, पिछले लीडर के नेतृत्व में जहां सभी कर्मचारी 43 परसेंट काम को लेकर वचनबद्ध थे, वह घटकर 14 परसेंट ही रह गए। काम के दौरान लीडर के सामने साथियों की राय यानि ओपिनियन काउंट भी बराबर इसी दर से घट गया, जिसका सीधा असर प्रोडक्ट की क्वालिटी पर पड़ा। रही बात काम को लेकर टीम की संतुष्टि (ओवरआल सेटिस्फेक्शन) की, तो वह पिछले नेतृत्व में 33 परसेंट थी, जोकि अब शून्य रह गई है। रिपोर्ट कार्ड में ले देकर जो एक मात्र चीज बढ़ी है, वह है कर्मचारियों के लिए मुहैया कराया गया मटीरियल और सुविधाएं। इसमें लीडर की कोई भागीदारी होती नहीं है, क्योंकि इसका क्रेडिट सीधे कंपनी को जाता है। मसलन, पूरी टीम ने इस नेतृत्व को अपनी राय में सिरे से खारिज कर दिया। मैंने इसका जि़क्र अपने सालाना मूल्यांकन (अप्रेजल) फार्म में भी किया था। लेकिन उस पर कोई विचार नहीं किया गया। बल्कि उसके बदले में मेरे इंक्रीमेंट शेयर से 4 फीसदी सेलरी, जोकि बढ़ सकती थी, काट ली गई। हालांकि, यह बेहद स्पष्ट है कि कम सैलरी या इंक्रीमेंट इस नोटिस का कारण बिलकुल नहीं है। बल्कि मैं मैडम शायदा के गलत व्यवहार और इससे बिगड़ रही वर्किंग कंडीशन के कारण यह इस्तीफा देने को मजबूर हूं। (संदर्भ के लिए गैलप:एपलाई एंगेजमेंट सर्वे-2013 की रिपोर्ट संलग्न है)
 
फिलहाल, आलम यह है कि शायदा जी मेरी दी गई किसी भी खबर को सिटी लाईफ में छपने नहीं दे रही है। व्यक्तिगत तंज कसे जाने का सिलसिला जारी है, जिससे वह मजबूर है। यह रवैया टीम के बाकी सदस्यों पर भी बराबर लागू है। यहां तक की आए दिन टीम के कुछ सीनियर लोगों को धमकाकर, उनसे इस्तीफे की मांग करना इसमें शामिल है। हाल ही में उन्होंने मेरी ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री की प्रायर इन्फॉर्मेशन बेस्ड खबर को गिरा दिया। हवाला दिया गया मार्केटिंग टीम द्वारा जारी की गई इपॉर्टेंट फॉर न्यूज़ नाम की एक लिस्ट का, जिसमें उक्त कंपनी की खबर छापना बैन है। यह वही लिस्ट है जिसे कंपनी ने इयर क्लोजिंग और अप्रेजल के साथ तैयार किया था।
 
मार्केटिंग टीम की माने तो इसमें आदित्य बिरला, टाइटन इंडस्ट्री, नोकिया, ज़ी-टेलीफिल्स, लॉरियाल पेरिस, पेंटालून, हीरो मोटर्स, वाया कॉम 18 जैसे तमाम वो बड़े ग्रुप हैं जो भास्कर को विज्ञापन नहीं देते है। हमें यह लिस्ट शनिवार, 03 अगस्त को थमाई गई। इसके ठीक दो दिन बाद यानी सोमवार, 05 अगस्त को शायदा जी जेट-एयरवेज की फ्लाईट संख्या 92-467 से तीन दिन के लिए मुंबई की फन ट्रिप पर निकल गई। यह ट्रिप स्टार टीवी द्वारा प्रायोजित थी और नए टीवी शो, जूनियर मास्टर शेफ के प्रमोशन के लिए आयोजित की गई थी। यहां जानकारी के लिए बता दूं कि स्टार-टीवी का नाम भी उस लिस्ट में शामिल है, जिन्हें छापने पर भास्कर ने बैन लगाया है। यह जानते हुए भी वह ट्रिप पर गई। साथ ही 8 अगस्त के सिटी लाईफ में चौथे पन्ने पर उसकी कवरेज को क्वार्टर पेज साइज की जगह भी दी। ऐसे में नियम और नीतियों को लेकर यह दोहरा रवैया, मेरी समझ से परे है। (हवाई जहाज का टिकट और स्टार-टीवी की कवरेज संलग्न की गई है)
 
अपने कार्यकाल में बतौर भास्कराइट  मैंने पत्रकारिता संबंधी विविध  अवसरों का अनुभव किया। शानदार  एक्सपोजर मिला और अपनी जिमेदारी  को तहे दिल से स्वीकार किया। इस दौरान मैंने अपने सभी वरिष्ठ सहयोगियों के अनुभव का भी भरपूर लाभ उठाया। अधिक से अधिक सीखने की कोशिश की और उनका स्मरणीय स्नेह अर्जित किया। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। दफ्तर के बीचों-बीच लगे एक बड़े पोस्टर पर बोल्ड फोंट में कपनी ने लिखकर जिन तीन पिलर्स (आधार स्तंभों) का जिक्र कर रखा है, वो अब मिसिंग हैं। पिलर्स में सबसे बड़े अक्षरों में लिखा गया है एथिकल गवर्नेंस यानी नीतिपरक शासन प्रणाली, जोकि पूरी तरह से नदारद है। यह समस्या टीम लीडर के तौर पर शायदा बानो को नियुक्त करने से शुरू हुई थी और अब अपनी चरम सीमा पर पहुंच चुकी है। शायदा जी की अटपटी नीतियों के चलते टीम के दो सदस्य (देश दीपक और कुलदीप) संस्थान छोड़कर जा चुके हैं। साथ ही कुछ और सदस्य ग्रुप छोडने की तैयारी में हैं।
 
इसी सिलसिले में मैं भी रोजाना बिगड़ रही वर्किंग कंडीशन के कारण अपने इस्तीफे का यह नोटिस दे रहा हूं। क्योंकि लंबे समय से चल रहे जॉब मिसमैच के हालात ने अब जाकर असंतुष्टि का रुख इतियार कर लिया है। साथ ही तयशुदा ढंग से निकाले जा रहे व्यक्तिगत द्वेष और तानाशाह रवैये ने इसे और बढ़ावा दिया है। काम के बीच आ रही इन सभी समस्याओं को मैंने गैलप सर्वे में, अप्रेजल फार्म में, गैलप एक्शन प्लान मीटिंग में, व्यक्तिगत तौर पर जाकर टीम लीडर के सामने भी मौखिक रूप से जाहिर किया था। लेकिन इस संदर्भ में किया गया हर किस्म का कयुनिकेशन विफल रहा। अत: महोदय मेरा आपसे यह विनम्र अनुरोध है कि मेरे इस नोटिस को इस्तीफे की पूर्व सूचना के तौर पर स्वीकार किया जाए।
 
नोटिस स्वीकार किए जाने की  पुष्टि अथवा इस संदर्भ में समुचित प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में यथायोग्य अभिवादन सहित।
 
धन्यवाद!
आपका
 
चौधरी प्रशांत चाहल
रिपोर्टर, सिटी लाईफ डेस्क,
चंडीगढ़, दैनिक भास्कर।
एपलाई कोड: 22469
ग्रेड: ई-2

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *