सुनिए लम्हों की दस्तक

17 दिसम्बर से देश एक बेजोड़ कोलाहल के भंवर में है। वीभत्स सामूहिक बलात्कार की घटना ने तो बस चिन्गारी का काम किया। विस्फोटक पदार्थ तो ना जाने कब से दिल्लीवासियों के ज़हन में जमा हो रहा था! शायद, पहली बार मीडिया के बताये बगैर ही वहशीयाना वाकये की बारीक़ बातें हर ख़ास-ओ-आम तक पहुंच गयीं। इससे निपटने के लिए क्या किया जाना चाहिए? इस यक्ष प्रश्न को लेकर ‘जितने मुँह, उतनी बातें’। सबसे सतही रवैया हमारे हुक़्मरानों का है। टेलीविज़न की चर्चाएं भी महज़ रस्म अदायगी भर हैं। बीमारी के सारे लक्षण महामारी के हैं, लेकिन नुस्ख़ें वही ‘लकीर का फ़कीर’वाले।

तमाम अपराधों की तरह महिलाओं के साथ होने वाले हादसों के पीछे भी सामाजिक और प्रशासनिक दोनों पहलू हैं। ये सच है कि महिलाएं तमाम सामाजिक  भेदभाव और बदसलूकी झेलती  हैं। लेकिन ये सदियों से हो रहा  है। क़ाबिल-ए-तारीफ़ तो ये है कि अब बड़ी तादाद  में महिलाएं आवाज़ बुलन्द कर पा रही हैं। क्या 10, 20, 50, 100 या 200 साल पहले ऐसा था? ऐसे सामाजिक बदलाव में प्रशासनिक योगदान की अहम भूमिका रही है। अलबत्ता, वक़्त की मांग के लिहाज़ से सब कुछ नाकाफ़ी साबित हुआ है।

प्रशासनिक तरीकों से ही सामाजिक बदलाव पुख्ता बनते हैं। लेकिन देखते ही देखते भारत के प्रशासनिक निक्कमेपन के बादलों ने पूरे समाज को ढक लिया। इसकी सही वज़ह को समझने तक ‘महामारी’ बेकाबू ही रहेगी। सबसे पहले हमें समझना होगा कि पुलिस ही हुकूमत का बुनियादी चेहरा है। कहीं की भी पुलिस हो, उसका बुनियादी चेहरा सबसे निचले स्तर का कर्मचारी यानी सिपाही का ही होता है। आम आदमी का सबसे ज़्यादा वास्ता इसी सिपाही से पड़ता है। हमारी तकलीफ़ों को दूर करने का असली दारोमदार भी इसी सिपाही तबके पर ही होता है। पुलिस का हरेक ख़ोट भी हमें सबसे पहले इसी सिपाही में नज़र आता है।

सिपाही  का भ्रष्टाचार, लापरवाही और कोताही हमें आसानी से दिखते हैं। उसका बर्ताव हमें अक्सर अखरता है। साफ़ है कि सिपाही की अनदेखी करके पुलिस नहीं सुधर सकती। आमतौर पर सिपाही के अफ़सरों को इस बात की कोई परवाह नहीं होती कि उनका मातहत किस हाल में जीता है, कैसे नौकरी करता है, अनुशासन के भारी दबाव के बावजूद क्यों वो वैसे काम नहीं कर पाता, जैसा उससे अपेक्षित है? इसी बुनियादी सवाल के जबाव से पूरी क़ानून-व्यवस्था का रिपोर्ट कार्ड बनता है।

अपराध को रोकने, अपराधी को पकड़ने और पीड़ितों को इन्साफ़ दिलाने का असली दारोमदार इसी सिपाही पर होता है। सिपाही के योगदान के बगैर हम चार क़दम भी नहीं चल सकते। हज़ारों कानूनों  को लागू करने का ज़िम्मा इसी  कमज़ोर तबके के मज़बूत कन्धों पर होता है। सिपाही के पास  किसी व्यक्ति को पकड़कर थाने ले जाने के अलावा और किसी भी कार्रवाई का कोई अधिकार नहीं है। फर्ज़ सारे इसके, ताक़त कुछ भी नहीं। सड़क पर ये सीटी बजाता रहेगा, लेकिन  अगर कोई इसकी नहीं सुने तो ये उसका बाल तक बाँका  नहीं कर सकता! पुलिस का ये बुनियादी चेहरा हर तरह से ख़ुद ही बेचारा है। सिपाही के बारे में बातें तो खूब हुईँ, लेकिन वो आज भी अंग्रेजों या मध्यकालीन दौर में ही जीने के लिए अभिशप्त है। ‘पुलिस सुधार’ आज तक फ़ाइलों से बाहर नहीं निकल पाया।

पूरी  कानून-व्यवस्था में व्यापक सुधार की ज़रूरत है। किसी भी दिल दहला देने वाले हादसे के बाद तमाम बातें जनमानस के सामने दोहरायी जाती हैं। फिर भी कहीं कोई सच्चा और टिकाऊ बदलाव क्यों नहीं दिखता! बातें चाहे पुलिस को राजनीतिक शिकंज़े से बाहर निकालने की हो, नैशनल लिटिगेशन पॉलिसी की, मॉडर्न पुलिस कोड की, पुलिस यूनिवर्सिटी बनाने की, अदालतों में लगने वाले भारी वक़्त की, गवाहों और पीड़ितों के साथ होने वाले गैरवाज़िब बर्ताव की, अभियोजन-महानिदेशालय बनाने की, या फिर जजों और कोर्ट की संख्या बढ़ाने की, किसी का भी नतीज़ा कुछ नहीं निकलता। हालांकि, अबकी बार माहौल कुछ ज़्यादा ही बदला हुआ दिख रहा है। इस बार उम्मीद है कि जनता का उफ़ान देर से ठंडा पड़ेगा और कुछ ना कुछ हासिल भी कर लेगा। लेकिन लगता नहीं है कि कुछ महीनों या सालों में देश की पुलिसिंग सुधर या बदल जाएगी।

दरअसल, ये काम खासा बड़ा और पेंचीदा  है। इसीलिए शक है कि ठोस और बड़े बदलाव आ पाएंगे। वैसे भी भारत में रवायत यही है कि यहां सिर्फ़ एक ही काम समय पर हो पाता है, और वो है, विधायिका की हरेक खाली जगह को छह महीने के भीतर भर देना। संविधान के सिर्फ़ इसी हुक़्म को चुनाव आयोग के ज़रिये हम सिर-माथे पर रखना सीख पाये हैं। बाकी हमारे लोकतंत्र की किसी भी अन्य संस्था पर वक़्त की कोई पाबन्दी नहीं विकसित हो पायी है। अगर किसी को ये लगता है कि सड़कों पर उतरे जनाक्रोश को देखते हुए हमारे हुक़्मरान सबक लेंगे और एक झटके में ‘सारे घर को’ बदल डालेंगे, तो इसे ‘मुंगेरी लाल के हसीन सपनों’ से बेहतर और कुछ नहीं कहा जा सकता।

फिलहाल, ऐसा लग रहा है कि महिलाओं से जुड़े चुनिन्दा अपराधों को लेकर कुछ सख्त क़ायदे हमारे सामने आ जाएंगे। लेकिन जल्दी ही उनका भी वैसा ही हाल होगा, जैसा हमने दहेज उत्पीड़न और बाल विवाद जैसे क़ानूनों का देखा है। ये क़ानून खासे सख्त हैं, फिर भी अपराध की रोकथाम में नाकाम साबित हुए। साफ़ है कि सिर्फ़ क़ानूनी सख्ती सारे मर्ज़ का इलाज़ नहीं है। महिलाओं या अन्य तबके के साथ होने वाले अपराधों की प्रवृति में  सिर्फ़ लिंग (सेक्स) ही निर्धारक तत्व यानी डिटरमाइनिंग फैक्टर नहीं हो सकता। पुलिस और अदालत के ढर्रों में सिर्फ़ मामूली छेड़छाड़ करके उसे असरदार नहीं बनाया जा सकता। महिला पुलिस की संख्या आप भले ही बढ़ा लें, उनका जज़्बा कैसे बदलेगा, ये सोचिए! जो भी गिनी-चुनी महिलाएं पुलिस में हैं, वो अपनी वर्दी पर गर्व नहीं करतीं। तभी तो ड्यूटी तक सिविल ड्रेस में पहुंचती हैं और वापस घर भी सिविल ड्रेस में ही जाती हैं। मर्द पुलिस वाले भी ऐसा खूब करते हैं। समझा जा सकता है कि पुलिस वाले कैसे आत्मविश्वास में जीते हैं!

जो पुलिस के काम-काज़ और तौर-तरीकों को समझते हैं, उन्हें पता है कि अपराध नहीं हो सके, इसका सारा दारोमदार सिपाही पर ही होता है। इसीलिए अपराध हो जाने पर उसका सबसे पहला ‘पराक्रम’ इस बात को लेकर होता है कि एफआईआर दर्ज़ नहीं हो। भले ही ये उससे भी बड़ा अपराध हो! लेकिन पूरे प्रशासनिक तंत्र की खाल बचाने के लिए सिपाही को ऐसा ही करना पड़ता है। दरअसल, हरेक एफआईआर एक आंकड़ा है, जो क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के लिए बेहद अहम है। इसी आंकड़े से देश का आपराधिक मानचित्र बनता है। थानेदार से लेकर मंत्री तक सबको इसी आंकड़े की फज़ीहत झेलनी पड़ती है। लिहाज़ा, पुलिस का पहला उसूल है कि एफआईआर ही दर्ज़ नहीं होनी चाहिए, क्योंकि वही क़ानून-व्यवस्था का आईना है। छोटी-मोटी चोरी, उच्चकागिरी, झपटमारी, जेब-तराशी, राहजनी, महिलाओं से छेड़-छाड़, झगड़ा-फ़साद ये वो अपराध हैं जो समाज में सबसे ज़्यादा होते हैं। गैरसरकारी अनुमान के मुताबिक, इनमें से बमुश्किल पांच फ़ीसदी मामलों में ही एफआईआर दर्ज़ हो पाती है।

पुलिस मानती है कि बड़े अपराधों  के मामले में एफआईआर दर्ज़  करने से बचा नहीं जा सकता।  हालांकि, कोर-कसर तो इसमें भी नहीं छोड़ी जाती। इसीलिए पुलिसिंग को सुधारना है तो सबसे पहले ये सुनिश्चित कीजिए कि एफआईआर तो दर्ज़ हो ही। क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो को तो खत्म नहीं किया जा सकता, लेकिन एफआईआर दर्ज़ होने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा तरीक़े विकसित होने चाहिए। इंटरनेट और एसएमएस क्रांति ला सकते हैं। एफआईआर दर्ज़ होने के बाद पुलिस के काम की समीक्षा इस बात से होनी चाहिए कि उसने क्या जांच या कार्रवाई की, कितने वक़्त में जांच पूरी की, कितने अपराधियों को पकड़ा, क्या बरामदगी की, कितने लोगों को अदालती कार्रवाई के बाद सज़ा दिलवा सकी! झूठी या दुर्भावनापूर्ण एफआईआर दर्ज़ करवाने वाले का क्या हश्र हुआ? पुलिस के काम की समीक्षा सिर्फ़ इन्हीं आधारों पर होनी चाहिए। इसी आधार पर ऊपर बैठे लोग तय करें कि पुलिस कैसा काम कर रही है, उसके सामने क्या चुनौतियां हैं, उससे मुक़ाबले के लिए कितने जन-बल-धन की ज़रूरत है और उसे कैसे जुटाया जा सकता है!

सही तरीक़ा यही है। जब तक हम इसे नहीं अपनाएंगे, तब तक पुलिस के चेहरे का नूर  नहीं बढ़ सकता। वैसे भी समाज में पुलिस के काम  को और पुलिस वाले को कौन  सम्मान से देखता है! कोई भी समाज पुलिस के बगैर एक पल नहीं चल सकता। फिर भी पुलिस को लेकर हमारा रवैया नहीं बदलता है। सड़क पर उतरे लोगों की तकलीफ़, आक्रोश और नाराज़गी के पीछे असली वज़ह यही है। पूरी मुखरता से सिर्फ़ इस बात की रट लगाये रहने से कुछ नहीं होगा कि पुलिस निकम्मी और भ्रष्ट है। ये सब जानते हैं। लेकिन इसकी असली वज़ह क्या है और वो कैसे दुरुस्त होगी? इसकी बात कम ही हो रही है। कड़े क़ानून बनाने, फांसी देने और संसद का विशेष सत्र बुलाने के सारे सुझाव लीपापोती के वहीं आज़माये हुए हथकंडे हैं, जो हम हमेशा से देखते आये हैं। इनसे ज़मीनी हालात नहीं बदलेंगे।

ज़रा सोचिए, कि कैसे किसी मामले में एफआईआर दर्ज़ होने के बाद पीड़ितों को अपना बयान दर्ज़ करवाने से लेकर जांच की पूरी प्रक्रिया के दौरान  क्या-क्या झेलना पड़ता है? इनसे पार उतरने के बाद अदालतों में क्या-क्या छीछालेदर भुगतनी पड़ती है? ऐसा हरेक अपराध के मामले में होता है, सिर्फ़ बलात्कार या हत्या के मामले में नहीं। इस स्तर पर सिस्टम बदलने की ज़रूरत है। हमें ऐसा तरीका विकसित करना पड़ेगा जिससे आम आदमी को ऐसा नहीं लगे कि सालों पहले दर्ज़ करवायी गयी उसकी एफआईआर और उसके बाद चप्पे-चप्पे पर आये दिन होने वाली फज़ीहत से तो कहीं अच्छा था, अपराध को ही नज़रअंदाज कर देते। यही तो पुलिस भी चाहती थी!

ऐसी नज़रअंदाज़ी से न तो अपराध रुक  सकते हैं, ना अपराधी  को सज़ा हो सकती है  और ना ही पुलिस और  हुकूमत को बेहतर बनाया  जा सकता है। जबकि इन  सभी की बेहद ज़रूरत  है। पुलिस की कोई भी  कार्रवाई बगैर कोर्ट-कचहरी  के पूरी नहीं हो सकती।  लिहाज़ा, कोर्ट-कचहरी को  सुधारे बगैर पुलिस और  हुकूमत को नहीं सुधारा  जा सकता। इसीलिए चुनाव  के बाद अगर जनता राज  करने वाली पार्टी और  नेताओं की शक्ल बदल  भी देती है, तो भी ज़मीनी हालात नहीं बदलते। दरअसल, पार्टी या नेता बदलना, इसका इलाज़ है ही नहीं। इसके लिए व्यवस्था बदलनी होगी। सिर्फ़ क़ानून बदलने से भी ऐसा नहीं होगा। कितना भी सख्त क़ानून हो, लागू तो उसे पुलिस और अदालत ही करेंगी। लिहाज़ा इनका चरित्र बदलना पड़ेगा।

क़ानून तो दहेज उत्पीड़न, बाल विवाह और कोख में ही कन्या की हत्या रोकने के लिए भी बने। ये ख़ासे सख्त भी हैं, लेकिन क्या ऐसे क़ानूनों ने सामाजिक कुरीतियां मिटा दीं। ज़ाहिर है, क़ानून की इबारतों की भी एक सीमा है। वो जहां खत्म होती हैं, वहीं से पुलिस, अदालत और हुकूमत की सरहद शुरू होती है। इन्हीं सरहदों के दरम्यान समाज महफूज़ रह पाता है। कानून की सीमा अगर अभेद्य किले जैसी हो भी जाए और हुकूमत की सरहद खुली सीमा की मानिन्द ही रह गयी तो क्या तस्वीर बदल सकती है? नहीं, कभी नहीं। इसीलिए आज तक हुए छिटपुट कास्मेटिक उपायों से बदलाव आ नहीं पाया।

पुलिस और अदालत के चेहरे को बदलने  का काम खासा खर्चीला होता है। दुनिया भर में इसके लिए तरह-तरह के सिद्धान्त  और फार्मूले अमल में लाये जाते रहे हैं। मसलन, कितनी  आबादी पर कितनी पुलिस  होनी चाहिए? पुलिस और अदालत पर कोई राष्ट्र अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) या राष्ट्रीय सम्पत्ति (नैशनल वेल्थ) का कितना हिस्सा खर्च कर सकता है? बिल्कुल वैसे ही जैसे कि किसी देश के रक्षा बजट को उसकी कुल राष्ट्रीय सम्पत्ति के इंश्योरेंस के प्रीमियम के रूप में देखने का फॉर्मूला अपनाया जाता है। लोकतंत्र में कानून के राज का मतलब ही है कि कोर्ट और पुलिस का प्रभावी होना। लेकिन इस मोर्च पर हमारा हाल क्या है, कौन नहीं जानता?

हमें पुलिस और अदालत के लिए नया मॉडल बनाना होगा।  तभी हालात बदलेंगे। लोकतंत्र में हमें ही अपने मंत्रियों और नेताओं की सुरक्षा का बोझ उठाना होगा। भले ही वो आपराधिक छवि वाले ही क्यों ना हों! ‘आपराधिक नेता’ और ‘निर्वाचित जन प्रतिनिधि’, दोनों को एक ही लाठी से नहीं हाँका जा सकता। वीआईपी के अंगरक्षकों का अलग दस्ता बनाया जा सकता है। जैसे हर राज्य में पुलिस का सशस्त्र बल है, या जैसे रैपिड एक्शन फोर्स है, वैसे ही अंगरक्षक कॉडर क्यों नहीं बनाया जा सकता? इससे क़ानून-व्यवस्था वाली पुलिस अलग हो जाएगी। इसी तरह से पुलिस के जांच और मुकदमे वाले काम को भी अलग करने सुझाव सालों-साल से धूल ही फाँक रहा है।

समाज के सम्पन्न तबके ने सिक्योरिटी गार्ड के रूप में अपने लिए और अपने खर्चे पर अलग ‘मिनी-पुलिस’ विकसित कर ली है। शहरों में तेज़ी से बढ़ रहे सिक्योरिटी गार्ड की भारी संख्या भी तो पुलिस का बोझ और ज़िम्मेदारी ही बाँट रहे हैं। इन पर सरकार खर्च नहीं कर रही है। सरकार तो इनके काम करने की दशाओं और शर्तों से भी कोई सरोकार नहीं रखना चाहती। बिल्कुल इसी तर्ज़ पर सम्पन्न लोगों ने अपनी सन्तानों के लिए पब्लिक स्कूल और महंगे नर्सिंग होम तथा निजी अस्पताल विकसित कर लिये। हालांकि, इन गैर-सरकारी सेक्टरों ने भी अलग ढंग से समाज का शोषण किया। क्योंकि, पुलिस की ही तरह सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की हालत खराब होती गयी। वो भी बदलते वक़्त के मुताबिक लोगों की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे। हुक़्मरानों ने पुरानी सरकारी व्यवस्था को बचाने और बढ़ाने के लिए वो सब नहीं किया, जो ज़रूरी था। इसी के चलते पुलिस, बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य जैसी तमाम बुनियादी सरकारी व्यवस्थाओं का पतन आज भी बदस्तूर जारी है।

फ़ौरी तौर पर हमें पुलिस और अदालत में भारी निवेश करना होगा। इसके लिए कमर कसनी होगी। याद कीजिए, कुछ साल पहले तक देश के टेलीकॉम क्षेत्र का क्या हाल था! नया निवेश और तकनीक के आने से आज हरेक व्यक्ति संचार तंत्र से जुड़ गया है। गाँवों में भी जिनके घर में शौचालय नहीं है, पीने के साफ़ पानी का इंतज़ाम नहीं है, जिनके बच्चे स्कूल नहीं जाते, जिनके पास बिजली नहीं है, जिनके पास बुनियादी हेल्थ केयर का इंतज़ाम नहीं है, उनके पास भी संचार क्रांति का मोबाइल पहुंच चुका है। ये सारा बदलाव सिर्फ़ निवेश से आया है।

पुलिस और अदालत में निवेश के लिए हम विदेशी निवेश को भी न्यौता नहीं दे सकते। सरकार  को ही इसे जुटाना होगा। गैर-सरकारी क्षेत्र इसमें नहीं आ सकते। ये हुकूमत के इक़बाल की निशानी हैं। इन्हें राजस्व या मुनाफ़ा कमाने का ज़रिया नहीं बनाया जा सकता। ये कल्याणकारी सरकार यानी वेलफेयर एस्टेट का अहम दायित्व है। संविधान में इसे ही नीति निर्देशक सिद्धान्त यानी डायरेक्टिव प्रिंसिपल कहा गया है। हमें इसकी प्राथमिकता को समझना होगा। चन्द अपराधों के लिए कड़े कानून बना देने की क़वायद से ज़मीनी हालात नहीं बदलेंगे।

सज़ाएं सख्त होनी चाहिए। ज़ुर्माना इतना भारी होना चाहिए कि धन्ना  सेठ भी उसको लेकर ख़ौफ़जदा रहें। हमारे यहां आज भी बाबा आदम के ज़माने की टुच्चे से ज़ुर्माने की दर्जनों  मिसालें मौजूद हैं। इन्हें भी एक तरह के इंडेक्स से जोड़ा जाना चाहिए। रेड  लाइट पार करने पर सौ रुपये  का ज़ुर्माना आज मसखरा  बन चुका है। इसे प्रभावी  बनाने के लिए क्या संविधान  संशोधन चाहिए? हुकूमत का निकम्मापन ज़ाहिर करने के लिए यही मिसाल काफ़ी है। बाक़ी विचित्र किस्म के फ़रमान तो सुप्रीम कोर्ट से भी आ जाते हैं। फ़रमान आया कि कारों के शीशे पर कोई फिल्म नहीं होनी चाहिए। लेकिन अगर कार कम्पनी से ही काले शीशे लगकर आये हैं तो उन्हें आपत्तिजनक नहीं माना जाएगा। यानी चश्मा लगाना गुनाह है, बाक़ी कान्टेक्ट लेंस चलेगा। बेचारे पुलिस वाले आम लोगों की कारों की फिल्में उतारने की मुहिम चलाते रहते हैं। बाक़ी वीवीआईपी की गैर-क़ानूनी लाल बत्ती भी किसी को नज़र नहीं आती। हज़ारों तरह की और भी मिसालें हैं।

सज़ाएं सख्त बनाते वक़्त पर कई सिद्धान्तों को अपनाना होगा। एक ही लाठी से सबको हाँकेंगे तो वैसा ही होगा, जैसा हम अभी  देख रहे हैं। अपराध मनोविज्ञान का एक सिद्धान्त कहता है कि सज़ाएं ऐसी होनी चाहिए  जो लोगों को अपराध करने से डराये। दूसरा सिद्धान्त  है कि सज़ाएं सख्त होने के अलावा  सुधारवादी भी हों। यानी अपराधी को उसकी करनी का फल तो भुगतना पड़े, लेकिन उसे ख़ुद को बदलने या सुधारने का भी मौका दिया जाना चाहिए। दोनों  दलीलों में दम है, लेकिन  कोई पूर्ण नहीं है। इसीलिए दुनिया के ज़्यादातर समाजों की तरह भारत ने भी दोनों  को अपनाया है। हम जघन्यता  और बर्बरता के सिद्धान्त  को अहमियत देते हैं। इसीलिए सभी हत्यारे फांसी के हक़दार नहीं माने जाते।

सही है कि बलात्कार का दंश जीवन भर रहता है। जबरन सेक्स ही बलात्कार नहीं है। तेज़ाबी हमला तो और भयावह है। फब्तियां कसने, अभद्रतापूर्ण स्पर्श करने और यहां तक कि किसी महिला के गले की चेन खींच लेना भी क्या किसी मायने में कम जबरन है! क्या हमें नये सिरे से तमाम अपराधों की गम्भीरता को परिभाषित नहीं करना चाहिए? फिर जब ऐसा करेंगे तो क्या बाक़ी किस्म के अपराधों को सिर्फ़ इसलिए कमतर करके आँका जा सकता है कि उसमें महिलाओं के अलावा कोई अन्य पीड़ित है? यानी, बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी। ज़रूर जाना भी चाहिए। समाज बदल रहा है तो सामाजिक नियम और सिद्धान्त क्यों नहीं! ज़्यादातर महिलाएं बलात्कारी के लिए फांसी की सज़ा को छोटा मानती हैं। उनकी इस दलील में भी दम है फांसी पाकर वो दुनिया का सामना वैसे तो नहीं करेगा, जैसे बलात्कार पीड़ित महिला को पूरी ज़िन्दगी करना पड़ता है! बेकसूर को पूरी ज़िन्दगी का दंश और कसूरवार को पल भर में ज़िन्दगी से छुटकारा! विचार ऐसे भी हैं कि बलात्कारी को नपुंसक बनाकर, उसके माथे पर बलात्कारी लिखकर उसे ज़िन्दगी भर जेल में रखना चाहिए। तीस साल की जेल की बात भी उठायी गयी है। कहना मुश्किल है कि क्या-क्या हरक़तें बलात्कार के दायरे में देखी जाएंगी और बलात्कारी के लिए कैसी सज़ा कठोर होगी! अगर ये कठोर सज़ा फांसी से भी ज़्यादा कठोर मानी गयी, तो फिर वैसी ही कठोर सज़ा को फांसी की जगह क्यों नहीं ले लेना चाहिए? वैसे सभी संज्ञेय या कॉग्निज़ेबल अपराधों को लेकर ये भी कोई कम सख्त सज़ा नहीं होगी कि सज़ायाफ़्ता अपराधी की सारी सम्पत्ति हमेशा के लिए सरकार जब्त कर ले। इसका असर भले ही अपराधी के मासूम परिजनों पर पड़ेगा, लेकिन अगर इसे सावधानी से आज़माया जाए तो ये तमाम सफ़ेदपोशों को भयभीत तो करेगा ही।

फ़ौरी तौर पर अगर आम जनमानस बलात्कारी को कहीं ज़्यादा कठोर सज़ा देने की मांग को लेकर सड़क पर उतरा है, तो इसी मौके का फ़ायदा उठाकर सारे अपराध मनोविज्ञान की ओवरहालिंग कर लेनी चाहिए। हमारी समस्याओं की बड़ी वज़ह सिर्फ़ कड़ी सज़ा में कमी की नहीं है। बल्कि सज़ा देने का हमारा सारा तंत्र ही ‘भोथरे हथियार’ सरीखा हो गया है। इसी हथियार में पैनापन लाना ही बड़ी और असली चुनौती है। रिश्वतखोरी को भी नये तरीके से परिभाषित कीजिए। घूसखोरी का क़ानून तो जन्मजात अपाहिज़ है। उसमें घूस देने और लेने वाले दोनों बराबर के गुनहगार हैं। सबसे भ्रष्ट तो यही सोच है। इसीलिए घूसखोरी क़ायम है।

नौकरशाहों की जबावदेही तय करनी होगी। लेकिन उन्हें पर्याप्त संसाधन दिये बगैर जबावदेह नहीं बनाया जा सकता। पुलिस के पास अगर गाड़ी नहीं होगी तो उससे फटाफट मौक़ा-ए-वारदात पर पहुंचने की जबावदेही कैसे दी जा सकती है! संसाधन की कमी के चलते ही पहले लापरवाही होती है और

मुकेश कुमार सिंह
मुकेश कुमार सिंह
फिर सब कुछ सरकारी चाल से ही चलने को मज़बूर हो जाता है। थाने नीलाम होने लगते हैं, पोस्टिंग बिकने लगती हैं, वोट खरीदें जाते हैं और इज़्जत पर सरेआम हमला होता है। ये सब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इसीलिए जब तक बड़े बदलाव की दिशा में काम नहीं होगा, तब तक ऐसे जनांदोलनों को ज़मीन-बीज-खाद-पानी मिलता ही रहेगा, जैसा हमें हाल के दिनों में दिखा है। डर है कि हम कहीं मौका ना चूक जाएं, और ये नज़ीर दोहरायी जाए कि ‘लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सज़ा पायी’!

लेखक मुकेश कुमार सिंह ज़ी न्यूज़ के एसोसिएट एडीटर हैं। उनसे mukesh1765@gmail.com या 09811207745 पर सम्पर्क हो सकता है।

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