सुनित टंडन साहब, आपको खुली निविदा (ओपेन टेंडर) का विकल्प क्यों नज़र नहीं आता?

Abhishek Ranjan Singh : पिछले दिनों भारतीय जनसंचार संस्थान में सत्र-2013-14 के हिंदी-अंग्रेजी और रेडियो एवं टेलीविज़न पत्रकारिता के क़रीब एक दर्जन छात्र छात्रावास की समस्या को दूर कर कोई वैकल्पिक व्यवस्था करने की मांग को लेकर आईआईएमसी के महानिदेशक सुनित टंडन से मिले और उन्हें एक ज्ञापन सौंपा.

सुनित टंडन साहब ने छात्रों की समस्याओं को दूर करने की बजाय उन्हें "हाथी के दांत" दिखाना शुरू कर दिया. गाज़ीपुर की पूर्व ज़िलाधिकारी रहीं तत्कालीन महानिदेशक स्तुति कक्कड़ की भाषा बोलने में माहिर हैं मौजूदा महानिदेशक भी. सुनित टंडन साहब नए भोले-भाले छात्रों को छात्रावास की प्रस्तावित योजना से संबंधित नक्शा दिखलाने लगे और हमेशा की तरह विलाप करने लगे कि डीडीए और वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से मंजूरी नहीं मिल रही है.

5 अगस्त को नए सत्र के छात्रों के ऑरिएनटेशन समारोह के दिन वरिष्ठ पत्रकार जितेंद्र जी, अभिषेक श्रीवास्तव और मेरी मौजूदगी में छात्रावास के मुद्दे पर महानिदेशक साहब से करीब 45 मिनट तक वार्ता हुई. उनसे हम लोगों ने कहा कि छात्रावास बनने तक छात्रों के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था कर दी जाए और इस बीच नए छात्रावास का शिलान्यास भी कर दिया जाए. इस पर सुनित टंडन ने कहा कि " आप लोग 40-50 कमरे का कोई फ्लैट तलाशिए और उसके मालिक से बात कर हमें बताइये.

उनकी बात सुनकर मैं उत्तेजित होकर कहा- "क्या आप छात्रों को प्रापर्टी डीलर बनाना चाहते हैं? जो छात्र ख़ुद के लिए एक सस्ता किराए का मकान नहीं खोज सकते, वे भला छात्रावास के लिए एक भवन कैसे ढूंढ पाएंगे.''

इस पर मैंने उन्हें सलाह दी कि "भारतीय जनसंचार संस्थान प्रशासन क्यों नहीं छात्रावास के लिए मकान हेतु एक खुली निविदा (ऑपेन टेंडर) जारी कराता.'' इस सुझाव पर सुनित टंडन साहब ने भी अपनी सहमति दी थी और हमें लगा था कि अमरावती, कोट्टयम, आइजॉल और जम्मू की तरह नई दिल्ली कैंपस के छात्रों को भी छात्रावास की सुविधा मिल सकेगी.

लेकिन मुझे इस बात का तनिक भी इल्म नहीं था कि आईआईएमसी के महानिदेशक सुनित टंडन साहब की उन बातों में तनिक भी गंभीरता नहीं थी. अगर वाकई वे छात्रों की समस्या के प्रति गंभीर होते, तो वे सत्र 2013-14 के छात्रों को छात्रावास के लिए फ्लैट तलाशने का बेहूदा सुझाव नहीं देते. मित्रों, भारतीय जनसंचार संस्थान के महानिदेशक और अन्य आला अधिकारियों को छात्रों की समस्याओं से कोई मतलब नहीं है. आप ही बताएं ऐसे संवेदनहीन अधिकारियों के साथ छात्रों को क्या करना चाहिए?

अभिषेक रंजन सिंह के फेसबुक वॉल से.


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