सुप्रिय प्रसाद : दुमका से दिल्ली तक… तुम ही तुम हो

Amarendra Kishore :  ज़िंदगी में ऐसे बहुत कम मौके आते हैं जब मेरी भाषा और शैली मेरी सोच, संवेदना और सृजनशीलता के सामने जवाब देने लगती है। आज अपने संस्थान के एक संगी सुप्रिय प्रसाद के बारे में लिखते हुए सालों बाद मेरी शब्द सम्पदा और शैली खुद को कमजोर महसूस कर रही है। मतलब सुप्रिय की उपलब्धि मेरी सोच, शैली और शब्द से बहुत आगे है।

आज हम सोचने को जरूर मजबूर हैं कि कार्य शैली के किस गुर ने सुप्रिय को इतना सफल और नामवर बनाया। एक प्रसंग याद करता हूँ कि १९९५ में दैनिक राष्ट्रिय सहारा के उप संपादक (प्रशिक्षु) पद की जांच परीक्षा में सुप्रिय का असफल होना हम सहपाठियों केलिए खबर थी। मगर वह उसकी असफलता नहीं थी और न ही योग्यता बल्कि जो भी हुआ वह उस युग का एक दस्तक था जो युग सुप्रिय के नाम लिखा जाना था।

यह विचित्र संयोग है कि झारखण्ड से आयी दो हस्तियाँ लोकमानस में अपना विशिष्ठ स्थान बनाकर देश, दुनिया और समाज को अपनी सेवाएं दे रहे हैं– पहला रांची के महिंदर सिंह धोनी और दूसरा दुमका शहर के सुप्रिय प्रसाद। आईआईएमसी से पत्रकारिता करने के बाद सुप्रिय प्रसाद ने क़मर वहीद नक़वी के अधीन एक ट्रेनी के तौर पर आजतक ज्वाइन किया था। तब आजतक एसपी सिंह के निर्देशन में दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाला एक बुलेटिन भर था। आज की तारीख में टीवी टुडे ग्रुप के चारों चैनलों- आजतक, तेज, हेडलाइंस टुडे और दिल्ली आजतक की जिम्‍मेदारी सुप्रिय के कंधे पर है। इसे कहते हैं सफलता।

करीब २० साल पहले झारखंड के एक कस्बानुमा शहर दुमका के टीन बाज़ार से बतौर स्ट्रिंगर पत्रकारिता का अपना सफ़र शुरू करने वाले सुप्रिय आज हिन्दी टीवी पत्रकारिता के उन चार संपादकों (आशुतोष, दीपक चौरसिया और अजीत अंजूम ) में शुमार हैं जिनके नाम से चैनल का रुतबा है। तभी तो टीवी की दुनिया में कहा जाता है कि सुपिय्र केवल टीआरपी मास्‍टर ही नहीं बल्कि तकनीक के भी जानकार हैं। अपनी टीम से कैसे काम लिया जाता है, इसको भी वे भली-भांति जानते हैं। इससे आगे यह भी कहना ज्यादा मुनासिब होगा कि सुप्रिय की उपलब्धियां जानने केलिए कोई सर्च इन्ज़िन तलाशने की जरूरत नहीं बल्कि फिलवक्त आजतक जो भी है उसमें सुप्रिया की निष्ठां, इमानदारी और कर्मठता है। आजतक का इतिहास सुप्रिय का इतिहास है।

सुप्रिय प्रसाद
सुप्रिय प्रसाद
जनसंचार संसथान की एक घटना याद आती है। दूरदर्शन के वरिष्ठ अधिकारी श्री मुकुल अग्रवाल आये थे– खोजी पत्रकारिता पढ़ाने और अभ्यास करवाने। विषय था "विमान खरीद सौदे में दलाली"– हमें उस दलाली का पर्दाफाश करना था। उस अभ्यास में जो टीम अव्वल रही, उसकी अगुआई सुप्रिय कर रहे थे। सुप्रिय खबरों को जाननेवाला और उसकी एहमियत समझनेवाला इंसान है। इसी वजह से वह हिन्दी टीवी पत्रकारिता का सबसे सफल और सिद्ध संपादक है। वह खबर को जीवन मानता है, जीवन का कोई हिस्सा नहीं। समय के साथ खबरें कैसे अपना रंग बदलतीं हैं, ढंग बदलतीं हैं और अपना तर्ज़ बदलतीं हैं, कोई सुप्रिय से पूछे। उसके लिए खबरों का ट्रीटमेंट पूजा है, इबादत है। इसके बावजूद सुप्रिय की पत्रकारिता से जुडी कई ख्वाहिशें हैं, ढेरों मन्नतें हैं, जिसे वह पूरा करना चाहते हैं। हम मित्रों की दुआ है कि वे तमाम ख्वाहिशें सुप्रिय के कदम चूमे और मन्नतें उसके सिर चूमे। 

अमरेंद्र किशोर के फेसबुक वॉल से. उपरोक्त पोस्ट पर आए कुछ कमेंट यूं हैं…

Ratnessh Srivastwa Supriya ko all the best wishes.
 
Manoj Khandelwal सुप्रिय प्रसाद is a man of down to earth . so sober in nature . I met with him in a brief meeting with lSurendra pratap singh some 20 yrs ago . proud to be an IIMCian .
 
Amrita Maurya Really the quality of Supriya cant be defined in words, he is unparalleled. Like you Amarendra I have so many good memories with him. He is very hard working and dedicated since beginning. Hats off to you Supriya. In the above mentioned task of "Wiman -sauda" where Supriya-team got top place, my team didnt got even penetrate the fencing of Dalals. He had been too enthusiastic and passionate about TV journalism, one day when Raghawachari Sir came into class Supriya complaint him that he had not taught us even the alphabet ' R' of his name, in TV journalism and Sir literally surprised to listen his straight words: this kind of thirst he had for TV journalism. Supriya works 48 hours per-day in 24 hours(that we all have) as i seen. I met him so many times when he used to make the cassette of Aaj Tak Half an Hour Prog for DD2 , it's a long distance he covered in a short spam just because of hard work. And recently I met him in Delhi few months back, just after his promotion, I found him as simple, sober and loving as he was in those days. Supriya we are proud of you and think HIGHLY OF YOU. Keep going on…..
 
Nalin Chauhan He is a asset for Journalism and kohinoor of our batch.
 
Dheeraj Vashistha सौभाग्य से सुप्रिय सर के साथ मुझे भी काम करने का मौका मिला है.. न्यूज़ रुम की शोर के बीच वो बुद्धत्व जैसी शांति लिए नज़र आते हैं… वो जानते हैं कि ठंडे दिमाग के साथ काम को गर्मजोशी से कैसे किया और करवाया जाता है.. वो प्रेरणा के स्तोत्र हैं.. उनके प्रति आदर और प्रेम हैं..
 
Amit Pandey अपने नाम के अनुरूप सुप्रिय है सुप्रिय प्रसाद, अमरेंद्र जी झारखण्ड निर्माण के पहले से पत्रकारिता कर रहे सुप्रिय जी को बिहार के खनिज, पहाड़, उधोग की तरह सिर्फ "झारखण्ड के दुमका" से न बताये, बल्कि बृहद बिहार के दुमका से बताये। ऐसे लोग अपने घर परिवार के साथ प्रदेश के भी गौरव होते है।
 
Ankit Srivastava supriya prasad ko jab bhi television par dekhta hu to lagta hai ki jamin se juda hua koi vyakti hmari baato ko rakh rha hai.
 
Vibha Rani Ankit g maine to kabhi Supriyo Prasad ko tv pr nhi dekha. Inki uplabdhi achhi hai aur lekh bhi umda hai. Lekh jaari rakhe.
 
Vikas Mishra सुप्रिय के साथ नौ महीने का साथ आईआईएमसी में और करीब सात साल का साथ प्रोफेशनल सहयोगी के तौर पर रहा है। सुप्रिय को एक बात असाधारण बनानी है और वो है उनका साधारण होना। सब कुछ नेचुरल है। गुस्सा, प्यार, डांट, फटकार, शाबासी… ये सब बिना सोचे समझे निर्बाध रूप से आता है। दिल में किसी के लिए कुछ बुरा रखते नहीं और ऑफिस पॉलिटिक्स से कोई नाता नहीं है। प्लानिंग बेजोड़ है। सुप्रिय की जैसे शादी ही टीवी पत्रकारिता से हुई है। बेडरूम में भी आधा दर्जन टीवी है, जिस पर हर वक्त न्यूज चैनल चलता रहता है। मोबाइल पर भी आजतक चलता है। सुप्रिय बेजा वक्त खराब करने वाली किसी भी एक्टिविटी से नहीं जुड़े हैं। नाइट पार्टियां, सेमीनार, बौद्धिक जुगाली, कॉलम राइटिंग, सोशल नेटवर्किंग, शराब-सिगरेट- गुटखा, गुटबंदी वगैरह से सदा दूर हैं। दफ्तर में कौन क्या करता है, क्या कर सकता है, ये वो बखूबी जानते हैं और सबकी क्षमता के हिसाब से सबको काम सौंपते हैं। कौन सा विजुअल कब आया, कब चला सब सुप्रिय को याद रहता है। दस साल का रनडाउन का इतिहास लिखत पढ़त में सुप्रिय के पास मौजूद है। बहुत कुछ है जो विलक्षण है। इतना बिजी रहने के बावजूद सुप्रिय को इसका ख्याल रहता है कि फलाना आदमी बेरोजगार है, उसके लिए कुछ करना है। इस पद पर इतनी इंसानियत बचा ले जाना सुप्रिय की सबसे बड़ी सफलता है। सुप्रिय जितने बढ़िया मैनेजिंग एडिटर हैं, उतने ही बढ़िया इंसान भी हैं। हम सभी के लिए सुप्रिय गर्व का विषय हैं।
 
Manoranjan Singh Singh bhut accha bhai j may abhi pakur me hu
 
Vikas Mishra एक वाकया बताता हूं। वी़डियोकॉन टावर में दफ्तर था। रात साढ़े दस का शो था मेरा, सब तैयार तैयार था। सुप्रिय बोले कि निकलोगे, मैंने कहा कोई खास बात। सुप्रिय बोले आज गाड़ी नहीं है मेरे पास, तुम मुझे घर छोड़ते हुए निकल जाना। मैंने सोचा चलो इसी बहाने बहुत दिन बाद सुप्रिय से आधे घंटे-चालीस मिनट इत्मिनान से बात तो होगी। खैर जैसे गाड़ी बढ़ी, सुप्रिय मोबाइल पर आजतक देखने लगे। दस मिनट चला ब्रेक आया। तब पहली आवाज आई- और सब कैसा चल रहा है। यार कुछ नया सोचो, बढ़िया प्रोग्राम लांच करने हैं। खैर ब्रेक खत्म और सुप्रिय मोबाइल पर फिर आजतक देखने में मशगूल। ब्रेक आया तो ऑफिस में फोन करके 11 बजे के बुलेटिन में क्या हेडलाइन लोगे, इसकी पूछताछ। मैंने गुस्से में गाड़ी तेज कर दी। सुप्रिय ने फोन रखा, बोले- बड़ी जल्दी आ गए हम लोग। पूरे रास्ते एक बार भी ठीक से बात नहीं हो पाई। दफ्तर में भी यही होता है। पांच मिनट इत्मिनान से बात करने का मुहूर्त कई बार दो दो महीने बाद निकल पाता है।
 
Vikas Mishra अमरेंद्र, एक चीज करेक्ट कर लो, न कर पाओ तो भी मैं क्लीयर कर दूं कि सुप्रिय के पास आजतक, तेज और दिल्ली आजतक के हेड हैं। हेडलाइंस टुडे के मैनेजिंग एडिटर राहुल कंवल हैं।
 
Amrita Maurya Thanks to share the qualities of Supriya that resides within him till date, what we realised in our student-life.
 
S.a. Asthana कर्मठता के आगे सफलता को झुकना ही पड़ता है विकाश जी ! सुप्रिय को ढेरो शुभ कामनाये !
 
Amarendra Kishore भाई विकास! जानकारी केलिए शुक्रिया।

Alok Kumar लगन का नाम सफलता है। सुप्रिय सफलता की यह चाभी सम्हालकर रखते हैं।

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