सुप्रीम कोर्ट को आइना दिखाने वाली ऐसी किसी खबर की उम्मीद किसी हिंदी अखबार से उम्‍मीद कर सकते हैं?

Shambhu Dayal Vajpayee : टाइम्‍स आफ इंडिया ने कल '' In vacation, SC bench late by an hr '' शीर्षक से चार कालम की एक खबर छापी है जिसमें बताया गया है कि सर्वोच्‍च न्‍यायालय कभी समय की पाबंदी के मामले उच्‍च एवं अधीनस्‍थ न्‍यायालयों का रोल माडल हुआ करता था। जजों के अदालत की कार्यवाही शुरू करने के लिए आने पर वादीगण अपनी घडियों में 10 .30 बजे का समय ठीक किया करते थे। लेकिन अब वकील और वादी बैठे रहते हैं और न्‍यायमूर्ति देर से आते हैं। जजों का कोप भाजन बनने से बचने के लिए खुल कर कोई कुछ नहीं बोलता।

खबर के अनुसार भारत के मुख्‍य न्‍यायाधीश अल्‍तमश कबीर प्राय: रोज एक घंटे देर से कोर्ट आते हैं और उनकी बेंच निर्धरित समय 10.30 बजे शायद ही कभी काम शुरू कर पाती है। न्‍यायमूर्ति ज्ञान सुधा मिश्रा तो अदालत में अपने विलम्‍ब से आने का रिकार्ड ही बनाती लग रही हैं। वह पिछले दो हफ्तों में हर कार्य दिवस में प्राय: एक घंटे देरी से आयीं और तीन दिन पहले तो वह 10;30 के निर्धारित समय के बजाय 12 बजे आयीं।

सुप्रीम कोर्ट को भी आइना दिखाने वाली ऐसी किसी खबर की क्‍या आप किसी हिंदी अखबार से उम्‍मीद कर सकते हैं? हिंदी अखबार बीते 10-12 वर्षों में खूब मालामाल हुए हैं और बडा शक्ति केन्‍द्र तो बन गये हैं , लेकिन वे पत्रकारिता से बहुत दूर हैं। अधिकांश केवल पत्रकारिता की आड में अपने व्‍यावसायिक हितों पर ही ध्‍यान देते हैं । पत्रकारिता की झलक तो अभी भी अंग्रेली अखबारों में ही दिखती है। 'विश्‍व के सर्वाधिक बड़े अखबार' होने का दावा करने प्रमुख हिंदी पत्र को ही लीजिये। गले तक विज्ञापन और खबरों के नाम पर मात्र …………। हिंदी अखबार मालिकों के तेजी से बढे आार्थिक साम्राज्‍य की भी जांच की जानी चाहिए।

वरिष्ठ पत्रकार शंभू दयाल वाजपेयी के फेसबुक वॉल से.

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