Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

आवाजाही, कानाफूसी...

सुब्रत राय अपने स्ट्रिंगरों के दुख से वाकिफ क्यों नहीं हैं?

सुब्रत राय मीडिया हाउस क्यों चला रहे हैं? सहारा के लोगों की बात पर यकीन करें तो सहारा समूह द्वारा किए जाने वाले सभी गोरखधंधों के बचाव के लिए सहारा मीडिया का इस्तेमाल किया जाता है. अब सच क्या है वो तो सुब्रत राय और उनके लोग ही जानें. इसी समूह का एक चैनल है सहारा समय बिहार-झारखण्ड. एक ज़माने में इसकी तूती बोलती थी बिहार और झारखण्ड में. तूती बोलती थी या यूँ कह ले कि ईटीवी बिहार के बाद यही सबसे ज्यादा देखा जाने वाला चैनल था. हालांकि उस समय सिर्फ यही दो रीजनल चैनल ही इस क्षेत्र में सक्रिय थे.

सुब्रत राय मीडिया हाउस क्यों चला रहे हैं? सहारा के लोगों की बात पर यकीन करें तो सहारा समूह द्वारा किए जाने वाले सभी गोरखधंधों के बचाव के लिए सहारा मीडिया का इस्तेमाल किया जाता है. अब सच क्या है वो तो सुब्रत राय और उनके लोग ही जानें. इसी समूह का एक चैनल है सहारा समय बिहार-झारखण्ड. एक ज़माने में इसकी तूती बोलती थी बिहार और झारखण्ड में. तूती बोलती थी या यूँ कह ले कि ईटीवी बिहार के बाद यही सबसे ज्यादा देखा जाने वाला चैनल था. हालांकि उस समय सिर्फ यही दो रीजनल चैनल ही इस क्षेत्र में सक्रिय थे.

वक्त बदला. दूसरे खिलाड़ी भी मैदान में आए और इसी के साथ सहारा समय बिहार-झारखण्ड आ गया अपने औकात पर. अपने स्ट्रिंगरों को कभी समय पर वेतन नहीं देने के लिए कुख्यात सहारा में अब नाम मात्र के ही ढंग के लोग बचे हुए हैं. सहारा बिहार में समानान्तर व्यवस्था चलती है. एक तो हैं उनके ब्यूरो और दूसरे उनके स्ट्रिंगर. पहले ब्यूरो की कहानी सुन लें. सहारा बिहार झारखण्ड के अधिकतर ब्यूरो सहारा के दामाद सरीखे हैं. ऊँची पैरवियों के भरोसे ये सहारा के जिले में कर्ता-धर्ता बने हुए हैं. ऊँची तनख्वाह, मोबाइल बिल, गाड़ी की सुविधा, आरामदेह कार्यालय और करने को कोई काम नहीं.

ज्यादातर ब्यूरो अपनी पत्नी, भाई, साला जैसे अन्य रिश्तेदारों को सहारा में नौकरी दिलाने की जुगत लगाने में परेशान हैं. इन ब्यूरो की आरामनशीं का यह आलम है कि शायद ही आप कभी ब्यूरो को काम करते हुए देखें. अब स्ट्रिंगरों की दुखद कहानी. सहारा में ज्यादातर स्ट्रिंगरों ने या तो नौकरी छोड़ दी या फिर इस दमघोटू व्यवस्था में दूसरे रोजगार की तलाश में जीवित हैं. सहारा के एक कर्मी ने नाम नहीं उजागर करने की शर्त पर इस बात की भी जानकारी दी कि ऐसा नहीं है कि मैनेजमेंट को इस बात की जानकारी नहीं है. वक्त-बेवक्त स्ट्रिंगरों द्वारा अपने ब्यूरो की शोषण गाथा उपरी अधिकारियों तक पहुंचाया जाता है. मगर कुछ 'छिपी' मज़बूरी के कारण सहारा प्रबंधन कुछ कार्रवाई कर पाने में अक्षम है. आखिर कार्रवाई हो भी तो कैसे? कोई सहारा के बड़े अधिकारी कि पैरवी पर आया है तो कोई लखनऊ के सीधे टच में है. कोई उपरवालों को पैसे पहुंचाता है तो कोई शराब व शबाब का ठेकेदार है. आखिर कार्रवाई हो भी तो कैसे और कौन करेगा इन साहबों पर कार्रवाई?

स्ट्रिंगरों के दुःख को सुनकर कोई भी गाली देगा. सहारा में स्ट्रिंगरों का वेतन कभी भी नियमित नहीं रहा. तीन से सात महीने तक उनका वेतन पेंडिंग है और कोई फरियाद तक सुनने वाला नहीं. सहारा की कार्य संस्कृति का एक उदहारण देखिए. स्ट्रिंगरों द्वारा भेजी जाने वाली ख़बरों को कोई देखने वाला तक नहीं है, जबकि जमशेदपुर ब्यूरो द्वारा लिया गया टाटा ग्रुप के एमडी का इंटरव्यू लगातार तीन दिनों से चलता रहता है. स्ट्रिन्गर मन ही मन एक ही सवाल करते हैं कि आखिर चैनल हेड हैं किसलिए? अंत में एक सलाह : मि. सुब्रत राय, सिर्फ क्रिकेट टीम के स्पोंसर बन जाने से नहीं दिखती देशभक्ति. अपने स्ट्रिंगर जिन्हें आप अपना परिवार कहते हैं उनके दुखों को समझें. उनके परिवार और बच्चे आपको आशीर्वाद देंगे. सिर्फ क्रिकेट और पार्टियों से कोई देशभक्त नहीं होता.

लेखक अनंत झा युवा पत्रकार हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...