सुलगती उम्‍मीदें : बारुद के ढेर पर प्रदेश

अखिलेश सरकार के चार महीने पूरा होते-होते कानून व्यवस्था की भारी समस्या खड़ी हो गयी है। दुःख की बात यह है कि प्रदेश के आला अफसरों को आपसी गुटबाजी के चलते फुरसत ही नहीं मिली कि वह कानून व्यवस्था के विषय में कुछ सोचे। वीकएंड टाइम्स ने अपने चौदह जुलाई के अंक में जो खुलासा किया, अगर पुलिस अफसर उस पर गौर कर लेते तो बरेली में हुए भंयकर हादसे को टाला जा सकता था। वीकएंड टाइम्स प्रदेश का इकलौता ऐसा अखबार है जिसने 14 जुलाई को छापा था कि प्रदेश इस समय बारुद के ढेर पर है और यहॉ सांप्रदायिक तनाव की स्थिति पैदा की जा रही है। इस रिपोर्ट के तीन दिन बाद ही बरेली में हुए दंगे ने साबित कर दिया कि वीकएंड टाइम्स की रिपोर्ट सही थी। आप भी पढ़े वीकएंड टाइम्स की यह रिपोर्ट।

चार महीने। दो साम्‍प्रदायिक दंगे। तीन जगह साम्‍प्रदायिक तनाव। पुलिस फायरिंग में तीन मौत। पुलिस हिरासत में चार मौत। एक इंस्पेक्टर, एक सब  इंस्पेक्टर और होमगार्ड की हत्या। पुलिस चौकी में बलात्कार और थाने में बलात्कार का प्रयास। एक दर्जन से अधिक जगहों पर पुलिस अफसरों की पिटाई। हाईकोर्ट पुलिस के रवैये से नाराज। राजधानी में बीते कुछ दिनों में आधा दर्जन थानों का घेराव। यह कुछ घटनायें बानगी है उस महकमे की जिसे सबसे पहले सुधारना मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का लक्ष्य था। मुख्यमंत्री के अरमानों को धत्‍ता बताते हुए प्रदेश में पुलिस महानिदेशक कार्यालय के अफसरों को फुरसत ही नहीं है कि बह आपसी गुटबाजी को भूल कर बिगड़ती हुई कानून व्यवस्था के बारे में सोचें। खुफिया सूत्रों के मुताबिक प्रदेश इस समय बारूद के ढेर पर खड़ा है और मामूली सी चिंगारी भी पूरे प्रदेश में शोला भड़का सकती है। विपक्ष अब बिगड़ती हुई कानून व्यवस्था को लेकर सरकार को घेरने का मन बना रहा है।

अखिलेश यादव की सरकार बनने से पहले और उसके बाद सबसे ज्यादा डर कानून व्यवस्था को लेकर ही था। लोग पिछली सपा सरकार को याद करके भयभीत थे। मगर अखिलेश यादव ने चुनाव से पहले भरोसा दिलाया कि प्रदेश की जनता उन पर भरोसा कर सकती है, और उन पर यकीन करके जिस तरह जनता ने प्रचंड बहुमत अखिलेश को सौंपा वह अखिलेश की जिम्मेदारी को और बढ़ा गया। लोगों को लगने लगा कि जिस तरह अखिलेश ने चुनाव से पहले डीपी यादव को पार्टी में आने से रोका उससे उनके इरादे साफ़ थे। मगर इस बहुमत के साथ अखिलेश यादव पर दूसरों की उम्मीदों का बोझ कुछ ज्यादा ही आ गया। उनकी इच्छा नहीं थी कि राजा भैया को मंत्रिमंडल में लिया जाये। मगर उनके पिता सपा मुखिया मुलायम सिंह इस बहाने यादव, मुस्लिम और ठाकुरों का गठजोड़ बनाने में जुटे थे। लिहाजा यह दागी राजनेता ना सिर्फ अखिलेश मंत्रिमंडल में शामिल हुआ बल्कि कारागार मंत्री बन गया। अखिलेश यादव के शपथ लेने बाले दिन राजा भैया की शपथ और उसी समय मंच पर मचे हंगामे ने भी संकेत दे दिया था कि भविष्य कुछ ज्यादा बेहतर नहीं होने वाला। मगर उसके बाद अखिलेश यादव ने हंगामा कर रहे लोगों को पार्टी से निकाल कर संकेत देने की कोशिश की कि गुंडागर्दी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

इसके बाद बारी थी कि प्रदेश में कानून व्यवस्था बेहतर की जाये। मौजूदा डीजीपी अतुल को हटा कर अम्बरीश शर्मा को डीजीपी बनाया गया। अपर पुलिस महानिदेशक कानून व्यवस्था  के पद पर जगमोहन यादव को तैनात किया गया। मगर दो महीने बीतते बीतते साबित हो गया कि यह फैसला गलत था। यह दोनों अफसर सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के बेहद करीबी थे। लिहाजा इनकी इन महवपूर्ण पदों पर तैनाती स्वाभाविक मानी गई। मगर जब इन दोनों में इस बात को लेकर मुकाबला शुरू हुआ कि सत्‍ता के कौन ज्यादा नजदीक है तो स्थितियां बिगडऩे लगी। यह बात निचले स्तर तक पहुच गई। परिणाम यह हुआ कि डीजीपी कार्यालय की हनक कम होती चली गई। जिलो में लगातार कानून के साथ खिलवाड़ करने की खबर आती रही। पर आला अफसरों को फुरसत ही नहीं थी कि बह आपसे झगडे छोड़ कर इन मामलो को देखें। इसी का नतीजा था कि तबादला सूची में अपर पुलिस महानिदेशक के हस्तक्षेप से नाराज आईजी संदीप सालुके ने एक महीने की छुट्टी पर जाना उचित समझा।

लगातार बिगड़ रही स्थितियों से नाराज मुख्यमंत्री ने प्रमुख सचिव गृह समेत डीजीपी और एडीजीपी को अपने घर बुला कर जबरदस्त डांट लगाई और साफ़ साफ़ कह दिया कि कानून व्यवस्था के मुद्दे पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता। मगर पुलिस महकमे पर इस डांट का भी कोई फर्क नहीं पड़ा। जिले स्तर पर पुलिस तैनाती में कोई भी मापदंड नहीं रखा गया।  केवल निचले स्तर पर ही यह हाल हो ऐसा भी नहीं है। जिलो में पुलिस अधीक्षक तक की तैनाती मानो मजाक बन कर रह गई। हालात इतने बदतर हो गए कि चार महीनों में कुछ जिलों में चार चार पुलिस अधीक्षक बदल दिए गए। इस तरह तबादलों के खेल में उंगली उठाना स्वाभबिक थी। और इसी दौरान यह चर्चा तेज हो गई कि पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश में तीन से पांच लाख रुपए लेकर थानों में तैनाती की जा रही है। जाहिर है जब पुलिस के सबसे बड़े दफ्तर पर इस तरह उंगलिया उठेंगी तो नीचे वालो से तो कोई उम्मीद करना ही बेमानी है।   

नाराज मुख्यमंत्री ने 18 मई को जिला एवं मंडल स्तर के सभी अफसरों की बैठक बुलाई। उन्होंने सभी अफसरों को सख्त शब्दों में समझाया कि अब ढ़िलाई बरदाश्त नहीं की जायेगी। उन्होंने कानून व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए सिर्फ 15 दिन का समय दिया। मगर हालात सुधरने की जगह और बिगड़ गये। मथुरा के कोसी कलां में पुलिस की लापरवाही के चलते साम्प्रदायिक हिंसा भड़क गई और अल्पसंख्यक समुदाय के तीन लोगों की इसमें मौत हो गयी। पुलिस के बड़े अफसरों का ही एक गुट यह प्रचारित करने में जुट गया कि डीजीपी स्वयं मथुरा के हैं इसलिए मथुरा के किसी अफसर की तैनाती उनकी राय के बिना नहीं होती। लिहाजा मथुरा में दंगों का होना खुद डीजीपी के लिए गंभीर बात है। यह मामला खत्म भी नही हुआ था कि प्रतापगढ़ में मामूली विवाद में अल्पसंख्यक समुदाय के सैकड़ों घरों में आग लगा दी गयी। लोगों के गुस्से का अलम यह था कि उत्‍तेजित भीड़ ने डीएम की गाड़ी तक पलट दी।

इन घटनाओं ने सरकार के पसीने छुड़ा दिये। दोनों स्थानों पर ज्यादा नुकसान अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों का हुआ था। इसी समुदाय के एक जुट होकर वोट करने के कारण समाजवादी पार्टी अपने शीर्ष तक पहुंची है। इसके अलावा 2014 के लोक सभा चुनाव में सपा के सारे सपने इसी वोट बैंक पर टिके हैं। मगर इन दोनों घटनाओं ने अल्पसंख्यक समुदाय को बहुत नाराज कर दिया। कोसी में फलों का ठेला लगा रहे राशिद का कहना था कि हम सबको लग रहा था कि हमारी ही सरकार बन गयी है। यहां तो उल्टा ही हो गया। सपा के लिए खतरनाक बात यह भी है कि अल्पसंख्यक समुदाय अब इन मामलों की तुलना पिछली सरकार से करने लगा है। इन घटनाओं के बाद प्रदेश में कई स्थानों पर ऐसी मामूली घटनायें घटी जिसके बाद दोनों समुदायों के लोग आमने सामने आ गए। खुफिया तंत्र ने आगाह किया है कि प्रदेश के कई स्थानों पर साम्‍प्रदायिक उन्माद भड़काने की तैयारी है। स्थानीय निकाय चुनावों में जीत के बाद भाजपा को भी धार्मिक आधार पर खेल करने का इससे बढिय़ा मौका कुछ और नहीं मिल सकता इससे निपटने की जगह प्रदेश के काबिल अफसर किसी और मुद्दे पर ही उलझ रहे हैं।

उधर पुलिस महकमे का एक और आदेश पूरे महकमे का मजाक बनकर रह गया है। बसपा सरकार ने महानगरों में एसएसपी के पद को समाप्त कर वहां डीआईजी को तैनात करने का आदेश कर दिया था जो एसएसपी का कार्य संभालते थे। मगर सपा सरकार ने सत्‍ता में आते ही यह व्यवस्था समाप्त कर दी थी। जिस समय यह व्यवस्था समाप्त की गयी उस समय लखनऊ के डीआईजी आशुतोष पाण्डेय थे। स्वाभाविक था कि इस शासनादेश के बाद यहां भी एसएसपी की तैनाती होती। उन्होंने लखनऊ में ही बने रहने की नायाब तरकीब निकाली। उन्होंने माया सरकार के घोटालों खासतौर से अम्बेडकर पार्क से जुड़े मामलों में एफआईआर दर्ज करवाना शुरू कर दी। वह सरकार को संदेश देना चाहते थे कि अगर वह लखनऊ के कप्तान बने रहेंगे तो माया सरकार के कई घोटालों की एफआईआर दर्ज हो जायेगी। उनकी यह तरकीब काम कर गयी। और शासनादेश को ताक पर रख कर उन्हें ही लखनऊ का एसएसपी बने रहने दिया गया।
आशुतोष पाण्डेय को परेशानी उस समय शुरू हुई जब उनके बैच के लोगों ने पदोन्नति न होने पर नाराजगी जताई। 1992 बैच के कुछ अफसरों ने डीजीपी और प्रमुख सचिव गृह से मुलाकात कर मांग की कि अविलम्ब उनके बैच को प्रोन्नत किया जाये। हालांकि आशुतोष पाण्डेय यह प्रोन्नति नहीं चाहते थे। क्योंकि ऐसा होने पर उन्हें लगता था कि आईजी बनते ही उनके हाथ से लखनऊ चला जायेगा। यह बात सही भी लगती थी क्योंकि लखनऊ में आईजी के पद पर सुभाष चन्द्र तैनात हैं जो मुख्यमंत्री के सचिव अनीता सिंह के पति हैं। उन्हें हटा पाना आशुतोष पाण्डेय की बस की बात नहीं थी। मगर जब यह नाराजगी बढ़ी तो 1992 बैच के अफसरों को आईजी बना दिया गया।

मगर इस पदोन्नति के बाद लगभग दो माह बीतने पर वो हुआ जो इस प्रदेश में कभी नहीं हुआ कि राजधानी लखनऊ में एसएसपी, डीआईजी तथा आईजी के पद पर एक ही व्यक्ति को तैनात रखा गया हो। मगर आशुतोष पाण्डेय के लिए यूपी में मानों नियम कायदे ताक पर रख दिये गये। लखनऊ में अपराधों की बाढ़ आ गयी। राजधानी में सनसनीखेज हत्याकांड हो गये। थानों पर तैनाती इतनी जल्दी होने लगी कि सभी हैरान रह गये। थानों पर तैनाती के सभी नियम ताक पर रख दिये गये। इंस्पेक्टर रैंक के थानों को सब इंस्पेक्टरों से चलवाया जाने लगा। सारे खेल में पैसों की बड़ी भूमिका सबको नजर आने लगी। पुलिस कानून व्यस्वथा के काम छोड़कर जमीनों के धंधे में लग गयी। यह सब राजधानी में हो रहा था। यही कारण रहा कि पुलिस बेलगाम होती चली गयी और माल थाने के एक दरोगा ने थाने में एक महिला को बुलाकर उससे बलात्कार करने की कोशिश की। घटना के दिन आईजी आशुतोष पाण्डेय ने दरोगा को मंदबुद्घि बताकर उसका बचाव करने की कोशिश की। मगर अगले दिन मामला उछल जाने पर दरोगा, थानाध्‍यक्ष और सीओ के विरुद्घ कार्रवाई करनी पड़ी। मगर लखनऊ के एसएसपी का काम संभाल रहे आशुतोष पाण्डेय पर कोई फर्क नहीं पड़ा। हालत की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने खुद डीजीपी को तलब करके उन्हें पुलिस की कार्यशैली पर जमकर फटकारा। एक सप्ताह पहले ही हाईकोर्ट मिर्जापुर के एक मामले में कह चुका था कि यूपी में कानून व्यवस्था को सुधारा जाये। मगर हाई कोर्ट के इस आदेश का असर पुलिस विभाग पर पड़ता नजर नहीं आया।

जब डीजीपी से पूछा गया कि बदायूं में पुलिस चौकी पर बलात्कार होने पर एसएसपी को हटा दिया गया तो लखनऊ के एसएसपी का काम संभाल रहे आशुतोष पाण्डेय पर यह मेहरबानी क्यों। तो उन्होंने गोलमोल जवाब दिया। लखनऊ अकेला चर्चा में न रहे इसलिए कानपुर और मेरठ में भी इस शासनादेश को लागू नहीं किया गया। इन स्थितियों से अपराधों के ग्राफ में तेजी से बढ़ोत्‍तरी होती जा रही है। सामाजिक कार्यकर्ता नूतन ठाकुर का कहना है कि योग्य पुलिस अफसरों की प्रदेश में कोई कमी नही है। मगर राजधानी में एसएसपी भी तैनात न होना वाकई हैरान करने वाला है। भाजपा प्रवक्ता विजय बहादुर का कहना है कि पूरी सरकार कन्‍फ्यूजन में है। सपा कार्यकर्ता ही कानून व्यवस्था को चुनौती दे रहे हैं। मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि उनके खिलाफ साजिश हो रही है तो उन्हें इंटेलीजेंस विभाग से मालूम करके बताना चाहिए कि कौन लोग उनके खिलाफ है साजिश कर रहे हैं।

वरिष्‍ठ पत्रकार वीरेन्द्र भट्ट का कहना है कि यह संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है कि सभी दल अपनी सरकार की उपलब्धि बताते हुए आंकड़े गिनाते हैं कि उनके कार्यकाल में हत्याओं और अपहरण या डकैती जैसे अपराध कम हुए हैं। सारी बात सिर्फ आंकड़ों तक ही सीमित रह जाती है उनका कहना था कि सपा सरकार में कानून व्यवस्था और बसपा सरकार में भ्रष्‍टाचार कोई मुद्दा नहीं है। जाहिर है यह हालात उस मुख्यमंत्री के लिए खतरे की घंटी है जो कानून व्यवस्था को सुधारने का दावा करके सत्‍ता में आये थे और अगर यही हाल रहा तो लक्ष्य 2014 सपा के लिए बहुत दूर का सपना रह जायेगा।

लेखक संजय शर्मा लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. हिंदी वीकली न्यूजपेपर वीकएंड टाइम्स के संपादक हैं. यह लेख उनके अखबार में प्रकाशित हो चुका है.

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