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सुख-दुख...

सेटिंग-गेटिंग-फिटिंग-एडजस्टिंग…

तरह-तरह के सेटिंग-गेटिंग के खेल के लिए मशहूर महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में एक बार फिर एक प्राध्यापक महोदय आंख बंद-डिब्बा गायब का जुगाड़ सेट कर रहे हैं. प्राध्यापक महोदय, नाट्य विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं. दो साल पहले संगीत नाटक अकादमी, दिल्ली से डिपुटेशन पर आये थे. अकादमी में प्रोग्राम अधिकारी थे, वर्धा के परिसर में आये तो सीधे एसोसिएट प्रोफेसर बन गये थे. जब वे अचानक आकर इस पद पर विराजमान हुए थे तब भी अंदरखाने में कानाफूसी हुई थी कि नाट्य कला विभाग में जब यह पद ही सृजित नहीं हुआ था, उससे संबंधित कोई विज्ञापन ही नहीं निकला था तो फिर कहां से आकर विराजमान हो गये थे.

तरह-तरह के सेटिंग-गेटिंग के खेल के लिए मशहूर महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में एक बार फिर एक प्राध्यापक महोदय आंख बंद-डिब्बा गायब का जुगाड़ सेट कर रहे हैं. प्राध्यापक महोदय, नाट्य विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं. दो साल पहले संगीत नाटक अकादमी, दिल्ली से डिपुटेशन पर आये थे. अकादमी में प्रोग्राम अधिकारी थे, वर्धा के परिसर में आये तो सीधे एसोसिएट प्रोफेसर बन गये थे. जब वे अचानक आकर इस पद पर विराजमान हुए थे तब भी अंदरखाने में कानाफूसी हुई थी कि नाट्य कला विभाग में जब यह पद ही सृजित नहीं हुआ था, उससे संबंधित कोई विज्ञापन ही नहीं निकला था तो फिर कहां से आकर विराजमान हो गये थे.

खैर! यह बात दबी जुबान में ही होती रही थी और कानाफूसी में ही यह बात दम भी तोड़ दी थी तब.  क्योंकि प्राध्यापक महोदय उत्तर प्रदेश के एक बडे यादव नेता, से स्वजातीय आधार पर गहरे रिश्ते रखते हुए हाईलेवल जुगाड़ से वर्धा में पहुंचे थे और तत्कालीन कुलपति दारोगाजी भी उत्तरप्रदेश के उन नेता के प्रति साफ्ट कार्नर रखते थे, सो किसी के चिल्लाने से भी कुछ नहीं बिगड़नेवाला था. प्राध्यापक महोदय ने भी तुरंत कुलपति महोदय का ऋण उतार दिया था. प्राध्यापक महोदय ने हिमालय हेरिटेज रिसर्च एंड डेवलपमेंट सोसाइटी के सौजन्य से आठ अगस्त 2013 को हिमालय साहित्य सृजन सम्मान दिलवा दिया. खूबसूरत सिक्किम राज्य की राजधानी गंगटोक में. बताया जाता है कि जो उपरोक्त सोसाइटी है, उसके संचालन में प्राध्यापक महोदय की ही अहम भूमिका है. पटना से पीएचडी किये, मधेपुरा में पढ़ाये लिखाये, दिल्ली में प्रोग्राम अधिकारी रहे, दो सालों से वर्धा में हैं लेकिन संस्थागत तौर पर गहरा प्रेम सिक्किम से भीरखते हैं. तत्कालीन कुलपति महोदय गदगद भाव से हिमालय साहित्य सृजन सम्मान लेने पहुंचे थे सिक्किम. उसके बाद एक रेणु सम्मान भी बिहार से लेते आये थे.

अब इस बार की कहानी यह है कि प्राध्यापक महोदय का डेपुटेशन पीरियड इस साल पांच अप्रैल को खत्म हो चुका है. उन्हें वर्धा विश्वविद्यालय परिसर से मोहब्बत हो गयी है. वे इसे छोड़कर जाना नहीं चाहते. वहीं जमे हुए हैं. वर्धा का दरबार उन्हें छोड़ना ना पड़े, इसके लिए फिर से एक बार वे जुगाड़ लगा रहे हैं. सूचना है कि वे विश्ववविद्यालय में नये-नये आये कुलपति गिरिश्वर मिश्र पर डोरे डालने में दिन-रात उर्जा लगा रहे हैं और उसमें उन्हें तेजी से सफलता भी मिलती हुई दिख रही है. पहलेवाले कुलपति साहित्य के थे, सो प्राध्यापक महोदय ने उन्हें साहित्य सृजन सम्मान देने के लिए गंगटोक की वादियों में बुला लिया था. अभी जो कुलपति हैं, उनका वास्ता साहित्य की बजाय मनोविज्ञान से है, इसलिए इस बार उन्हें विशेष तौर पर भूटानबुलाने के लिए प्राध्यापक महोदय पिछली बार की तरह अंतरराष्ट्रीय हिमालय दिवस का इंतजार नहीं कर रहे हैं. यानि अगस्त आने तक का इंतजार नहीं कर रहे.

वे नये कुलपति को जल्दी से जल्दी सोसाइटी के सौजन्य से बुलाकर वहां उन्हें विशेष सम्मान दे देना चाहते हैं ताकि किसी तरह डेपुटेशन का एक्सटेंशन बढ़ जाए. अब इसके लिए सोसाइटी की ओर से एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन हो रहा है. लोक संस्कृति पर अंतरराष्ट्रीय सेमिनार की योजना है लेकिन मुख्य अतिथि के तौर पर मनोविज्ञानी कुलपति को आमंत्रित किया गया है. सूचना के अनुसार कुलपति महोदय जाने को तैयार हैं. सूचना के अनुसार कुलपति महोदय को सिर्फ मुख्य या विशिष्ट अतिथि के तौर पर बुलाकर इतना ही सम्मान देने की योजना भर नहीं है बल्कि वहां पहुंचने के बाद सरप्राइज के तौर पर किसी खास सम्मान से सम्मानित करने की योजना भी बना चुके हैं प्राध्यापक महोदय. अभी बताया नहीं जा रहा, क्योंकि अभी बताने से दाल में काला जैसा शोर हो सकता है लेकिन विश्वविद्यालय परिसर में यह बात फिर कानाफूसी के तौर पर तैरने लगी है कि प्राध्यापक महोदय ने सेटिंग-गेटिंग कर दी है, अब एक्सेटेंशन के टेंशन से भी उन्हें मुक्ति मिल जाएगी. क्योंकि नये कुलपति वहां जायेंगे, सम्मान पायेंगे और जब तक लौटेंगे तब तक प्राध्यापक महोदय इस विशेष आयोजन, विशेष मान-सम्मान के बदले फाइल लेकर खड़े रहेंगे. विश्वविद्यालय के एक बड़े खेमे का मानना है कि नये मनोविज्ञानी कुलपति प्राध्यापक महोदय के जाल में नहीं फंसेंगे. प्राध्यापक महोदय मंद-मंद मुस्कान के साथ कहते फिर रहे हैं कि जायेंगे क्यों नहीं. नार्थ-ईस्ट की बात है. अंतरराष्ट्रीय सेमिनार की बात है. विशेष मान-सम्मान की बात है.

भड़ास को मिले एक पत्र पर आधारित.

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