सेना और शराब वाली पीआईएल पर मुझे कइयों ने बुरा-भला कहा

शराब में कोई खास बात तो शायद होती ही है. यूँ ही उसे अंगूर की बेटी नहीं कहते और यूँ ही उस पर तमाम शेर-ओ-शायरी नहीं लिखी गयी है. चूँकि मैंने आत्म-प्रतिबन्ध लगा कर स्वयं को इसका आनंद लेने से महरूम कर दिया, अतः मैं इस महान पेय से जुडी अनंत भावनाओं की गहराईयों को शायद नहीं समझ सकता. यही कारण है कि मैं इस बात का पूर्वानुमान नहीं लगा सका था कि सैन्य बलों और अर्ध-सैनिक बलों में सस्ती शराब के खिलाफ दायर की जाने वाली मेरी पीआईएल के बाद मेरा क्या हश्र होने वाला है.

मैं यह बात खुल कर कह सकता हूँ कि मेरे किसी नए पीआईएल अथवा मेरे किसी नए कारनामे अथवा प्रयास के बारे में मेरे द्वारा दी गयी सूचना की ज्यादातर लोग नोटिस नहीं लेते हैं, क्योंकि संभवतः वे जानते हैं कि यह आदती किस्म का आदमी है और कुछ ना कुछ नया खुराफात करता ही रहेगा, कहाँ तक इसकी कही बातों और इसके लिए कारनामों पर ध्यान दिया जाए. अतः जब मैंने कई सारे कारण बताते और गिनाते हुए सैन्य बलों और अर्ध-सैनिक बलों में अनावश्यक जगहों पर सस्ती शराब पर रोक लगाने की मांग करते हुए यह जनहित याचिका दायर की थी तो मुझे यही लग रहा था कि इस बार फिर मेरे इस पीआईएल पर कोई ध्यान नहीं देगा.

लेकिन नहीं. इस बार तो मैं पूरी तरह गलत साबित हुआ. जिस समय से मैंने फेसबुक और विभिन्न याहू ग्रुप्स पर इस याचिका की सूचना प्रसारित की तब से मुझे लगातार कोई ना कोई फोन और कोई ना कोई मेल मिलते ही जा रहे हैं. ऐसे भी कई लोग हैं जिन्होंने मेरे इस कदम की सराहना की है. बैंगलोर से एक अवकाशप्राप्त आर्मी अफसर ने फोन करके मेरे इस कार्य की भूरी-भूरी प्रशंसा की. एक अवकाशप्राप्त सिविलियन ने भी फोन से बधाई दिया और इस पीआईएल में हर प्रकार के सहायता देने की बात कही.

लेकिन सच यही है कि अच्छी संख्या में टिप्पणियाँ कठोर किस्म की थीं. किन्ही श्री विजय के नायर साहब ने लिखा- “तुम अपना पिछवाड़ा एक खुले वाहन पर रख कर एक महीने तक जाड़ों के दिनों में लद्दाख क्यों नहीं जाते हो?” श्री जोस मनावालन ने कहा-“ मैं समझ नहीं पा रहा कि तुम तो यूपी कैडर में आईपीएस में काम करते हो, कभी भो बोर्डर के आस-पास कहीं गए भी हो, या तुमने अपने बेटे या बेटी को सैन्य बलों को दिया है या तुमने अपनी सेवा में कभी किसी सेना के अधिकारी को, जो तुम्हारे पास मदद के लिए आया हो, उसकी कोई मदद भी की है”.

कर्नल प्रेम के नायर ने कहा- “मेरी पहली सोच यह है कि तुम दोनों मूर्खों का एक समूह हो जिसने कभी ना तो यूनीफोर्म पहना है और ना ही कभी गोलियों का सामना किया है. तुम इडियट, ड्यूटी पर जवानों को पीने नहीं दिया जाता. तुम्हारी तरह के बेवकूफ जो कभी गाँव से बाहर नहीं निकले, इस समाज के लिए अभिशाप हैं. तुम दोनों काफी खाए-पिए लोग दिखते हो जिन्हें निश्चित रूप से समाज सेवा के नाम पर कहीं और से पैसा मिल रहा है.”  आईआईटी कानपुर के मेरे मित्र श्री सुनील महाजन ने कहा- “मुझे इस बात पर शर्म आती है कि ये मेरे कॉलेजमेट हैं.” एक वरिष्ठ नौकरशाह श्री विकास कुमार क्षुब्ध स्वर में कहते हैं- “ कैसे कुछ लोग इस प्रकार का बेवकूफी भरा काम करने के लिए समय निकाल लेते हैं.”  

इसके विपरीत तथ्य यही है कि मैं जो भी करता हूँ वह सोच विचार कर ही करता हूँ. मैं कोई काम पूरे होशो-हवास में सारे तथ्यों का वालोकन और मामले में चिंतन के बाद ही किया करता हूँ. यह सही है कि प्रत्येक व्यक्ति को मुझसे अलग विचार रखने का हक है पर यह हक व्यक्तिगत टिप्पणियाँ करने तक नहीं जाता. लेकिन शायद शराब में कुछ ऐसी बात है कि वह अच्छे-खासे लोगों को भी थोड़ा मतवाला बना देती है और मुझे यह बात अपने मन में अवश्य रखनी चाहिए कि वह मैं नहीं, जिसके खिलाफ उनके उदगार फूट रहे हैं, यह तो अंगूर की बेटी का मामला है. इसमें थोड़ा बहुत भटकना और बहकना तो लाजिमी है.

लेखक अमिताभ ठाकुर यूपी कैडर के आईपीएस अधिकारी हैं. अमिताभ जनपक्षधर अधिकारी हैं, इसलिए वे समय-समय पर विभिन्न मुद्दों, मसलों पर सरकार, समाज, कोर्ट को झकझोरने के लिए सक्रियता दिखाते रहते  हैं. वे अपनी बेबाकबयानी के लिए भी चर्चित हैं.


मूल खबर..

छोटे सैन्य अफसरों को चार और बड़ों को चौदह बोतल दारू क्यों? सेना में सस्ती शराब के खिलाफ पीआईएल

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