सोर्स की पत्रकारिता में क्या भूमिका होती है, मैंने रमेश जी से सीखा

सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी : वर्ष 2007 की सर्दियों की एक रात थी। मुझे पता चला कि राजस्‍थान पत्रिका के बैंगलोर संस्‍करण के प्रभारी रमेशजी बीकानेर आए हुए हैं। रात की बारह बजे तक की ड्यूटी पूरी कर मैं सीधा भट्टड़ों के चौक स्थित ज्‍योतिषी मामू के ठिकाने पर पहुंचा। जैसा कि उम्‍मीद थी, रमेशजी वहां मिल गए। पूरी रात वहीं उनका डेरा रहता था। प्रणाम के बाद बातचीत ऐसे शुरू हुई जैसे हम दोनों एक दूसरे को सालों से जानते हों।

 

पहले पांच-सात मिनट उन्‍होंने मेरा जमकर टैस्‍ट लिया। पता नहीं मैं पास हुआ या उन्‍हें दया आ गई, बातचीत ने सामान्‍य रूप ले लिया। पाटे और उसके आस पास बीसीयों लोगों का जमावड़ा था। कुछ मामू भाईजी से मिलने आए हुए थे, कुछ रमेशजी से।

मैं भाग्‍यशाली रहा, रमेशजी, मेरे साथ ऐसे मशगूल हुए कि हम दोनों ही पाटे से उठकर पाने खाने चल दिए। रास्‍ते में बातचीत में मैंने उनके पुराने और मेरे नए "सोर्सेज" के बारे में बताया कि वे लोग अब भी आप लोगों को याद करते रहते हैं। चलते हुए बीच सड़क पर रमेशजी रुक गए और कुछ क्षणों के लिए उनके चेहरे पर छाया रहने वाला अल्‍हड़पन नदारद हो गए। पूरी गंभीरता से उन्‍होंने कहा… "जोशी ये हमारे कमाए हुए लोग हैं। इन्‍हें खोना मत"

एक सोर्स की पत्रकारिता में क्‍या भूमिका होती है, एक रिपोर्टर ही जान सकता है। हालांकि मैं गंभीर था, लेकिन उन सोर्सेज को बनाने में मैंने खास मशक्‍कत नहीं की थी, सो उतना गंभीर नहीं था। रमेशजी की उस रात की मुलाकात के बाद मैंने उन लोगों पर अधिक ध्‍यान देना शुरू किया। बाद में हालात ये हुए कि सोर्सेज अनौपचारिक बातचीत में रमेशजी, राजेन्‍द्र सिंह नरूका, बजरंगजी आदि के बारे में बताते हुए भावुक तक हो जाते।

कहने की जरूरत नहीं है कि मेरे या कहें मेरे वरिष्‍ठजनों के कमाए उन संपर्कों ने कई बार अपनी नौकरी तो कई बार अपने मूल काम को किनारे तक किया और सूचनाएं मुझ तक पहुंचाई। जब भी ऐसी कोई सूचना मिलती तो सोचता कि मैंने क्‍या दिया है जो इतना मिल रहा है, फिर रमेशजी की बात याद आ जाती।

"हमने इन्‍हें कमाया है जोशी…"

आज फिर रमेशजी याद आए..

पत्रकार सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी के फेसबुक वॉल से.

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