सड़ता गेहूं और अखिलेश सरकार के सौ दिन!

प्रदेश के सबसे युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की सरकार के सौ दिन पूरे हो गये। शपथ लेने के बाद अखिलेश की सादगी और काम करने की लगन देखकर लगता था कि सौ दिन के बाद इस नौजवान को शाबाशी देने जैसी कई चीजें हम लोगों के पास होंगी। मगर सौ दिन पूरा होने पर एक बड़ी खबर और कई फोटो अखबार में दिखाई दी कि प्रदेश में हजारों कुंतल गेहूं पहली बरसात में ही सड़ गया क्योंकि कुछ नाकारा अफसर इस गेंहू को गोदामों में रखने की व्यवस्था नहीं कर पाये। यह खबर बेहद सदमा देने वाली है, साथ ही यह एहसास कराने वाली भी कि सिंहासन पर बैठने वाले लोग ही बदलते है व्यवस्थायें नहीं बदलतीं। अभी भी हालात ज्यों के त्यों हैं। गरीब को अनाज नहीं और तंत्र चलाने वालों के पास अनाज को रखने की जगह नहीं।

समझ नहीं आता कि यह व्यवस्थायें कब सुधरेंगी। हर साल जब गेहूं खरीद शुरू होती है तो लगता है मानो प्रदेश में हाहाकार मच गया। किसान अपना गेहूं लेकर मंडी जाता है। वहां उसका गेहूं तो नहीं बिकता मगर उसका साबका दलालों से जरूर पड़ जाता है। यह दलाल किसी भी कीमत पर किसान को उसकी फसल के वाजिब मूल्य नहीं मिलने देते। मंडी में दलालों की पूरी फौज रहती है और किसान बेसहारा अपनी फसलों के लिए इधर से उधर घूमता रहता है।  हर साल खबर आती है कि फसल रखने के लिए बोरों की कमी पड़ रही है। बोरों की खरीद में हर साल लाखों करोड़ों रुपये का कमीशन खाया जाता है। मगर बोरों की कमी हमेशा बनी रहती है। इन बोरों की कमी के कारण अफसर अपने आप को असहाय बता देते हैं और मुंह लटकाकर किसान से कह देते हैं चूंकि बोरे नहीं हैं किसानों का गेहूं नही रखा जा सकता। मगर वहीं खड़े दलालों के पास बोरे भी होते हैं और इन दलालों के खरीदे गये गेंहू को रखने के लिए अफसरों के पास जगह भी।

जब एक दिन अचानक मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपने कुछ साथियों के साथ उन्नाव गेहूं खरीद केन्द्र का दौरा करने पहुंच गए तो हकीकत उनके सामने आ गयी। वहां पर सिर्फ दलाल राज ही चल रहा था और किसान बेहाल थे। यहीं नही वहां लगे गेहूं तौलने के कांटे पर जब मुख्यमंत्री चढ़ गए तो उस कांटे में उनका वजन ही बीस किलो बताया। जाहिर है सत्‍तर किलो से ज्यादा वजन के मुख्यमंत्री को बीस किलो बताने वाली मशीन किसान का गेहूं भी इसी अनुपात में तौलती होगी। होना तो यह चाहिए था कि इस घटना के बाद इस व्यवस्था के दोषी सबसे बड़े अफसरों को कड़े से कड़ा दण्ड दिया जाना चाहिए था। मगर मात्र कुछ छोटे कर्मचारियों को ही निलंबित करके खानापूर्ति कर ली गयी। अफसर शाही का आलम इससे समझा जा सकता है कि जब मुख्यमंत्री ने वहां की डीएम से पूछा कि उन्होंने जिस किसी ऐसे गेहूं खरीद केन्द्र का दौरा किया हो जहां व्यवस्थायें सुचारु रूप से चल रही हों तो उसका नाम बता दें। जिससे वह उस केन्‍द्र का निरीक्षण कर सकें। मगर जिलाधिकारी को ऐसे किसी भी केन्द्र का नाम नहीं पता था। जाहिर था कि जिले में ऐसा कोई केन्द्र नहीं था जहां व्यवस्थायें सुचारू रूप से चल रही हों। तमतमाये मुख्यमंत्री ने डीएम को तत्काल हटाने के निर्देश दे दिये और यूपी के नाकारा नियुक्ति विभाग ने नये डीएम को तैनात करने में हफ्तों लगा दिये।

इस बीच मानसून की पहली बरसात प्रदेश में हो गयी। जिस बात का डर था वही सबित हो गयी। हजारों कुन्तल गेंहू भीगने के कारण सड़ गया। और यह तय है कि जब मानसून पूरी तरह आ जायेगा तो लाखों कुन्तल गेहूं इसी तरह सड़ जायेगा। सवाल इस बात का है कि क्या किसी भी रूप में यह व्यवस्था नहीं की जा सकती थी कि प्रदेश में अनाज की इस तरह दुर्गति न की जाये। हम लोग क्या अनाज के रखने के लिए गोदाम नहीं बना सकते। क्या हम हर साल इसी तरह अपना अनाज सडऩे के लिए छोड़ सकते हैं। इस अव्यवस्था के अलावा कुछ और मूलभूत बातें हैं जिस पर ध्‍यान देना ही चाहिए। अभी भी बुंदेलखंड और पूर्वांचल के हजारों परिवार ऐसे हैं जिनके पास दो वक्त खाने के लिए अनाज नहीं है। कई परिवार भुखमरी के कारण आत्महत्या कर चुके हैं। क्या इन गरीबों की मौत किसी पर कोई असर नही डालती। क्या प्रदेश के मुखिया का यह कर्तव्य नहीं है कि जो अनाज सड़ रहा हो वह गरीबों तक बंट जाये। जो राजनीति में घाघ हो गए हैं और जिनकी संवेदनायें खत्म हो गयी हैं उनकी बात करना बेमानी है। मगर अखिलेश तो अभी युवा हैं। अपनी कार्यशैली से भी वह सादगी से भरे लगते हैं। तो क्या माना जाय कि भ्रष्ट नौकरशाहों ने उन्हें भी अपने चंगुल में फंसा लिया, जिससे उन्हें प्रदेश की यह भयंकर स्थिति दिखाई नहीं पड़ रही। या फिर यह अफसर केन्द्र की तरह यहां भी कोई लंबा खेल खेल रहे हैं।

केन्द्र सरकार ने भी इसी तरह लाखों कुन्तल गेहूं सडऩे दिया और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद भी उसे गरीबों में नही बंटवाया। बाद में पता चला कि सड़े हुए गेहूं को शराब के व्यापारियों ने ले लिया क्योंकि इस गेहूं से बढिय़ा शराब बन जाती है। तो फिर क्या माना जाये कि सौ दिन में यहां भी शराब के व्यापारी इतने ताकतवर हो गये कि अखिलेश जैसे मुख्यमंत्री को भी उन्होंने इतने प्रभाव में ले लिया कि खुले में गेहूं सड़ता रहे मगर मुख्यमंत्री अपनी जुबां भी न खोलें। गरीबों की आह से बड़ी कोई और आह नही होती। जब सरकारें गरीबों के हितों से विमुख हो जाती हैं तो इतिहास गवाह है कि तख्ता पलट हो ही जाता है। अच्छा हो कि

संजय शर्मा
अखिलेश यादव एक कड़ा बयान जारी करें कि जिस जिले में गेंहू रखने की जगह न होने के कारण अगर सड़ा तो वहां के कलेक्टर को चौबीस घंटे के अन्दर निलंबित कर दिया जायेगा। और यह सिर्फ चेतावनी ही न हो बल्कि ऐसा दो चार जिलों में करके भी दिखा दिया जाये तो यह तय है कि प्रदेश में एक किलो गेहूं भी कहीं सड़ नहीं सकता। मगर इन सबको करने के लिए भ्रष्ट अफसरों से दूर रहना बेहद अनिवार्य है। और अपनी सरकार के सौ दिन पूरा करने पर अखिलेश यादव को यह तो समझ में आ ही जाना चाहिए कि नौकरशाहों ने ही मायावती को डुबोया था और अखिलेश सरकार के नौकरशाह भी कम गुल नहीं खिला रहे।

लेखक संजय शर्मा लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. हिंदी वीकली न्यूजपेपर वीकएंड टाइम्स के संपादक हैं.

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