हंस संपादक किसलिए वैसी कहानियां छापते थे?

Ganesh Pandey : हंस संपादक के बारे में एक युवा लेखिका के प्रसंग में हमारे समय के युवा लेखकों ने सच कहा है। इसके लिए वे बधाई के पात्र हैं। हालाँकि उक्त युवा लेखिका के लेखन से मैं तनिक भी परिचित नहीं हूँ, पर जिन युवा लेखकों ने हंस संपादक का विरोध किया है, उन्हें थोड़ा-बहुत जितना भी पढ़ा है, पसंद करता हूँ। साहित्य के सत्ता केंद्रों का विरोध न करने पर ,कभी-कभी नाराज भी होता रहा हूँ, लेकिन अब पता नहीं क्यों युवा लेखकों के प्रति कुछ अधिक ही प्रेम उमड़ रहा है।

प्रेम का कारण क्या यह है कि वे भी मेरी तरह लंबे समय से हंस नहीं पढ़ते हैं या कुछ और? कोई बीस-पच्चीस साल हुए हंस नहीं पढ़ा। कभी छपने की लालसा भी नहीं हुई। हो सकता है कि यह भी कारण रहा हो कि शुरू से ही कविता के मामले में हंस को कभी गंभीरता से लिया ही नहीं। कहानियाँ भी पसंद नहीं थीं। स्त्री और दलित संबंधी विचारों से विरोध नहीं था, पर साहित्य में आंदोलन के केंद्र में रचनाएँ और ताकतवर लेखन की संभावनाएँ होती हैं। जब कविता में बिहारी जैसे तनिक बड़े कवि को पसंद नहीं करता था तो भला हंस को पढ़ना मेरे लिए संभव कैसे होता।

बिहारी तो अशर्फियों के लिए स्त्रीदेह का चित्रण करते थे, हंस संपादक किसलिए वैसी कहानियाँ छापते थे और उसे किस तरह और क्यों लोग लिखते थे, यह कहने से अब कोई फायदा नहीं। साहित्य का परिवेश जितना धूमिल होना था, हो चुका है। ऐसी पत्रिकाओं से उभर कर आये लोग उसके बारे में क्या सोचते हैं, उससे भी अब कोई फर्क नहीं पड़ता है।

फर्क पड़ता है तो इस बात से कि अब आज का युवा लेखक निर्भय होकर कहता है कि मैं अमुक पत्रिका को नहीं पढ़ता हूँ। जब युवा लेखक ऐसा कह रहा होता है तो एक प्रकार से वह साहित्य की एक सत्ता को चुनौती दे रहा होता है। इस चनौती से चाहे साहित्य का व्यभिचार तुरत बंद न हो जाता हो, लेकिन सत्ता केंद्रों से निडरता का एक नया युग तो शुरू होता है। बुद्ध ने कभी कहा था कि किसी भी ग्रंथ को स्वतः प्रमाण मत मानो, अन्यथा बुद्धि की प्रमाणिकता जाती रहेगी।

कोई संपादक, कोई पत्रिका, कोई आलोचक प्रमाण नहीं है, प्रमाण तो अंततः रचना ही है। जो फर्क का अगला कदम आज दिख रहा है वह सिर्फ हंस संपादक तक ही नहीं है, वर्धा को लेकर भी है। जब युवा कंठ से विभूतियों का विरोध होने लगे तो समझो कि युवा लेखक बड़े हुए। इस निडरता का स्वागत है।

बस जरूरी है कि कथा के केंद्रों के साथ कविता के भ्रष्ट केंद्रों का भी विरोध हो। युवा कवियों में बेचैनी तो दिख रही है, बस अपनी कविता को लेकर यह भरोसा मजबूत हो जाये कि केंद्रों जाओ नहीं चाहिए तुमसे कोई सनद-वनद, आओ और अपनी कविता को इससे मिला कर देख लो। यहाँ कहना जरूरी है कि सबकी सभी कविताएँ अच्छी नहीं होती हैं, हमारे समय के कई महान कवियों के पास भी अविस्मरणीय कविताओं का अकूत खजाना नहीं है। बहरहाल यह दूसरी बात है। खुशी तो सिर्फ यह कि युवा दोस्तों में चिंगारी है। आग है।

गणेश पांडेय के फेसबुक वॉल से.


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