हमारा प्रॉब्‍लम ये है कि हम ऑटो वाले, बस वाले, रिक्‍शे वाले, गार्ड, प्‍यून, ड्राइवर वगैरह को इंसान ही नहीं समझते

Manisha Pandey : बाहर की दुनिया में अकेले मूव करने और सर्वाइव करने का कोई एक फिक्‍स फॉर्मूला नहीं है। लेकिन जो चीज अब तक मेरे फेवर में काम करती रही है, वो है ऑटो वाले, बस वाले, रिक्‍शे वाले, गार्ड, प्‍यून, ड्राइवर सब लोगों के साथ एक दोस्‍ताना व्‍यवहार और बातचीत।

मैं अकसर ऑफिस के काम से 300-400 किलोमीटर दूर आसपास के शहरों में टैक्‍सी से जाती रहती हूं। कई बार तो ऐसा भी हुआ कि फोटोग्राफर भी साथ में नहीं है और मैं बिलकुल अकेली हूं। ड्राइवर निपट अंजान। लेकिन हर बार मैंने ड्राइवर से दोस्‍ती कर ली। उससे दुनिया भर की बातें।

– घर में कौन-कौन है,

– तुमने कहां तक पढ़ाई की है, आगे क्‍यों नहीं पढ़े

– तुम्‍हारी शादी हो गई है

– अच्‍छा, बिटिया अभी छोटी है, लेकिन उसे खूब पढ़ाना। 18 साल की उमर में शादी मत कर देना।

– लड़कियों को खूब पढ़ना और आगे बढ़ना चाहिए।

– बहनों को भी पढ़ने का मौका मिलना चाहिए। वगैरह-वगैरह।

मैं उन्‍हें ये भी बताती हूं कि मैं क्‍या स्‍टोरी करने जा रही हूं और क्‍यों। कई बार तो उन लोगों से इतनी दोस्‍ती हो जाती है कि वो स्‍टोरी में भी इंटरेस्‍ट लेने लगते हैं। अपने विचार भी शेयर करते हैं। मुझे उस ड्राइवर से कभी खतरा नहीं हो सकता क्‍योंकि हमारे बीच एक फ्रेंडली कनेक्‍शन बन गया है। कई बार वह इस बात की भी चिंता करेगा और प्रोटेक्टिव होगा कि वॉशरूम जाने के लिए किसी सही और सुरक्षित जगह पर गाड़ी रोकी जाए।

एक बार भरतपुर से लौटते हुए तो जिस ड्राइवर से दोस्‍ती हुई थी, उसने मेरा नंबर लिया और बोला कि बिटिया को कौन से स्‍कूल में डालूं, क्‍या पढ़ाऊं, आप बताइएगा।
वो भी लड़कियों के पिता है और उन्‍हें अच्‍छा लगता है कम से कम ये सोचकर कि मेरी बिटिया भी पढ़-लिखकर साहब बनेगी।

हमारा प्रॉब्‍लम ये है कि हम ऑटो वाले, बस वाले, रिक्‍शे वाले, गार्ड, प्‍यून, ड्राइवर वगैरह को इंसान ही नहीं समझते। उनसे बात करना हमारी हेठी है। अकसर कई एलीट लड़कियां मुझे ऐसे सजेशन देती हैं कि ये लोग गंदे होते हैं, इनसे बात नहीं करनी चाहिए। जबकि सच इसके ठीक उलट है। वो लोग बहुत अच्‍छे होते हैं। उनके भी सपने हैं। वो भी अपने बच्‍चों को, अपनी बेटियों को पढ़ाना चाहते हैं। उन्‍हें अच्‍छा लगता है कि कोई उनके सपनों को समझ रहा है, उनसे बात कर रहा है। उनसे बराबरी का व्‍यवहार कर रहा है। उनको ऑर्डर नहीं लगा रहा- "गाड़ी से मेरा सामान उतारो, होटल के कमरे में पहुंचाओ।"
बिलकुल नहीं। मैं अपना सामान खुद उतारूंगी। तुम नौकर नहीं हो मेरे।

लड़कियों, वो इतने खतरनाक और डरावने लोग नहीं हैं। उनसे दोस्‍ती करो, बात करो। उनकी बेटियों के बारे में बात करो, उनके बहनों के बारे में। उन्‍हें भी अच्‍छा लगता है। ट्रस्‍ट मी, अकेले होने पर भी वो तुम्‍हारा ख्‍याल रखेंगे।

इंडिया टुडे हिंदी में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार मनीषा पांडेय के फेसबुक वॉल से.

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