हमारी मय्यत पर तुम जो आना तो चार आंसू बहा के जाना… (सुनें)

चंदन दास द्वारा गाई गईं दो खूबसूरत ग़ज़लें… कुछ तबीयत ही मिली थी ऐसी… (निदा फाजली) और सितम ही करना, जफा ही करना… (दाग देहलवी) नीचे एक ही एमपी थ्री में अपलोड है. 

 

चंदन दास की आवाज में निदा फाजली और दाग की दो रचनाएं…

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कुछ तबीयत ही मिली थी ऐसा
चैन से जीने की सूरत ना हुई
जिसको चाहा उसे अपना ना सके
जो मिला उससे मोहब्बत ना हुई…

जिसे जब तक मिले दिल ही से मिले
दिल जो बदला तो फसाना बदला
रस्मे दुनिया निभाने के लिए
हमसे रिश्तों की तिजारत ना हुई…

वक्त रूठा रहा बच्चे की तरह
राह में कोई खिलौना ना मिला
दोस्ती की तो निभाई ना गयी
दु्श्मनी में भी अदावत ना हुई…

कुछ तबीयत ही मिली थी ऐसा
चैन से जीने की सूरत ना हुई
जिसको चाहा उसे अपना ना सके
जो मिला उससे मोहब्बत ना हुई…

–निदा फाज़ली

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सितम ही करना जफा ही करना निगाहे-उल्फत कभी न करना
तुम्हे कसम है हमारे सर की हमारे हक में कमी न करना

कहां का आना कहां का जाना, वो जानते ही नहीं ये रस्मे
वहां है वादे की भी ये सूरत, कभी तो करना कभी न करना

हमारी मय्यत पर तुम जो आना तो चार आंसू बहा के जाना
जरा रहे पासे-आबरू भी, कहीं हमारी हँसी न करना

सितम ही करना जफा ही करना निगाहे-उल्फत कभी न करना
तुम्हे कसम है हमारे सर की हमारे हक में कमी न करना

वो इक हमारा तरीके-उल्फत कि दुश्मनों से भी मिल के चलना
ये एक शेवा तेरा सितमगर कि दोस्त से दोस्ती न करना

सितम ही करना जफा ही करना निगाहे-उल्फत कभी न करना
तुम्हे कसम है हमारे सर की हमारे हक में कमी न करना

बुरी है ए दाग राहे-उल्फत खुदा न ले जाये ऐसे रस्ते
जो अपनी तुम खैर चाहते हो तो भूल कर दिल लगी न करना.

-दाग देहलवी

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