हम सब असभ्यता की सभ्यता में जीने को अभिशप्त हैं – त्रिवेदी

: दामिनी का विमोचन, वक्ताओं ने कहा कानून बनाने से कुछ नहीं होगा : इंदौर। त्रासदी यह है कि सुना सब रहे हैं सुन कोई नहीं रहा है। हम सब असभ्यता की सभ्यता में जीने को अभिशप्त हैं। दामिनी कांड के बाद यह बात कहीं नहीं उठी कि आजादी के ६५ साल बाद भी हम ऐसा सुरक्षित ट्रांसपोर्ट नहीं बना पाए हैं, जिसमे रात में भी कोई लड़की कहीं भी आ सके। उपरोक्त विचार चिन्तक और विचारक अनिल त्रिवेदी ने संस्था सरोकार द्वारा आयोजित परिसंवाद 'आखिर इस दरिंदगी को कैसे रोका जाये' को संबोधित करते व्यक्त किये।

श्री त्रिवेदी ने कहा कि लोग चार-पाँच साल की बच्ची के साथ हुए कुकर्म पर हैरान हैं तो भ्रूण के साथ क्या हो रहा है? आपने सवाल किया कि भ्रूण हत्या के लिए आज तक किसको सजा हुई है सिवाए उस लड़की के जिसे इस धरती पर आने से रोक दिया गया है। कवि सत्यनारायण सत्तन ने कहा कि झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के देश की महिलाओं को क्या हो गया है? वे जब शराब की दुकान बंद कराने इकट्ठी हो जाती हैं तो इन घटनाओं के विरोध में घर से बाहर क्यों नहीं आती। परिसंवाद को प्रो. सरोज कुमार, डॉ. रजनी भंडारी ने भी संबोधित किया। इस अवसर पर इंदौर प्रेस क्लब के अध्यक्ष प्रवीण कुमार खारीवाल भी उपस्थित थे।

दामिनी का विमोचन अतिथियों ने किया। दामिनी में ३३ कवियों की कविताओं का संग्रह है। इस अवसर पर समारोह में मौजूद ०८ कवियों का स्वागत भी किया गया। प्रारंभ में संस्था परिचय संयोजक रामस्वरूप मूंदड़ा ने दिया। दामिनी के बारे में संपादक एवं इंदौर प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष शशीन्द्र जलधारी ने जानकारी दी। अतिथियों का स्वागत शशीन्द्र जलधारी, रामस्वरूप मूंदड़ा, युवराज दुबे ने किया तथा स्मृति चिन्ह सौरभ खंडेलवाल, दिनेश अजमेरा और वेंकटेश मूंदड़ा ने दिए। कार्यक्रम का संचालन गिरीश कुसुमाकर ने किया। समारोह में बड़ी संख्या में कवि, साहित्यकार एवं प्रबुद्धजन उपस्थित थे।

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