हर चैनल के उन चमकीले अस्पतालों से टाइअप होते हैं जिनके विज्ञापन आप स्क्रीन पर देखते हैं

पप्पू की छत गिरने से परिवार के कुल 6-7 सदस्यों की एक ही साथ मौत हो गई थी. हम भटक रहे थे गुरुतेग बहादुर अस्पताल में. कहीं कोई बतानेवाला नहीं, किसी डॉक्टर की जुबान तक नहीं खुल रही थी. कब पोस्टमार्डम करेंगे, कब रिपोर्ट बनेगी, डेड बॉडी कब परिवारवालों पुलिस को सौंपी जाएगी, कुछ अता-पता नहीं. चारों तरफ कोहराम..आधी रात में हॉस्पीटल के आगे सिर्फ रोने-चीखने की आवाजें.किसी की कोई सुननेवाला नहीं. इस चीख में जो कुछ एप्रेन पहने लोगों की जुबान जो सुनाई देती थी वो सिर्फ- बैन की लौड़़ी.. सुबह के छह बज गए.

मरे हुए लोगों की डेथ रिपोर्ट तैयार करने में फिर भी सब अस्पष्ट था और बाकी जो मरीज रो-बिलख रहे थे, उनकी कहानी तो अलग ही है. लेकिन इन अस्पतालों की स्टोरी आपको कितनी बार दिखती है. मैक्स, फॉर्टिस, एपोलो के चमकीले विज्ञापनों के आगे इन अस्पतालों पर कितनी बार आपको गंभीरता से कुछ भी जानने-समझने का मौका मिलता है? नहीं मिलेगा, क्योंकि हर चैनल के किसी न किसी उन चमकीले अस्पतालों से टाइअप होते हैं जिनके विज्ञापन आप स्क्रीन पर देखते हैं और वहां उनका इलाज हो जाता है या नहीं तो मेडीक्लेम है ही. बाकी नीचे स्तर के कर्मचारी मरें तो मरें अपनी बला से.

रात के करीब ढाई बजे थे. हम जीबी पंत अस्पताल में घंटेभर से भटक रहे थे. हम उस शख्स की तलाश में थे जिसे कि जीबी रोड में गोली मारी गई थी. जीबी रोड जाने पर हमें जानकारी मिली थी कि हां ऐसी घटना तो हुई थी, पार्किंग के ठेके को लेकर और वो बंदा इसी अस्पताल में एडमिट होगा. हम भटकते रहे, पुलिस स्टेशन में पता किया. बताया,यहां तो ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है. आखिर में हॉस्पीटल के आगे मेरे साथ कैमरामैन को देखकर एक व्यक्ति ने पूछा- आपलोग इंडिया टीवी से आए हैं. हमने कहा- इंडिया टीवी से तो नहीं लेकिन टीवी से आए हैं..फिर वो शख्स हमे उसके पास ले गया. डॉक्टर जिस हालत में उसकी इलाज कर रहे थे, वो मरीज जैसे जिंदगी लौटने का और डॉक्टर उसके मरने का इंतजार कर रहे थे. स्थिति अब भी कुछ खास बदली नहीं है. हां बेडों की संख्या बढ़ाए जाने के किऑस्क जरुर लग गए हैं. चैनलों को बिहार के अस्पताल अगर जर्जर नजर आ रहे हैं तो देखिए जाकर महानगर,मेट्रो दिल्ली का अस्पताल, आपको लगेगा ही नहीं कि हम अंतिम शरणस्थली माने जानेवाले शहर के अस्पताल में मौजूद हैं. लालवाली-पीलीवाली-नीलीवाली रंगों से,नामों से नहीं अस्पताल में इलाज और दवाएं चल रही हैं..और हंसी आ रही थी अभी न्यूज24 पर रोहिणी के स्कूल की मिड डे मील को लेकर रिपोर्ट देखकर..ठेकेदार बताने में डर से हकला रहा है और रिपोर्टर तब भी स्टैंड के साथ अपनी बात नहीं रख पा रहा है.

कोई 15 दिन पहले अपने एक प्रोफेसर को देखने एम्स जाना हुआ. एम्स घुसते ही एकबारगी आपको पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन और अस्पताल के बीच का फर्क खत्म होता नजर आएगा. लगेगा यहां भी हर 10-15 मिनट में बिहार, यूपी, एमपी से एक ट्रेन आती है और सवारी घर न जाकर यहीं रुक जाते हैं. चीख रहे,कराह रहे लोग, सीमेंट की बोरी बिछाकर लोगों की टूटी-बिखरी आधी गृहस्थी वहीं पड़ी थी. देखकर और उनमे से कुछ से बात करने पर लगा कि बीमार लोग कम सरकार और व्यवस्था ज्यादा है. पटना, बक्सर,छपरा,भटिंडा में बैठे डॉक्टर मरीज की पर्ची पर जैसे ही रेफर्ड टू एम्स लिखते होंगे, मरीज को लगता होगा, बस पर्ची कटाकर अमृत घोंट लेनी है. लेकिन यहां एक दूसरे नरक का प्रवेश द्वार खुला होता है. आखिर एम्स भी कितनों को संभालें और फिर मरीज बीमार हो तब न, जब पूरा का पूरा देश ही बीमार है तो उसमे एम्स किस हद तक सुधार सकता है ? हमारे रिपोर्टर सुबह से चैनल माइक चमकाकर चार साल-पांच साल के बच्चे से पूछ रहे हैं- रोज यही खाना मिलता है, अस्पताल का हाल दिखा रहे हैं, लेकिन हादसे के बदले हालात पर कितनी रिपोर्टिंग हो रही है इस देश में ? ऐसा लगता है चैनल के भीतर रिपोर्टर की मीटिंग संपादक नहीं यमराज लेते हैं जो सिर्फ और सिर्फ मौत होने पर खबर फॉलोअप करने के आदेश जारी करते हैं. लगभग मैनेज हो चुका मीडिया क्या इन सबके बीच किसी भी तरह से जिम्मेदार नहीं है ? क्या जब वो नीतिश कुमार को सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री के ताज से नवाजता है तो इसके पहले वहां के स्कूल,अस्पताल,पुलिस चौकी का जायजा ले चुका होता है ? पूछिए ये सवाल मीडिया से, शायद ही जवाब होंगे उनके पास..तो जब आज उसी चैनल को मिड डे मील खराब, अस्पताल जर्जर, प्रशासन लापरवाह नजर आते हैं तो सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री करार देने के पीछे कौन से मानक काम करते हैं ? आपको बात बुरी लगे तो लगे लेकिन यकीन मानिए इस तरह की घटनाओं में कहीं न कहीं मीडिया भी उतना ही जिम्मेदार है जितना कि वो स्वयं सरकार को बता रहा है..उसने अपने भीतर के विपक्ष को मारकर सरकार के आगे लोटने का काम किया है और आगे भी करेगा.

साल 2008 में हमलोग दस दिनों के लिए तरियानी छपरा,बिहार गए थे. वैसे तो ये मीडिया वर्कशॉप था जिसमे वहां के स्थानीय मुद्दे को लेकर लोग डॉक्यूमेंट्री फिल्में, रिपोर्ट आदि बना रहे थे. मेरा काम वहां के स्कूली बच्चों के बीच स्थानीय मुद्दे को लेकर अखबार निकालने का था और कैसे उसके लिए ये काम करना होगा, ये सब बताने-समझाने का था. लेकिन भटकते-भटकते हम पहुंचे तरियानी छपरा के उस अस्पताल में जहां पूरे अस्पताल में सिर्फ जानवरों का चारा भरा था. वहां के कुछ दबंग लोगों ने इस अस्पताल को पूरी तरह अपने कब्जे में ले लिया था. ये जानते हुए कि पूरे अस्पताल में चारा ही होगा जब नीचे ऐसा है तो..फिर भी हम डेढ़ घंटे तक वहां एक-एक कमरे से गुजरे. प्रसूति गृह,एक्सरे सब कमरे के आगे इस तरह लिखा था लेकिन सब उजाड़ और चारे से भरा. सब देखकर बेहद गुस्सा आया और फिर अचानक आंख में आंसू आ गए और सचमुच बाहर की सीढियों पर बैठकर रोने लग गया. अगले दिन राकेशजी ( Rakesh Kumar Singh) के साथ कैमरे और बाकी दूसरी चीजें लेकर गए और कोई सात मिनट की एक छोटी सी रिपोर्ट बनायी. तब मेरे पास न तो अपने लैपटॉप थे, न कैमरा और न ही कुछ और..सो सारी चीजें उन्हीं के पास रह गई. उन्होंने वहां की बहुत सारी तस्वीरें लीं और शायद अभी भी हो. मैंने उनके ब्लॉग हफ्तावार पर बहुत खोजा, मिली नहीं.. उम्मीद है राकेशजी इस स्टेटस को पढ़कर वो रिपोर्ट और तस्वीर साझा करें. ये प्रसंग मुझे बस इसलिए याद आ गया कि आज चैनलों पर बिहार में अस्पताल की दुर्दशा पर चर्चा हो रही है.. ये क्या कोई एक दिन में हुआ है, ये उसी समय से होता आया है जब बिहार को मीडिया प्रूव सुशासन का राज्य बताया जाता रहा है, पहले से तो स्थिति खराब थी ही.

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *