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हर वोट को भाजपा के खाते में डालने वाली इवीएम मशीन!

Arvind Shesh : कल्पना कीजिए कि इस आम चुनाव के दौैरान अगर पचास फीसद ईवीएम मशीनों में भी यह प्रोग्रामिंग कर दी जाए कि कोई भी बटन दबाइए, वोट भाजपा को जाएगा, तो नतीजे क्या आ सकते हैं। असम का मामला एक उदाहरण भर है। यही लहर है।

Arvind Shesh : कल्पना कीजिए कि इस आम चुनाव के दौैरान अगर पचास फीसद ईवीएम मशीनों में भी यह प्रोग्रामिंग कर दी जाए कि कोई भी बटन दबाइए, वोट भाजपा को जाएगा, तो नतीजे क्या आ सकते हैं। असम का मामला एक उदाहरण भर है। यही लहर है।

कोई यह न सोचे कि सत्ता में कांग्रेस है और उसे यह देखना है। यह चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है और आयोग भले भाजपाई नहीं है। लेकिन सवाल है कि मशीनें कौन तैयार करता है? तंत्र की जटिलता को समझना इतना मुश्किल भी नहीं है। एक संघी या कांग्रेसी अफसर या तकनीकी विशेषज्ञ बड़ा खेल कर सकता है। असम में एक जगह जांच हुई। लेकिन इस जांच का दायरा क्या है?

चार साल पहले जब ईवीएम के जरिए वोटिंग पर सवाल उठ रहे थे तो कुछ आधुनिक हुए लोगों को इसका विरोध पिछड़ापन लगा था। लेकिन हकीकत यह भी है कि जिन आधुनिक और विकसित देशों में ईवीएम का चुनावों में प्रयोग हुआ, उनमें ज्यादातर ने इसकी गड़बड़ियों के मद्देनजर इसकी जगह फिर से बैलेट पेपर वोटिंग की व्यवस्था लागू की। भारत में भी 2010 में एक तकनीकी विशेषज्ञ हरि प्रसाद ने इसका सार्वजनिक प्रदर्शन करके बताया कि कैसे आसानी से इसकी टेंपरिंग करके किसी खास उम्मीदवार के पक्ष में इसके वोट सुनिश्चित किए जा सकते हैं। लेकिन हरि प्रसाद को चोरी के आरोप में गिरफ्तार करके एक तरह से उन्हें दफन करने की कोशिश की गई।

आज जबकि चुनाव आयोग की चौकसी के चलते बूथ लूट या मतदान प्रक्रिया में बाधा डालने की गुंजाइश लगभग खत्म हो रही है, ईवीएम की जिद और उसकी वकालत ही एक तरह का शक पैदा करती है। इस देश के हिसाब से भी देखें तो अगर अराजक हालात और प्रशासनिक कमियों पर काबू पा लिया जाए तो यहां बैलेट पेपर वोटिंग ज्यादा सार्थक और जनतांत्रिक है। ईवीएम को दुनिया के विकसित देशों ने ख़ारिज किया, भारत से भी इसकी विदाई जरूरी है।

http://timesofindia.indiatimes.com/home/lok-sabha-elections-2014/news/An-EVM-that-votes-only-for-BJP-stuns-poll-staff-in-Assam/articleshow/33153152.cms

पत्रकार अरविंद शेष के फेसबुक वॉल से.

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