हाई कोर्ट के जज ने पूछा- ‘क्या कॉमनमैन और पीएम आपकी नज़र में बराबर हैं?’

मैंने हाल में स्पेशल सिक्यूरिटी ग्रुप अधिनयम 1988 को संविधान के अनुच्छेद 14  के विपरीत होने के कारण विधिविरुद्ध घोषित करने और एसपीजी सुरक्षा मात्र आवश्यकता के अनुसार प्रदान किये जाने हेतु इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में एक पीआईएल (रिट याचिका मिस बेंच संख्या 2967/2014) दायर किया गया. पीआईएल के अनुसार सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाई कोर्ट ने लगातार यह कहा है कि सरकारी सुरक्षा मात्र किसी पद के साथ नहीं दिया जाना चाहिए, भले ही वह पद कितना भी बड़ा हो. इसे हर व्यक्ति-विशेष के अलग-अलग आकलन के बाद ही दिया जाना चाहिए और मात्र पूर्व प्रधानमंत्री या इनके परिवार के सदस्य होने के कारण नहीं दिया जा सकता क्योंकि इनमे कुछ लोग अवांछनीय हो सकते हैं अथवा उन्हें इसकी आवश्यकता नहीं हो सकती है. इसी प्रकार इस सीमित समूह के बाहर के लोगों को उनकी जरूरत के बाद भी यह सुरक्षा नहीं दिया जाना पूर्णतया गलत है.

अतः मैंने इसे भेदभावपूर्ण और मनमाना बताते हुए एसपीजी एक्ट को विधिविरुद्ध करार देने और एसपीजी सुरक्षा प्रत्येक मामले में सम्यक आकलन के बाद मात्र आवश्यकता के अनुरूप प्रदान किये जाने की प्रार्थना की थी. जस्टिस सुनील अम्बवानी और जस्टिस डी के उपाध्याय की बेंच के सामने दिनांक 11 अप्रैल 2014 को समय 02.55 बजे सायं मामले की सुनवाई के समय क्या बातें हुईं, मैं अपने सामर्थ्य भर आपके सामने रख रही हूँ. मैंने इसमें यथासंभव एक शब्द भी इधर-उधर नहीं कहा है और इस सम्बन्ध में किसी परीक्षण, लाई डिटेक्टर आदि से गुजरने को तैयार हूँ. मैं अपने लिखे एक-एक शब्द के लिए उत्तरदायी हूँ और अंत तक उन पर अडिग रहूंगी. मैंने इसे जनहित में सामने लाना इसीलिए आवश्यक समझा क्योंकि कोई भी संस्था मात्र जनहित के लिए बनी है और उस संस्था की बातें पूरे समाज के सामने अवश्य ही आनी चाहिए.

मैं यह भी कहूँगी कि मेरे मन में न्यायपालिका के प्रति असीम श्रद्धा और विश्वास है. यदि मेरे मन में न्यायपालिका के प्रति असीम आदरभाव और उनकी शक्तियों पर पूर्ण भरोसा नहीं होता तो मैं बार-बार वहां क्यों जाया करती? हाँ, यह अवश्य है कि मैंने आज तक किताबों में जो सुना था कि यह संविधान “हम भारत के लोगों” का है और इस देश के सभी नागरिक बराबर हैं, इस घटना ने मुझे उसके बारे में गंभीरता से सोचने पर मजबूर कर दिया है. साथ ही मैं इस पूरे घटनाक्रम की प्रति चीफ जस्टिस ऑफ़ इंडिया को भी सूचनार्थ और आवश्यक कार्यवाही हेतु भेज रही हूँ. अब तक इस मामले का निर्णय हाई कोर्ट के वेबसाईट पर नहीं आया है.

कोर्ट में पूरा घटनाक्रम—

सरकारी वकील द्वारा प्रारंभिक आपत्ति- “1988 का एक्ट है, पीएम की सेक्युरिटी का मामला है, इससे पब्लिक से कोई मतलब नहीं है. अतः यह कोई पीआईएल नहीं है.”

जस्टिस अम्बवानी- “आपको क्या कहना है”

नूतन ठाकुर -“एसपीजी एक्ट में केवल पीएम, एक्स पीएम, फैमिली मेंबर को सेक्युरिटी की बात कही गयी है, यह आर्टिकल 14 का उल्लंघन है. फिर इस पर सरकारी पैसा खर्च होता है, इसीलिए यह पीआईएल का मैटर है.”

जस्टिस अम्बवानी- “क्या कॉमन मैन और पीएम में कोई अंतर नहीं है आपकी नज़र में. आप पूरे सिस्टम को हार्म पहुंचा रही हैं. यह पीआईएल नहीं है. पीएम सेक्युरिटी कितना इम्पोर्टेन्ट होता है, आप को पता भी है. दो पीएम की हत्या हो चुकी है. यह पूरे वर्ल्ड वाइड कितना सेंसिटिव इशू है, आप समझती हैं? सिक्यूरिटी पर कितना खर्च होता है, क्यों सिक्यूरिटी जरूरी है उतनी, इंटेलिजेंस की रिपोर्ट क्या है, देखा है आपने? आम आदमी और पीएम को कैसे बराबर किया जा सकता है. कैसे कह सकती हैं कि सुरक्षा नहीं दिया जाए?”

नूतन ठाकुर- “मैंने रिट पेटीशन में कहीं नहीं कहा कि पीएम को सुरक्षा नहीं दी जाए. यह केवल पीएम, एक्स पीएम आदि के लिए है. और लोग भी इम्पोर्टेन्ट हैं, और पोस्ट को भी उतना खतरा हो सकता है. आम आदमी भी ऐसा हो सकता है जिसे कभी एसपीजी सुरक्षा की जरूरत पड़ सकती है. उन्हें भी बेहतर सुरक्षा दी जाए. यह सीधे आर्टिकल 14 का वायोलेशन है.”

जस्टिस अम्बवानी-“ पीएम पोस्ट इतना इम्पोर्टेन्ट होता है. आपने यह पीआईएल पब्लिसिटी के लिए फ़ाइल किया है. मुझे मालूम है कि आपने 78 पीआईएल फ़ाइल किया है. मैंने वेबपेज पर देखा है आप जजेज़ के खिलाफ लिखती हैं. आप पूरे सिस्टम को नुकसान पहुंचा रही हैं. यह मिसयूज है, ये जो आपने चैलेन्ज किया है. पहले पीआईएल एनवायरनमेंट को ले कर शुरू हुआ. डाउनट्रोडेन, पोल्यूशन रिलेटेड हो, वह पीआईएल होती है. यह पीआईएल नहीं है. आपने पब्लिसिटी के लिए किया है”

नूतन ठाकुर-“ इसमें पब्लिसिटी क्या है? मैं मीडिया को नहीं कहती कि मेरा नाम छापें और मीडिया मेरे घर की नहीं है. वे वही छापते हैं जो उन्हें सही लगता है. जो आपने 78 पीआईएल बताया है, मेरी जानकारी में मैंने लगभग 140 पीआईएल फ़ाइल किया है. सब डिफफेरेंट इशू पर है. चाइल्ड रिलेटेड, वीमेन रिलेटेड, कई एक्ट इम्प्लेमेंट नहीं हुए, उन पर हैं. किसी मामले में मुझे फायदा नहीं पहुँचता. एसपीजी सुरक्षा मुझे तो नहीं मिल जायेगी, इसे करने से मेरा क्या फायदा?”

जस्टिस अम्बवानी- “हम जानते हैं कि आपको क्या फायदा है. आप पीआईएल फ़ाइल कर के मेगासेसे अवार्ड पाना चाहती हैं. पब्लिसिटी चाहती हैं. नाम छपना चाहती हैं, इसीलिए पीआईएल फ़ाइल करती हैं. ज्युडीसिअरी में कई पर्सनल केस होते हैं. कोर्ट का टाइम वेस्ट होता है. आपने जुडीसिअरी के टाइम को नुकसान पहुँचाया है. जुडीसिअरी की सेफ्टी के लिए हम आपको कास्ट करेंगे.”
इसके बाद जस्टिस अम्बवानी ने धीमी आवाज़ में आर्डर लिखवाया जिसमे पूरी बात स्पष्ट नहीं हो सकी.

इसके बाद जस्टिस अम्बवानी- “जुडीसिअरी की सेफ्टी के लिए आप जो भी पीआईएल फ़ाइल करें, रजिस्ट्री में आप उसके साथ 25,000 रुपये का ड्राफ्ट लगाएंगी और जब कोर्ट संतुष्ट हो जायेगी कि पीआईएल है तो पैसा वापस हो जाएगा और पीआईएल ख़ारिज हो जायेगी तो आपका पैसा जब्त हो जाएगा. यह जुडीसिअरी की सेफ्टी के लिए है.”

नूतन ठाकुर-“ठीक है, आपने यह किया. मेरा यह रिक्वेस्ट है कि अब पीआईएल का दायरा बढ़ गया है, और कई मामले एंटरटेन होते हैं. किसे आप पीआईएल मानते हैं, किसे नहीं मानते हैं, यह भी बता दीजिये.”

जस्टिस अम्बवानी-“इसे हम डिसाइड करेंगे, क्या पीआईएल होता है, क्या नहीं. हम आपको क्यों बताएं. परसों जो आपने फ़ाइल किया था, वह अच्छा इशू था, लेकिन यह क्या.”

लखनऊ से आरटीआई एक्टिविस्ट नूतन ठाकुर की रिपोर्ट.

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