हाथों में होंगी हथकड़ियां, बेड़ी होंगी पांव में… (यशवंत जेल यात्रा की एक एक्सक्लूसिव तस्वीर)

हर चौदह दिन बाद जेल से कोर्ट में पेशी के लिए ले जाया जाता था. कोर्ट की हवालात से अदालत तक बंदी को ले जाने में हथकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है. चार लोग एक रस्सी में जुते हुए, और सभी के हाथों में हथकड़ी. बाद के दिनों में जाने क्यों पुलिस वालों ने खुद ही हथकड़ी लगाना बंद कर दिया, हाथ से पकड़कर कोर्ट में ले जाने लगे. पर पहले दिन जब जेल से नोएडा कोर्ट लाया गया और हवालात से अदालत पेश कराने को ले जाने की तैयारी होने लगी तो मुझे विधिवत तरीके से हथकड़ी पहनाई गई. फिर दो तीन सिपाही हम चार लोगों को कोर्ट की तरफ ले जाने लगे.

इसी दौरान रास्ते में भड़ास4मीडिया के कंटेंट एडिटर अनिल सिंह खड़े मिल गए. उनको देखते ही मैंने हाथ हिलाया और जोर से चिल्लाकर पूछा- का गुरु, सब ठीकठाक बा न…?

अनिल ने धीरे और बुझे स्वर में कहा- ठीके ह भइया.

अनिल मुझे, हथकड़ी और रस्सी में जुते बाकी बंदियों को निहारते रहे, मायूस होते रहे. मैंने अपने हथकड़ी वाले हाथ को उपर लहराकर कहा- ''अबे मस्त रहा कर, देख.. मैं कितना प्रसन्न हूं. हर हाल में खुश रहना सीख लो. यही सूफियाना आनंद है, यही फकीरी है. ऐसे ऐतिहासिक मौके सभी को नहीं मिलते. चलो, एक स्टाइलिश फोटो हो जाए. मोबाइल से ऐसी फोटो उतारो जिसमें लगे कि एक नायक को हथकड़ी पहना दिया गया है, भ्रष्ट सिस्टम और सिस्टम के भ्रष्टाचारी उसे जमाने के आगे खलनायक साबित करने पर तुले हुए हैं, तब भी वह, जुल्मो-सितम सह कर भी वह हंस-मुस्करा रहा है. फिल्म का क्लाइमेक्स अभी बाकी है. फोटो से यह भी लगे कि ठीकठाक यशवंत को भड़ास ने क्या से क्या बना डाला… 🙂 ''

और यह सब कहकर मैंने अनिल को आंख मारते हुए जोर से हंसा. अनिल बोल उठे- ''नहीं भइया, मेरी हिम्मत नहीं पड़ रही इस हाल में आपकी फोटो खींचने की.''

मैंने कहा- ''यार, ये मौका सभी को नहीं मिलता, बार बार नहीं आता, अपन लोगों को तो हमेशा यह पता रहा है कि यह नौबत आ सकती है. और आज अगर आ गई है तो इसे इंज्वाय करो. कोर्ट, कचहरी, धमकी, रिपोर्ट, मुकदमा तो पहले से ही चल रहे हैं, गिरफ्तारी होना और जेल जाना बाकी था, सो यह भी हो गया. आगे ये लोग गोली मरवाने का प्लान करेंगे. उससे भी फर्क नहीं पड़ता. देह के साथ खुश हैं. बिदेह होकर भी प्रसन्न रहेंगे. लेकिन करेंगे वही जो मन कहेगा, दिल कहेगा. किसी के दबाव, धमकाने, प्रताड़ित करने से नहीं बदलने, टूटने वाले. अब चलो, मेरा आदेश मानो और फोटो खींच डालो, वरना ये मौका हाथ से चला जाएगा.. मैं तो हथकड़ी पहनाये जाते समय ही सोच रहा था कि पता नहीं बाहर कोई आया है या नहीं… सोच ही रहा था कि इस स्टाइल में फोटो कोई खींच लेता तो मजा आ जाता…''


जानेमन जेल

यशवंत की जेल डायरी


अनिल ने ना-नुकूर करना जारी रखा. उनका दिल नहीं गंवारा कर रहा था कि हथकड़ी लगे हाथ वाली मेरी कोई तस्वीर खींची जाए और इस हाल वाली फोटो लोग देखें. पर मैंने उन्हें हड़काया कि बाबू, खींच लो. मेरा कहना मानो. यह फिल्मी मौका फिर हाथ नहीं आने वाला…. तब भी अनिल भाई टस से मस नहीं.

फिर मैं जोर से बोला… अबे खींच भाई… कहना मान ल्यो… चल खींच लो.. मेरी खुशी की खातिर…

तब अनिल ने फोटो खींचना शुरू किया. हालांकि सिर्फ एक खींच कर वे थम गए. पर मैं देर तक पोज देता रहा… कोई आए मेरी फोटो खींच ले… 🙂

मेरे साथ चल रहे हथकड़ीधारी बंदी भौचक. गजब आदमी है ये तो. यह तो खूब मजे ले रहा है. सच भी यही था कि एक जमाने में रंगमंच से जुड़ा रहा मैं हथकड़ी में खुद को सिर्फ एक नए रोल में पा रहा था, बाकी सब कुछ वैसा ही था, पहले जैसा. बाकी लोगों को दर्शक मानकर उनके देखने और अपने अभिनय का आनंद खुद भी ले रहा था. अनिल ने जब फोटो खींच लिया तो मैंने उनसे मोबाइल लेकर फोटो देखकर बोला- बढ़िया तस्वीर है…

अनिल का हालचाल पूछने लगा. फिर उन्हें इत्मीनान से समझाया. उनसे कहा– ''भड़ास पर खबर छापने में रियायत मत करना. दबा के छापो, जैसे पहले छापते थे, तुम इन घटनाक्रमों से डरना रुकना मत.. ये घटनाएं इम्तहान लेने के लिए होती हैं, हम लोगों को ज्यादा मजबूत बनाने के लिए होती हैं… अगर यह सिस्टम और इसके लोग ज्यादा परेशान करेंगे तो हम लोग भविष्य में किसी आफिस या घर पर रहकर भड़ास संचालित करने की जगह अलग अलग प्रदेशों में घूमते हुए छापामार तरीके से खबरों का प्रकाशन करेंगे. विशुद्ध छापामार पत्रकारिता. देखते हैं कौन रोक लेता है. जिसे पकड़ना हो पकड़े. हर दौर में यह हुआ है कि जब ईमानदारी से काम करने वालों को सिस्टम व इसके लोगों ने ज्यादा सताया है तो उन लोगों को बागी बन जाना पड़ा है. अपन लोग के पास भी आप्शन है. लेकिन अभी नहीं. अभी तो सही मायने में कहा जाए तो हम लोगों की पत्रकारिता का असर दिखना शुरू हुआ है. बेबाक खबरों और पोलखोल खबरों से परेशान लोगों ने नान-इशूज को इशू बनाकर, फर्जी आरोप लगाकर,  फर्जी कहानियां बनाकर, सत्ता का गलत इस्तेमाल करके आनन-फानन में जेल भिजवाना शुरू किया है. यह पहली बार हुआ है. आगे भी कई बार होगा. पर खुद एक ऐसा वक्त आएगा जब हम लोगों को लगेगा कि अब अपनी रणनीति में बदलाव करना चाहिए. तब रणनीति बदलेंगे. जब जब लोगों ने एक रास्ता बंद करने की कोशिश की है तो बदले में सौ नए रास्ते खुले हैं.''

बाद के दिनों में कारपोरेट व भ्रष्ट मीडिया ने जुल्मो-सितम तेज करते हुए कंटेंट एडिटर अनिल सिंह को भी गिरफ्तार करवा दिया. जिस दिन उन्हें अरेस्ट किया गया, उस दिन वे नोएडा कोर्ट में मुझसे मिलने आए थे और हम लोगों से मिलने के बाद जब कोर्ट से बाहर निकले तो उन्हें सादी वर्दी वाले पुलिस वालों ने उठाकर एक कार में पटक दिया. जाहिर सी बात है, पूरा पुलिस प्रशासन हम लोगों की एक एक गतिविधि वॉच कर रहा था और कई आका लोग मानीटरिंग कर रहे थे कि अब ऐसा क्या क्या कराया जा सकता है ताकि यह भड़ास नामक बवाल सदा के लिए खत्म हो सके. अनिल को अगले दिन जेल भेज दिया गया. जो शख्स मुझसे जेल में मिलने आता था, वो भी एक दिन जेल के अंदर बंदी बनकर आ गया. न कोई जांच, न पड़ताल. सीधे गिरफ्तारी और जेल. बाद में मालूम चला कि मैंने और अनिल ने दैनिक जागरण वालों को धमकी दी है, रंगदारी मांगी है. यह केस लगा है. यह आरोप सुनकर सबने यही कहा कि जागरण वाले इसके अलावा आरोप लगा भी क्या सकते हैं. जो लोग खुद ब्लैकमेलिंग, पेड न्यूज, उगाही का काम पूरे देश में संगठित और सिस्टमेटिक तरीके से करते हों, और उनकी इन हरकतों का लगातार खुलासा भड़ास कर रहा है, तो वे लोग भड़ास जैसे मंच से जुड़े लोगों पर धमकी और रंगदारी के आरोप लगाएं तो जमाना खुद ब खुद समझ जाता है कि सच क्या है, गलत क्या है.

यहीं तक मामला नहीं रहा. भड़ास से जुड़े घर आफिसों पर छापे मारकर लैपटाप व कंप्यूटरों के हार्ड ड्राइव निकाल लिए गए. यह सब इसलिए ताकि कहीं से कोई क्लू मिल जाए, कुछ भी मिल जाए ताकि भड़ास वालों को ब्लैकमेलर, उगाही करने वाला घोषित कराया जा सके. बावजूद इसके भड़ास बंद नहीं हुआ. कुछ दिनों तक ढीला जरूर पड़ा रहा, जब तक हम लोग जेल में रहे. पर आगे से ऐसा नहीं होने वाला. अगर हम लोग फिर जेल भेज दिए गए तो भी भड़ास तेजी से दौड़ता रहेगा क्योंकि देश के कई हिस्सों में रह रहे लोगों को इस साइट पर खबर अपलोड करने का जिम्मा सौंपा जा चुका है.

फिलहाल मैं बात कर रहा था उस एक्सक्लूसिव तस्वीर के बारे में जिसे अनिल सिंह ने खींचा पर उसका प्रकाशन कहीं हुआ नहीं. तस्वीर खींचे जाने के बाद उसे देखकर मैंने मन ही मन मान लिया कि मेरी सबसे प्रिय तस्वीर खींची जा चुकी है. और, मैं अनिल के जाने के बाद गाता रहा, गुनगुनाता रहा. उस तस्वीर को कल मैंने फेसबुक पर अपलोड कर दिया है, एक छोटी सी टिप्पणी लिखकर. इस फोटो को कई जगह शेयर किया गया. हर जगह अलग-अलग कमेंट आएं. सबको यहां दिया जा रहा है. आप भी पढ़ें, देखें और आनंद लें. अखबार वाले आजकल मेरे बारे में कुछ नहीं लिख रहे, कोई फोटो नहीं दिखा रहे तो सोचा कि मैं खुद ही अपनी हथकड़ी लगी फोटो प्रकाशित करके उनकी आत्माओं को शांति प्रदान कर दूं… 🙂 -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


Yashwant Singh : मेरी सबसे प्रिय तस्वीर… मैंने इसे जबरन एक मित्र को डांटकर खिंचवाया… और, मैं गुनगुना रहा था….

हाथों में होंगी हथकड़ियां
बेड़ी होंगी पांव में
फिर भी मेरे गीत
पहुंच जाएंगे तेरे गांव में…



Yashwant Singh अगर कोई इस प्रकरण के बारे में जानने से रह गया हो तो उसके लिए एक लिंक दे रहा हूं…यहां क्लिक करिए और पूरे मामले को पढ़िए… Yashwant Singh Jail

Shravan Kumar Shukla क्या सर.. यह तस्वीर अब? वैसे खिलाड़ी लग रहे हैं… जिस खेल में अंदर गए ..उस खेल के नहीं ! हाहा!

Aakash Singh गजब हो भाई आप………
 
Jai Prakash duniya me gar aaye hot jina hi padega………..jeevan hai agar jahar to peena hi padega………..jajbe ko salaam
 
Amit Kumar kya sir, geet me to dam hai !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
 
Shravan Kumar Shukla खुद को टैग करके यह फोटो हमेशा के लिए सुरक्षित कर लिया है मैंने…!
 
Yashwant Singh मेरे बगल में जो ब्लैक कपड़े में एक बंदी है, वो गैंगस्टर में निरुद्ध है. मेरे पीछे एक मोटा सा बंदी है, जो दिख नहीं रहा… और चौथा एक बेहद दुबला पतला मरियल सा बंदी… चारों अच्छे दोस्त बन गए… एक दिन नोएडा कोर्ट गया तो वहां काले कपड़े वाला बंदी फिर दिखा हथकड़ी पहने कोर्ट जाते हुए… उसे मैं मिला, पानी की बोतलें दी और हालचाल पूछा… पता नहीं, मुझे अब दुनिया में कोई ऐसा खराब शख्स नहीं दिखता जिसके अंदर एक अच्छी आत्मा न हो.. बुरा और अच्छा, दुनिया की तरफ से दिया हुआ विशेषण है. आदमी तो आदमी होता है.. खैर, ये दर्शन काफी आगे तक जाएगा.. और मेरे में दिक्कत ये है कि मैं एक्स्ट्रीम ह्यूमैनिस्ट हो जाता हूं…

Ravi Shekhar क्रान्ति

Yashwant Singh इस फोटो को गर्दन से उपर केवल देखो तो ये लाइनें बनती हैं.. वे हाथ उठाए हैं, शायद भगवान के प्रतिनिधि बन आए हैं…. और तस्वीर को जब नीचे तक देखो तो ये लाइनें निकलती हैं… वे उपर हाथ उठाए हैं, नीचे हथकड़ी लगाए हैं… जाने क्या जमाना आ गए… देवता और राक्षस एक ही में समाए हैं… 🙂

Vijay Yadav सच बोलने और सच लिखने की सजा…….

Chandan Bangari jai ho rangdar ki nayi paribhasa gadhne wale ki

Pradumn Kaushik haaa……haaaaaa………aapka bhi jabab nhi sir

Adarsh Tripathi inklab jindavad

Pradumn Kaushik yaswant singh or bhadas 4 media jindawad

Vijay Madhesia ye jos bana rahe babu mosai…

Aapka Harish Happy Diwali hai yah to … aur yeh photo pathakha hai sir

Braj Bhushan Dubey इस क्रान्तिकारी विचारधारा को कौन हथकडी लगा सकता है। बहादुर पत्रकार, क्रान्तिकारी माटी का सपूत।

As Raghunath इस नायाब सीन पर तो एक ही गाना आई एस जौहर का फिट बैठता है…चले हैं तन तन के सरकारी दुल्हा बन के, चले हैं, चले हैं,चले हैं ससुराल! बधाई इस चित्र के लिए.

Prateek Shukla nice one but dont keep it up!! 🙂

Vivek Chandra फिर भी मेरे गीत………बहुत खुब … हिम्मत करने वालों की कभी हार नहीं होेती

Ramkishore Pawar औरत पहनती है चुडिया
मर्द पहनते है हथकडिया
आपने भी पहनी थी
हमने भी पहनी है
दोस्त एक बात कहना चाहता
हूं कि पत्रकारिता यदि मर्दो की तरह करनी है तो हिजडो के प्रकोप से क्या डरना।
निष्पक्ष – नीडर – निर्भिक पत्रकारिता के प्रतिक भाई यशंवत सिंह को दीपोत्सव की पूर्व संध्या पर हार्दिक बधाई………

Girish Kumar Tripathi Like

Sandeep Saini sir mai ap ke shaat hu hamisa marnew ke baad bhi

Vikas Mishra जियो मेरे लाल

Kaushal Kumar huum sab aapke saath hai….sir…

Raj Seervi Rathore Yashwant bhai we r with u

Kali Batra huum sab aapke saath hai.

Sunil Manthan Sharma mard ise kahten hain… patrakar ise kahten hain… jiyo…. khul ke jiyo….

Anjani Pandey हौसले लाख, रोके जाएँ गोलीयाँ औ तलवार से… जुनुन वाले कब हारते हैँ, हार से…

Prashant Varshney aaj ke samaj ko aapke jasie patrkaro ki jarurat hai

Ravikant Pandey ak kawi ne kaha hai……ab sone ka wakat gaya utho likho etihas nya sir yah kya diwali bam hai

Hari Sharma स्वतंत्रता सेनानी बन गये आप


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