हाय रे संपादक! इस संपादन कला को प्रणाम

आज के अख़बारों में ईश्वरीय कण के खोजे जाने की खबरें प्रकाशित हुईं हैं. उत्तर भारत के तथाकथित बड़े अख़बारों ने सदी की इस महानतम खोज को जिस नीम समझ के साथ प्रस्तुत किया है, उसे पढ़ते हुए हंसी भी आती है और रोना भी. विश्व में सर्वाधिक प्रसार संख्या का दावा करने वाले एक अखबार ने लिखा है कि विज्ञान भगवान के करीब पहुँच गया है. एक दूसरे बड़े अखबार ने अहम ब्रह्मास्मि के शीर्षक के साथ लिखा है कि विज्ञान ने प्रमाणित कर दिया है कि भगवान कण-कण में व्याप्त है. जो लोग जानते हैं कि सत्येन्द्र नाथ बासु और पिटर हिग्स ने अपनी गणितीय संकल्पनाओं के दौरान जिस कण के होने की संभाव्यता जताई थी, उसे गाड पार्टिकिल क्यों कहा गया, उन्हें भी हिन्दी के इन मूर्धन्य संपादकों की समझ पर तरस आ रहा होगा.

दर असल इस कण का वैज्ञानिक नाम हिग्स बोसोन है. इसे गाड पार्टिकिल इसलिए कह दिया गया क्योंकि जिस तरह ईश्वर के बारे में कहा-सुना जाता है, वैसा ही इस कण के बारे में भी अब तक कहा-सुना जाता रहा है. ऐसा कण, जो सर्व व्याप्त है, जिसे देखा नहीं जा सकता, छुया नहीं जा सकता. पर अब उसे प्रयोगशाला में उत्पन्न कर लिया गया है, अब उसे देखा जा सकता है, अब उसके स्वरूप का अध्ययन किया जा सकता है. अब वह हिग्स बोसोन तो है पर गाड पार्टिकिल नहीं रह गया. जबकि ईश्वर अब भी उसी कल्पना की तरह है, जो सदियों से चली आ रही है. ऐसे में हिग्स बोसोन ईश्वर के होने का कोई प्रमाण नहीं बन सकता. वैसे भी विज्ञान को ईश्वर से क्या लेना-देना. वह वस्तुनिष्ठ होता है, सांप्रदायिक नहीं. किसी भी वैज्ञानिक ने ऐसा नहीं कहा कि वह इश्वर के करीब पहुँच गया है या उसने ईश्वर के होने का प्रमाण खोज लिया है. गाड शब्द की संपादकों ने अपने ढंग से व्याख्या कर ली है. कलम के इस करतब को, इस विकट समझदारी को मेरा प्रणाम.

        Sanjay Sharma Bahut sahi baat kahi aapne.

        अवनीश सिंह चौहान Goddamn particle se god particle ho gaya. achchhee tippadee hetu badhai
       
        Shandilya Siddharth ishwar ki khoj karny waly" khojwa" logo ko mai apni aur aap sabki tarf se pranam karta hu…zabrdast comment k liye rai saheb ko sadhuwad
        
        Srikant Saurav का करब भईया,बनिया के अखबार में संपादक उहे खबर बनावताड़े जवना से कि अखबार बिकाए.जब खबर भी बिके वाल माल हो जाई त अइसने न्यूज पढ़े के मिली.हम चाहें आप भी इ जगह पर रहती त इहे कुल्ही छापे के पड़ित.
        
        Srikant Saurav का करब भईया,बनिया के अखबार में संपादक उहे खबर बनावताड़े जवना से कि अखबार बिकाए.जब खबर भी बिके वाल माल हो जाई त अइसने न्यूज पढ़े के मिली.हम चाहें आप भी इ जगह पर रहती त इहे कुल्ही छापे के पड़ित.
       
        Shyamal Ganguli Kuch log apne ko khuda mante hayn
       
        Ram Bahadur Rai like this
        
        Dush Yant super like!
        
        Srikant Saurav हालांकि हाल के कुछ वर्षों से अखबारों में खबरों को रोचक बनाने के लिए इस तरह की फंतासी रचने की जो परिपाटी चल निकली है,इस कारण पाठक अखबार को गंभीरता से न लेकर इसे सतही मनोरंजन मान रहे है. खबर को लुभावना बनाने के लिए जिस तरह बेसिर-पैर के तथ्य दिए जा रहे हैं लोगों की नजर में अखबार निंदा के पात्र हो चले हैं.
        
        Santosh Pathak sir, bahut sahi kaha apne.
        
        Amresh Mishra sir aapke hisab se head line kya honi chahiye thi
        
        Arun Kumar Arun आज का मीडिया भगवान से कोइ कम है क्या?
        अतिरेक में जीनेवाला हिंदी मीडिया तो अपने पाठकों
        को भी बेवकूफ ही समझता है.इएस लिए उलटी सीधी
        ख़बरें बनाता रहता है.
      
        Prafulla Kumar Tripathi Ise hi kahte hain Benchne ya Fenkne ki adbhut kala.Are hai koi mai ka lal jo bhagwan ki satta ko chunauti de sake?
        
        Harishankar Shahi ऐसी ही समझदारी की बातें छापकर तो बड़े हुआ हैं तो उसे कैसे छोड़ दें. अच्छा हुआ यह नहीं कहा कि इसी कण को भगवान कृष्ण ने यशोदा को दिखाया था. महान पत्रकारीय कर्म हैं सिर्फ प्रसार.
       
        Arun Kumar Arun ये कलम के खिलाड़ी (मीडिया) भगवान से कोइ कम है क्या?
        हिंदी के अख़बारों में आजकल अधिकांश संपादक PR एजेंट
        से ज्यादा कुछ नहीं हैं.यही हाल हिंदी न्यूज़ चैनलों का भी है.
        अतिरेक में जीनेवाला हिंदी मीडिया तो अपने पाठकों
        को भी बेवकूफ ही समझता है.इस लिए उलटी सीधी
        ख़बरें बनाता रहता है.
        
        Shivam Bhardwaj सुभाष सर, आज के समय में कलम और भाषा/शब्दों पर पकड़ रखने वाले संपादक कुछ कम हो गए हैं . अब महान संपादक लेपटॉप वाले संपादक हैं कलम वाले नहीं,इनका भाषाई ज्ञान बहुत ही महान है और अब इनका जोर सार्थक ख़बरों पर नहीं अखबार या न्यूज चैनेलों के माध्यम से मसाला ख़बरों को बेचने की ओर होता है चाहें उसके लिए किसी भी स्तर तक क्यूँ न गिरना पड़े |
       
        Shambhunath Shukla दिक्कत तो यह है कि अगर आप यह मानते हैं कि इस यह सृष्टि कभी बनी थी और एक समय के बाद नष्ट हो जाएगी तो आपको ईश्वर का वजूद मानना ही पड़ेगा। अरबों वर्ष पूर्व सृष्टि इसी गॉड पार्टिकल से बनी थी तो ईश्वर ने यकीनन उसे बनाया होगा। लेकिन यदि आप मानते हैं कि सृष्टि का विकास गोलाकार है तो सृष्टि न तो कभी बनी थी और न नष्ट होगी। दरअसल विकास का सिद्घांत आप किस तरह का मानते हैं ऋजुरेखीय या वृत्ताकार। ऋजुरेखीय है तो जो चीज कभी बनी है उसका नष्ट होना उसकी नियति है लेकिन यदि वृत्ताकार है तो वृत्त किसी के बनाए न बनता है न नष्ट होता है।
        
        Ambrish Mishra Reosa Isme media kuch bhe galat nahi likh raha hai.arbo khrbo kharch karke jo paridam bataye ja rahe hai usko aap sub ke samne rakhne ka kam media kar rahi hai jisse aap log sahi galat ka nirday kar sako.
        
        Akshay Rai vigyan aur bhagwan ka sambandh kya hai ispar vivad purana hai behas jari rehe iske liye sampadko ki bate bhi koi kam ajeeb nahi hoti
      
        Subhash Chandra Kushwaha भाई साहब , ये गदहे नहीं है, बड़े शातिर है. ये चित भी मेरी, पट भी मेरी वाले हैं. ये हर काम भागवान द्वारा हुआ बताते है, क्यों की जो लूट अपना रखे hain, शातिराना ढंग से धरती को कब्जे में किये हैं, उसे भागवान के नाम पर ही तोपते है. विज्ञान अपना काम कर रहा है. करेगा ही. कल ये कहेंगे की ये जो कर रहे हैं , हमारे यहाँ तो बरसों पहले खोजा जा चूका था. इतनी विद्वता, इतना ज्ञान इनके पास था तब भी देश की ७० प्रतिशत जनता अमानवीय हालत में है. अपने ज्ञान का कोई लाभ ये गरीबों को नहीं दे पाए. जनता में भाग्यवाद बनाये रखने वाले संपादकों की संख्या ज्यादा है.
      
        Neeraj Tiwari hmmmm.
        
        Vimal Kumar Shukla aksar dosre ki achhai achhi nahi lagti. scientist apane aap ko bhgwan hmesa se mante aa rahe hai. bade akhabar ne likh diya to isme burai kya hai.
       
        Dayanand Pandey haha
        
        Piyush Tripathi inhe sirf pranam nahi dandvat kkare ye moorkh dand vatlayak ha
        
        Vikram Adetay अरे सुभाष जी ,
        इमके ज्ञान की तो बलिहारी है , किराये के लोगों से लिखवा के छापते है , भूखा पत्रकार कितना ज्ञान देगा इन धन पशुओं को .
       
        Sumit Bajpai good
       
        Subhash Gupta patrakar to hamesha bhookha hota hai……..bach k rahna apni bhookh mitane k liye kahin tumhari undarwear na utar de…..ha ha ha
     
        Charan Singh Darbar do,nt journalism only bussines. such batnai kai Liya thank sir…
        
        Avaneesh Rai बात मुझे भी कुछ खटक रही थी, लेकिन मैं कारण नहीं खोज पा रहा था। सबसे पहले आपको जानकारी देने के लिए साधुवाद। आगे आज के संपादकों के ज्ञान की लानत मलानत।
        
        Arahul Kumar vigyan kewal isehwar ki banai cheezo ka addhayan kar raha hai, uski seema yahi se samapt ho jaati h. jeewan ki ekai kahi jaane wali cell ka sadiyo se aaj tak complleete roop se jab jankari nahi ho pai. to ishwar pure brahmand ka samawesh hai. wo padarth bhi hai, urja b hai, plasma b hai, higs boson b hai, aur b jo adrashya hai jankari me nahi h wah sabkuchh hi hai wo.
      
        Subhash Gupta arahul ji sahi kaha apne……..
        
        Navneet Dwivedi SIR AAINA DIKHANEY KE LIYE DHANYAVAD
      
        Arun Singh राय साहब ! आप ने अच्छा कहा, अब गधे पंजीरी खा रहे है,क्या करिएगा!!बस!!!
       
        Jogendra Singh nice

वरिष्‍ठ पत्रकार डा. सुभाष राय के फेसबुक वाल से साभार.

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