हिंदी के रीजनल न्यूज चैनलों का एकमात्र काम अपने राज्य के मुख्यमंत्री की जय जय कार करना

: हिंदी के क्षेत्रीय समाचार चैनलों की प्रेत बाधा : नवंबर में चार हिंदीभाषी राज्यों में विधानसभा चुनाव होंगे. २०१४ में लोकसभा और फिर कुछ राज्यों में नगर पालिका-नगर निगम के वोट डलना हैं. इसीलिये तमाम बिल्डर, 'चीटफंडी', खनन माफिया चैनल लेकर आ रहे हैं. मध्यप्रदेश में हिंदी के रीजनल चैनल दर्जन भर से ज्यादा हो गए हैं और और भी आते ही जा रहे हैं. अच्छा होता अगर इससे पत्रकारिता और पत्रकारों का कुछ भला होता लेकिन ऐसा नज़र नहीं आ रहा है.  

क्या हिंदी में क्षेत्रीय न्यूज़ चैनल का संचालन हो सकता है?  मेरा मानना है नहीं. केवल नहीं.  आप कहेंगे कि अभी हो ही रहा है तो मैं नहीं क्यों कह रहा? मेरा जवाब है कि जो भी न्यूज़ चैनल संचालित हो रहे हैं वे वास्तव में संचालित नहीं हो रहे हैं, बल्कि घिसट-घिसट कर जैसे तैसे चल रहे हैं.  अभी हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी के अपने न्यूज़ चैनल हैं ज़रूर, लेकिन उनकी दशा क्या है? उन पर क्या दिखाया जा रहा है? कितनी खबरें हैं वहां? कितने न्यूज़ बेस्ड प्रोग्राम हैं? इन तथाकथित क्षेत्रीय हिंदी न्यूज़ चैनल ने वहां के लोगों के जीवन को कितना प्रभावित किया? क्या इन चैनल पर खबरें देखकर लोग जागरूक हुए? क्या इन्होंने पत्रकारिता की धार को बदला? क्या इन चैनल ने नया टीवी पत्रकारिता का दौर शुरू किया या फिर नए नए सोच को बढ़ावा देने वाले टीवी पत्रकारों की फ़ौज खड़ी की? कितने पत्रकार इन चैनलों से देश को दिए? समाज में बदलाव की कोई कोशिश भी इन्होंने  की क्या?

हिंदी वाले क्षेत्रीय हो ही नहीं सकते

आप कहेंगे कि अभी भी उत्तर प्रदेश, उत्तराँचल, बिहार, झारखण्ड, मध्य प्रदेश, छत्तीस गढ़, एनसीआर, मुंबई, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश आदि में क्षेत्रीय न्यूज़ चैनल खूब धडल्ले से चल रहे हैं और एक दो को छोड़कर लगभग सभी डटे हैं मैदान में. जी हाँ, 'डटे' तो हैं लेकिन किस तरह? ताश के पत्तों की तरह इन चैनलों (जी हाँ, चैनलों क्योंकि यह भी हिंदी का ही शब्द बन गया है स्कूल या स्कूलों की तरह) के हेड या एडिटर्स फैंटे जा रहे हैं, कुकुरमुत्तों की तरह उग आये इन चैनलों में टीवी पत्रकारों के नाम पर कमीशन एजेंटों और दलालों की भर्तियाँ हो रही हैं. ऐसे एजेंटों और दलालों को पत्रकारिता के ठेके पर पत्रकार बनाने की धारा बह रही है कि यह यकीन कर सकना मुश्किल हो रहा है. दुखद बात यह है कि यह सब कोई चुपचाप नहीं हो रहा है. यह हो रहा है दिनदहाड़े, राजी मर्जी से. सबकी आँखों के सामने.

हिंदी अच्छी भाषा है या बुरी;  समर्थ है या असमर्थ;  इस मुद्दे पर यहाँ बात करने के बजाय मैं यह कहना चाहता हूँ कि हिंदी भाषा में क्षेत्रीय भावनाओं का ज्वार उठाने का माद्दा कभी नहीं रहा, हिंदी भाषी कितन भी कमतर क्यों न हो, इस बात को मानने को कतई  राजी नहीं हो  सकता कि उसकी सोच क्षेत्रीय है. मुझे लगता है की हिंदी में क्षेत्रीय अपील है ही नहीं, या है भी तो नाममात्र की. कारण यह है कि हम हिंदीवाले तो वसुधैव कुटुम्बम को माननेवाले है, हमारे लिए तो सम्पूर्ण विश्व ही हमारा परिवार है. विश्व नहीं तो भारत तो है ही. अगर हम हिन्दीवाले नीचे से नीचे के पायदान पर भी आयें तो भी भारत देश से कम की बात हम सोच नहीं सकते.  हम हिंदी भाषियों में क्षेत्रीयता के वे जीवाणु हैं ही नहीं, जो बांग्ला, मराठी, तमिल, तेलुगु, मलयालम आदि में हैं. इसे आप इस तरह भी मान सकते हैं कि हाँ, हमारे भीतर हमारी अपनी प्रिय भाषा के बारे में वह स्वाभिमान या दर्प नहीं हैं, या कि हम हीनता की ग्रंथि में फंसे हैं, हिंदी भाषा में बात करने में हमें गर्व होता हो या न होता हो, शर्म आती हो या नहीं आती हो, जो भी हो पर हमें यह मंज़ूर नहीं कि हम अपने छोटे से दायरे में जीयें.

हम या तो देश की बात करते हैं या फिर अपने मालवा, निमाड़, बुन्देलखंड, बघेलखंड, मेवाड़, मारवाड़, अवध, या भोजपुर आदि की. हिंदी भाषी व्यक्ति की सोच ही क्षेत्रीय नहीं है, वह एक बंगाली, मराठी, तमिल आदि भाषी की तरह एक छोटे से क्षेत्र के बारे मन सोच ही नहीं सकता. यही कारण है कि क्षेत्रीय हिंदी न्यूज़ चैनलों  को अलग से दर्शक नहीं मिल पाते हैं. जो दर्शक ग्वालियर की खबर देखना चाहता है वह झांसी और आगरा की खबर में भी दिलचस्पी रखता है और जो रायपुर की खबरें जानने का इच्छुक है वह अकेले रायपुर की खबरों से संतुष्ट नहीं. हिंदी भाषी के साथ ख़ास बात यह है की वह अपने आप को इंदौर या नागपुर या रायपुर या झांसी या इलाहाबाद से ही नहीं जोड़ता, बल्कि पूरे देश से जोड़कर देखता है. इसीलिये श्रीनगर में हुआ आतंकी हमाल भी उनके लिए महत्वपूर्ण खबर है और झाबुआ के किसी इलाके में होने वाली घटना भी.

सरकारी तंत्र के पिछलग्गू

हम जिन्हें क्षेत्रीय न्यूज़ चैनल कहते हैं वे वास्तव में हैं क्या? क्या वे अपने इलाके का सही सही प्रतिनिधत्व करते हैं? क्या वे सच्ची तस्वीर दिखाते हैं अपने इलाके की? हिंदी के ही राष्ट्रीय न्यूज़ चैनलों की तरह? इन चैनलों में भी समाचार के प्रति उनका नजरिया साफ़ नज़र आता है. वह यह कि वहां कोई भी नजरिया है ही नहीं. ये चैनल खास तौर पर अपने अपने राज्यों के मुख्यमंत्रियों के रहन रखे नज़र आते हैं.  इनका एकमात्र काम है अपने राज्य के मुख्यमंत्री की जय जय कार करना और करते ही रहना. धार में भोजशाला का विवाद चल रहा था. पुलिस लोगों पर लाठियां भांज रही थी, लेकिन एक चैनल को छोड़कर सभी क्षेत्रीय हिंदी समाचार चैनल मुख्यमंत्री की स्तुति गान वाले पेड न्यूज़ के पैकेजेस (जी हाँ, यही कहा जाता है इन्हें) दिखा रहे थे. इसमें भी कुछ क्षेत्रीय चैनल मस्ती की पाठशाला जैसे कार्यक्रम दिखा रहे थे क्योंकि प्रमुख मनोरन्जन चैनलों से टीपा गया ऐसा प्रोग्राम मुफ्त का पड़ता है और 'दर्शनीय' भी होता ही है.

दरअसल इन चैनलों के मालिकों के एजेंडे में ज़मीनें, खदानें, पावर प्लांट, बड़े उद्योग-धंधे आदि होते हैं और इनके पत्रकारों को हिदायत कि अगर सरकार के खिलाफ भी कोई खबर दिखानी हो तो कभी भी मुख्यमंत्री को निशाना न बनाने दें. सरकार पर प्रहार कारण ही पड़े तो संबंधित विभाग के मंत्री को निपटाया जाए और मुख्यमंत्री को बताया जाए कि हम आपके प्रतिस्पर्धी को निपटा रहे हैं. मुख्यमंत्री का एजेंडा ही इन चैनलों का एजेंडा है. सरकारी कृपा के अमृतपान से ही ये चैनल चल रहे हैं. यही कारण है की इन चैनलों का कोई भी सकारात्मक प्रभाव अभी तक किसी भी राज्य में नहीं देखा गया.

अन्य भाषा के रीजनल चैनलों के दशा अलग है. वहाँ कई चैनल तो सत्तासीन लोगों के अपने ही हैं.  जो उनके नहीं है, वे खुलकर सत्ता के खिलाफ हैं. वहाँ या तो  चैनल सत्ता  के पक्ष में हैं या फिर खुलकर विपक्ष में. हिन्दी में विपक्ष में तो होने का सवाल ही नही.

निम्नस्तरीय कंटेंट

साल में कुछ मौके ऐसे होते हैं जब हमारे ये चैनल गाँव-कस्बों के केबल टीवी को भी मात  दे देते हैं. ये मौके होते हैं स्वतंत्रता दिवस, दीपावली और गणतंत्र दिवस. इन उत्सवों के दौरान हर स्ट्रींगर चैनल का कमीशन एजेंट बन जाता है. उन्हें टारगेट दे दिए जाते हैं की उन्हें पूरा नहीं किया तो नौकरी' गयी समझो. इन दिनों लगभग सभी स्ट्रिंगरों के एक हाथ में माइक आइडी होता है और दूसरे हाथ में कटोरा. इन त्योहारों के मौके पर ये तथाकथित टीवी पत्रकार जनपद अध्यक्षों, जिला पंचायत के अफ़सरों, पार्षदों, डिप्टी कलक्तरों की चमचागीरी करते नज़र आते हैं. आजकल  इन पत्रकारों को कूपन देने का रिवाज है. चिट फंड कंपनियों के बड़े पद वाले   अपने टीवी पत्रकारों को ये कूपन बेचने  के लिए दे देते हैं. लालच भी दिया जाता है कि  तुम्हें इस पर पंद्रह फीसदी कमीशन मिलेगा. यानी अगर दीपावली के दिनों में दस लाख के कूपन बेच दिए तो तुम्हारे डेढ़ लाख पक्के. यह ऑफिशियल कमाई है. मैं ऐसे कई अफ़सरों को जानता हूँ, जिन्होंने ये कूपन खरीदे हैं, या बिकवाए हैं और कई ऐसे हैं जिन्होंने कहा –'' भाई, हमसे पैसे ले जाओ पर कूपन की हमें कोई ज़रूरत नहीं है.''

आम तौर पर ये चैंनल अपने पत्रकारों को पारिश्रमिक  भी  वक़्त पर  नहीं देते. जो कुछ भी देते हैं वह नाममात्र का होता है.   प्रसारित हो चुकी  खबरों के आधार पर मिलनेवाला यह मेहनताना ज़रूर मामूली होता है , लेकिन आम तौर पर बहुधन्धी  पत्रकार इन खबरों के प्रसारण पर ही जीवित होते हैं.  इसी से उनकी 'ख्याति' या लोकप्रियता होती है. आप किसी भी कस्बे के ऐसे ही पत्रकार को 'फेसबुक' पर तनकर  खड़े होकर माइक आई डी के साथ देख सकते हैं.  मध्यप्रदेश के तो छोटे – छोटे शहरों में इन टीवी पत्रकारों की सख्या 50 -60 होना मामूली बात हो गयी है. इनमें से कई चैनल तो ऐसे हैं जो प्रसारित ही नहीं होते. इनमें से कई पत्रकार तो ऐसे हैं जिनकी महीने में एक खबर भी दिखाई नहीं जाती, लेकिन ये अपने आप को  महान पत्रकार कहने में ज़रा भी गुरेज़ नहीं करते. एक पत्रकार ने तो अपने बैग में रखी चूड़ियाँ बताकर कामयाबी का सूत्र बताया कि  जब भी कहीं आंदोलन होता दिखता है,  मैं वहाँ पहुँच जाता हूँ और प्रदर्शनकारियों से कहता हूँ कि  ज़रा किसी को ये चूड़ियाँ भेंट कर दो, जिससे  विज़ुअल्स अच्छे बन जाएँ. पानी की कमी के आंदोलनों में कई बार विज़ुअल्स के लिए हम ही मटके मंगवाकर फुडवा देते हैं, कई बार दूध महँगा होने पर हमें ही दूध भी बहाकर विरोध कारण पड़ता है. यहाँ तक कि  एक बार तो शिवरात्रि के दिन मैं एक सपेरे को शिव मंदिर ले गया और वहाँ शिव लिंग के सामने  कुछ देर साँप छोड़कर विज़ुअल्स बना कर चैनल पर खबर बना दी –'' शिवरात्रि का चमत्कार!''  नाग देवता पहुँच गये शिव की आराधना में. बाद में तो मंदिर वालों का 'कारोबार' बहुत चमक गया और  वे खुद ऐसे चमत्कार दिख वाने  लग गये.

कुल मिला कर भूत-भभूत, लोटा, लंगोट, सिनेमा, क्राइम, बाबा और बॉबी के सहारे ये चैनल चल रहे है. कोई भी बौद्धिक शो यहाँ नहीं, केवल खानापूरी है. सिनेमा का शो यहाँ फिलर है. जब चैनल का ही कैमरामैन इंटरवल में ही लोगों से पूछकर आ जाता है कि फिल्म कैसी लगी.. राष्ट्रीय मुद्दों पर लाइव प्रोग्राम में रिपोर्टर के साथ खड़े लोग वहीँ के कर्मचारी, ड्राइवर, लिफ्टमैन या स्टाफर होते है. कुल मिलकर ये राष्ट्रीय चैनलों की झूठन और झूठ के सहारे जीते हैं, जिन्हें देखने या नहीं देखने से दर्शकों को कोई सूचना नहीं मिलती, कोई ज्ञान नहीं मिलता और यहाँ तक की उनका कोई मनोरंजन नहीं होता. यही कारण है कि तमान चैनल फ्लाप हो रहे हैं और उन्हें अपने खर्च निकालना ही मुश्किल हो रहा है।

राष्ट्रीय और क्षेत्रीय का फर्क

जिन क्षेत्रीय न्यूज़ चैनलों के साथ राष्ट्रीय चैनल भी हैं, वहाँ संकट  और भी गहरा है क्योंकि वहाँ तमाम अच्छे पत्रकारों को तो नेशनल चैनल में जगह मिल जाती है और दूसरे दर्जे के लोगों को रीजनल में रख दिया जाता है. जहाँ वे इनके पीर, बाबर्ची, भिस्ती, खर– सभी होते हैं. उनकी ख़ास योग्यता यही होती है कि अपने वरिष्ठों (और उनके रिश्तेदारों) की सेवा में कोई कसर न रखी जाए. जब साहब लोग दौरा करें तो उनकी सेवा में किसी भी तरह की कोई कसर न रखे. टीआरपी के खेल में भी ये अपने दर्शकों और विज्ञापनदाताओं को मूर्ख बना रहे हैं. दस लाख से बड़े शहर में टीआरपी में नंबर वन, एक लाख तक के शहरों में टीआरपी में नंबर वन, इतने बड़े शहरों में जीआरपी  में नंबर वन, यहाँ जीआरपी में नंबर वन — ये इस तरह दर्शकों को भरमाते हैं कि हर चैनल पर यही दावा नज़र आता. दरअसल इन चैनलों के सामने समस्या यह है की वे किसे अपने दर्शकों को दिखाएँ और किसे न दिखाएँ. उन्हें यह भी नहीं समझ में आ रहा की उनका दर्शक जीआरपी और टीआरपी का चक्कर नहीं समझता . मजेदार बात तो यह है कि इन चैनलों के करता धर्ता भी नहीं जानते कि यह क्या है?

लेखक प्रकाश हिंदुस्तानी वरिष्ठ पत्रकार हैं और इंदौर के निवासी हैं. उनका यह लिखा लोहिया अध्ययन केन्द्र, नागपुर से प्रकाश दुबे द्वारा सम्पादित 'सामान्यजन संदेश' के विशेष सौवें अंक में प्रकाशित हो चुका है. वहीं से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया जा रहा है. प्रकाश हिंदुस्तानी से संपर्क 09893051400 या prakashhindustani@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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