हिंदी चैनल की पत्रकार होती तो खुद रुक जाती या रोक दी जाती

Vikas Mishra : आज ऐसे ही दफ्तर में मैंने कहा- ''बहुत हो गया तेजपाल-तेजपाल..। कितने तेजपाल मुंह पोंछकर बैठे हैं, और एक बेचारा फंस गया तो पीछे ही पड़ गए हैं, जैसे वही एक दरिंदा है। तेजपाल को फांसी दे देने के बाद देश की सारी लड़कियां सुरक्षित हो जाएंगी क्या? चलो तेजपाल को सपोर्ट किया जाए..।'' मेरे ही बगल में थीं हमारी चैनल की एक ऐंकर। उन्होंने कहा- ''एक को तो भीतर जाने दीजिए… क्या जरूरी है कि ये भी इस नाते बच जाए कि बाकी सारे बच गए थे..।'' क्या कहें आपसे… उनके इस जवाब से मैं लाजवाब हो गया।

Namita Pathak : मैं सोच रही थी कोई। हिंदी चैनल की पत्रकार होती तो भी क्या बात इतने आगे तक बढ़ पाती। शायद नहीं…

Vikas Mishra : Namita Pathak उससे बड़ा सच ये है कि हिंदी चैनल की पत्रकार होती तो इतना आगे बात बढ़ा भी नहीं पाती। खुद रुक जाती या रोक दी जाती।

पत्रकार विकास मिश्रा के फेसबुक वॉल से.

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