हिंदी पट्टी की ड्रामेबाजी

Mayank Saxena : लखनऊ में कई रिश्तेदार और परिचित हैरान हैं कि मेरे जैसे कई पागल नौकरी और पढ़ाई छोड़ कर उम्मीद उत्तराखंड Ummeed Uttarakhand में जुड़ गए हैं… बूंद Boond की कहानी और सफलता के बारे में वो पहली बार में यक़ीन ही नहीं कर पाते हैं…उसके बाद अंत में कह देते हैं कि सबका अपना कोई न कोई फ़ायदा होता है तभी लोग जुड़ते हैं… दरअसल हिंदी पट्टी की एक खासियत और कुंठा है…जो काम करने का नैतिक साहस लोगों में नहीं होता वो कोई और करने की सोचता है तो पहले वो कहते हैं कि ये काम हो ही नहीं सकता…फिर वो कहते हैं कि इससे तुम्हारा नुकसान होगा…उसके बाद वो आपके काम को ड्रामा बताते हैं…फिर वो आपकी बुराई करने लगते हैं…

तदोपरांत वो कहते हैं कि आपके अच्छे काम में वो आपके साथ हैं लेकिन आप बहुत दूर तक नहीं जा पाएंगे….और आखिरी में वो आपके सारे काम को खारिज कर के कह डालते हैं कि इसमें आप सबका कोई न कोई निजी हित होगा…बिना स्वार्थ कुछ नहीं होता… हां, मैं स्वार्थी हूं…हम सब स्वार्थी हैं…हम चाहते हैं कि दुनिया और ख़ूबसूरत हो…उतनी जितनी कि हम किताबों में पढ़ते और ख्वाबों में देखते हैं… बूंद के साथियों, मददग़ारों और हौसला बढ़ाने वालों…आपको सलाम…दुनिया तुम को रोज़ उकसाने और लड़ने की हिम्मत देने का शुक्रिया… ज़िंदाबाद!

पत्रकार मयंक सक्सेना के फेसबुक वॉल से.

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