हिंदी पत्रकारों के राजनेताओं के साथ संपर्क बनाने की शुरुआत दिनमान के श्रीकांत वर्मा ने ही की थी

Pramod Joshi : तहलका की राजनीतिक पृष्ठभूमि पर संशय कभी नहीं था। तरुण तेजपाल के साथ उच्चभ्रू पत्रकारों की एक टोली थी, जिनके साथ बड़े राजनेताओं और कारोबारियों के रिश्ते थे। कपिल सिब्बल ने स्वीकार किया है कि उन्होंने तेजपाल की मदद में एक राशि दी, बावजूद इसके कि वे उनसे परिचित नहीं थे। हाँ एक कारण यह हो सकता है कि एनडीए सरकार के उस दौर में तेजपाल को मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा था। ऐसे में कांग्रेस से जुड़े राजनेताओं ने उनकी मदद की तो गलत कुछ नहीं किया। इस प्रकार की पक्षधरता वाली पत्रकारिता भी पत्रकारिता ही है। और तहलका ने अनेक अच्छी रिपोर्टों को प्रकाशित किया।

तेजपाल के व्यक्तिगत आचरण के कारण संस्थान को नष्ट नहीं होना चाहिए। जहाँ तक तहलका या तेजपाल के नैतिक पक्ष की बात है, वह दूसरी तरफ है। पवित्रतावादी या दूध का धुला होना भी एक भ्रम है। सच यह है कि कोई अत्यंत पवित्र भाव से दाएं-बाएं देखे बगैर सत्य की राह पर चलने वाला अखबार निकालने की कोशिश करे तो उसे न तो किसी राजनेता से चंदा मिलेगा और न कोई निवेशक उसपर पैसा लगाएगा। तहलका जैसी कुछ पत्रिकाएं अंग्रेजी में हों या न हों, हिंदी में ज़रूर होनी चाहिए। ज़रूरी नहीं कि सबका मिज़ाज तहलका जैसा हो। हिंदी में दिनमान साधारण पत्रिका थी, उसमें सनसनी का तत्व नहीं था। पर उसने ऐसे समय में जब हिंदी के पाठक को जागृत विश्व से जोड़ने की ज़रूरत थी, सार्थक काम किया। हिंदी पत्रकारों के राजनेताओं के साथ संपर्क बनाने की शुरूआत दिनमान के श्रीकांत वर्मा ने ही की थी।
दिनमान को उसके मालिकों ने कारोबारी कारणों से चलाना उचित नहीं समझा। उसके मुकाबले रविवार में सनसनी थी और उसके पत्रकारों के भीतर राजनेताओं से याराना रखने की प्रवृत्ति थी। उसकी प्रकृति वैश्विक या सार्वभौमिक नहीं थी। पर अच्छी नेटवर्किंग न हो पाने के कारण वह नहीं चली। इंडिया टुडे के पास साधन और नेटवर्क है। कभी-कभार वह अच्छी सामग्री देती है, पर उसकी कारोबारी समझ उसे हल्का बनाती है। हिंदी आउटलुक खराब नेतृत्व के कारण कभी महत्वपूर्ण नहीं बन पाया। हिंदी में दिल्ली प्रेस जैसा संस्थान है, जिसने हिंदी की सफल पत्रिकाएं निकाली और मेरे विचार से पत्रिकाओं के मामले में देश का सबसे बड़ा संस्थान है। पर उसने सरिता के दायरे को बढ़ाने की कोशिश नहीं की। कुछ समय पहले ऐसा लगा कि शायद वह रास्ता बदल रही है, पर वह अनुमान गलत साबित हुआ। इसके विपरीत इस संस्थान ने कैरेवान को महत्वपूर्ण पत्रिका बनाने में कामयाबी हासिल की।

पत्रिकाओं के मामले में ओपन और संडे इंडियन का जिक्र भी होना चाहिए। ओपन पर अच्छा निवेश हुआ है और वह सफल भी है। संडे इंडियन जल्दबाज़ी और अस्पष्ट फोकस का शिकार हुई। हिंदी में सार्थक पत्रकारिता की ज़रूरत है, पर निवेशकों और प्रकाशकों की ओर से आशा की किरण नज़र नहीं आती। हिंदी के दैनिक अखबार विचार, सूचना और संवाद का जैसा कचूमर निकाल रहे हैं, उसपर विस्तार से तथ्यों के साथ लिखने का मन कर रहा है।

वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी के फेसबुक वॉल से.

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