हिंदुस्तान अखबार की ये खबरें क्या विज्ञापन नहीं, क्या पेड न्यूज नहीं!

किसी शहर में अपनी फिल्म की प्रमोशन को आए सितारों की मीडिया कवरेज यों तो कोई खास बात नहीं। यह एक नियमित कवरेज होता है, सितारों के कद की हैसियत के अनुरूप उन्हें जगह मिलती है। लेकिन यह यानी मीडिया कवरेज खास तब हो जाता है या यों कहें कि कर दिया जाता है, जब उन सितारों के इस व्यवसायिक दौरे को ही शहर का कोई एक खास अखबार अपना दो चार पन्ना दिल खोल के दे देता है। वह भी सिर्फ इसलिए कि वे सितारे उस पत्र के कार्यालय पहुंच कर उसकी शोभा बढ़ाते हैं।

एवज में उस फिल्मी सितारा या उन सितारों को तस्वीरों और खबरों के मार्फत पत्र में दिल खोल के जगह दी जाती है। छत पे, गलियारे में भीड़ का अभिवादन करते, हाथ हिलाते, भीड़, कार्यालय की, बड़ी बड़ी कई तस्वीरें, कुछ पंक्तियां खबर – दो चार पन्ने तो भर ही दिए जाते हैं।

और उनकी फिल्म का प्रमोशन तो हो ही गया मुफ्त में। या कहें कि विज्ञापन कर दिया गया। सवाल यह उठता है कि तो क्या यह मीडिया कवरेज एक तरह से फिल्म का विज्ञापन नहीं हुआ? क्या यह पेड न्यूज नहीं?

या कि पेड न्यूज सिर्फ राजनीतिक मामलों में ही हो सकता है- ऐसा हम समझते हैं। या फिर पाठकों के हिस्से की खबरों के बदले इन अखबारों में से ये बेकार दो से चार पन्ने जनसंपर्क पत्रकारिता मानकर हमें उसे अनदेखा कर देना चाहिए? और अगर सचमुच ही इतनी जगह देने के लिए किसी खास अखबार को बदले में कुछ सहयोग राशि दी गई है तो इन खबरों को विज्ञापन कह कर नहीं छापा जाना चाहिए ? यहां शंका की गुंजाइश और बढ़ जाती है, जब शहर के अन्य पत्र सितारों के इस व्यवसायिक दौरे की कवरेज नियमित या मामूली तौर पर करते हैं।

दिलचस्प यह भी है कि शहर में अपने फिल्मों के प्रमोशन के लिए अक्सर विभिन्न सितारों का इस तरह का व्यवसायिक दौरा होता रहता है। और हर बार शहर के प्रमुख तीन- चार पत्रों में इनको ‘हाइजेक’ करने की होड़ मची रहती है। हर बार एक खास पत्र किसी सितारे के दौरे को ‘हाइजेक’ कर उसे दिल खोलकर कवरेज देते हैं। और यह सब होता है पाठकों के हिस्से की अन्य खबरों को मारकर। आखिर पाठक ऐसी विज्ञापनों के लिए ही तो सिर्फ कोई अखबार नहीं खरीदता!

लीना की रिपोर्ट.

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