‘हिंदुस्तान’ अखबार में संपादक महज एक दिखाऊ पोस्ट थी

: पत्रकारिता के संस्मरण – (चार) : १९८० के दशक को पत्रकारिता का स्वर्ण काल कहा जा सकता है। दशक की शुरुआत में ही इंदिरा गांधी का पुन: राज्यारोहण हो चुका था और गैर कांग्रेसी सरकारों से लोगों का मोहभंग होने लगा था। लेकिन इस बार सदैव से सोवियत संघ के पाले में रहीं इंदिरा गांधी का झुकाव अमेरिका की तरफ बढ़ चला था और संजय गांधी राजनीति में सबसे ताकतवर इंसान थे। संजय के चलते दक्षिणपंथी राजनीति अचानक इंदिरा गांधी के प्रति उदार हो उठी थी। लेकिन संजय गांधी भरोसेमंद नहीं थे। वे एक आक्रामक और तत्काल फल चाहने वाले राजनेता थे। तथा हर तरह का जोखिम उठाने को तत्पर। वे कांग्रेस के परंपरागत वोट बैंक ब्राह्मण, तुर्क व दलित के समीकरण को ध्वस्त करते चल रहे थे।

इमरजेंसी के दौरान दिल्ली के तुर्कमान गेट की मुस्लिम आबादी को जिस तरह उन्होंने उजाड़ डाला था उससे आरएसएस समर्थक तबका तो खुश था लेकिन उदार और लेफ्ट तबका कन्फ्यूज्ड। संजय ने तेजी दिखाई और राज्यों की सरकारें ताबड़तोड़ गिरानी शुरू कर दीं। उनके पहले निशाने पर हिंदी राज्य रहे। यूपी, एमपी, राजस्थान, बिहार और हरियाणा में सरकारें गिराई गईं और वहां फिर से कांग्रेसी सरकारें फिर आ गईं। पर इस बार मुख्यमंत्री भी कांग्रेस के परंपरागत वोट बैंक से नहीं बने। यूपी में एक पूर्व राजा वीपी सिंह इसी तरह मध्यप्रदेश में अर्जुन सिंह, राजस्थान में पहले जगन्नाथ पहाडिय़ा को बनाया गया लेकिन जल्द ही उन्हें अपदस्थ कर शिवचरण माथुर नए मुख्यमंत्री बने। हरियाणा में भजन लाल को बनाया गया। पर उसी साल २३ जून को एक छोटा प्लेन उड़ाते वक्त दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई।

कांग्रेस के सारे प्रांतों के मुख्यमंत्री नाकारा साबित हुए। वजह यह थी कि हिंदी राज्यों में एक नई राजनीति पग रही थी और वह थी मध्यवर्ती और पिछड़ी कही जाने वाली जातियों को नव उभार। दूसरी तरफ पंजाब और कश्मीर में आतंकवाद पनपने लगा था। पंजाब में सिख आतंकवाद इस तरह चरम पर था कि वहां से हिंदू पलायन करने लगे थे और कश्मीर से पंडित भगाए जाने लगे। इंदिरा गांधी का सोवियत लाबी से अलग होना उन्हें अनवरत कमजोर कर रहा था। देश में पूंजीवाद एक नए रूप में उभर रहा था जो कोटा कंट्रोल पद्धति से भिन्न था और पूंजीपति लगातार बेलगाम होते जा रहे थे। ट्रेड यूनियन्स कमजोर पड़ती जा रही थीं तथा आजादी के बाद से राजनीति व अर्थनीति के बाबत बनाई गई सारी मर्यादाएं तार-तार हो रही थीं।

यह वह समय था कि जिसे जो कुछ बेचना हो बाजार में आए और बेचे। मीडिया एक प्रोडक्ट के रूप में सामने आ रहा था। उसकी सारी आक्रामकता और खबरें अब एक प्रोडक्ट को बाजार में लांच करने की हमलावर शैली जैसी थीं। इंडियन एक्सप्रेस में अरुण शौरी ने आकर देश के उस बाजार को पकड़ा जो अभी तक अछूता था। पहली बार भागलपुर आंख फोड़ो कांड को कवर कराया गया जहां कुछ सवर्ण पुलिस अफसरों ने पिछड़ी जाति के अपराधियों की आंखें तेजाब डालकर या सूजा घुसेड़कर फोड़ डाली थीं। इसी तरह उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अंतुले के कारनामों पर हमला बोला। इसी दौरान हुई मीनाक्षीपुरम की वह घटना जिसने सारे हिंदू समाज को स्तब्ध कर दिया। मीनाक्षी पुरम के दलितों के एक बड़े हिस्से ने धर्म परिवर्तन कर इस्लाम अपना लिया। पर हिंदी के अखबार इन सब खबरों से अनजान थे और अक्सर अरुण शौरी की इंडियन एक्सप्रेस में छपी रपटों को हिंदी में अनुवाद कर छापा करते थे।

ऐसे समय में इंडियन एक्सप्रेस समूह ने हिंदी का नया अखबार निकाला जनसत्ता। तब तक दिल्ली में दो ही हिंदी के अखबार अपनी पैठ बनाए थे। टाइम्स आफ इंडिया समूह का नवभारत टाइम्स और हिंदुस्तान टाइम्स का हिंदी हिंदुस्तान। इसमें से हिंदुस्तान में तो रंचमात्र पत्रकारीय स्पंदन नहीं था। उसके संपादक विनोद कुमार मिश्र की स्थिति तो यह भी नहीं थी कि वे किसी उप संपादक अथवा किसी रिपोर्टर तक को भरती कर सकें। सारी भरतियां उसके कार्यकारी निदेशक नरेश मोहन करते। संपादक महज एक दिखाऊ पोस्ट थी। नवभारत टाइम्स में स्थिति कुछ अलग थी। उसके प्रबंधन ने अस्सी के बदलाव को पहचान लिया था और प्रबंधन के अपने कृपापात्र संपादकों की फौज हटाकर पहली दफे एक तेज तर्राक पत्रकार राजेंद्र माथुर को संपादक बनाया गया।

राजेंद्र माथुर मूलत: आगरा के थे और इंदौर जाकर बस गए थे। वे वहां पहले अंग्रेजी के प्राध्यापक रहे थे और फिर नई दुनिया के स्थानीय संपादक। राजेंद्र माथुर ने आते ही नवभारत टाइम्स का कलेवर बदल दिया और माथुर साहब ने उसे पाठकों से जोड़ा। उनके संपादकीय के लोग इस कदर दीवाने थे कि नवभारत टाइम्स की खबरों की बजाय उसके लेख पढ़े जाने लगे और माथुर साहब के संपादकीय तथा लेख। माथुर साहब की राजनीतिक समझ नेहरू जमाने की थी और उनकी मान्यताएं भी। पत्रकारिता में पुराने पर नवीन दिखने वाली इस मान्यता को खूब स्वीकार्यता मिली। पर जनसत्ता ने तो आते ही तहलका मचा दिया।

जनसत्ता की इस सफलता के दो कारण थे। एक तो इसके संपादक प्रभाष जी ने बाजार को खूब समझा और दूसरे हिंदी पत्रकारिता की सड़ी-गली आर्य समाजी नैतिकता से बोली और भाषा को निकाला। उन्होंने कठिन और आर्यसमाजी हिंदी को दिल्ली और पास के हिंदी राज्यों के अनुरूप सहज और उर्दूनुमा हिंदी को मानक बनाया। बाजार के अनुरूप उन्होंने उस समय पंजाब में लगी आग को मुद्दा बनाया और वहां से भाग रहे हिंदुओं के लिए जनसत्ता संबल बना तथा यूपी और बिहार में हिंदी को संकीर्ण बनाने वाले मानक तोड़ डाले। नतीजा यह हुआ कि हर वह व्यक्ति जनसत्ता का मुरीद हो गया जो अंदर से नए बाजारवाद का समर्थक था तथा उसके अंदर जेपी की समग्र क्रांति को लेकर कहीं न कहीं एक नरम भाव था। बाजार के इस नए लोकप्रिय और तथाकथित जनप्रियता का यह एक नया पैमाना था।

साल 1984। वे जून के तपते हुए दिन थे। अमृतसर का मौसम सर्दी में जितना जमा देने वाला होता है गर्मी में उतना ही गरम। लू के थपेड़ों के चलते दूकानें सूनी थीं और पीतल के बड़े-बड़े कलसों में दूध ले जाने वाले दूधिए सिख अपनी साइकिलों से बाघा बार्डर की तरफ बढ़े चले जा रहे थे। रास्ते में सेना, बीएसएफ और सीआरपी का लश्कर पूरी तरह से चाक-चौबंद होकर बढ़ रहा था। सीमा का इलाका, इसे उन्होंने एक सामान्य घटना ही समझा। लेकिन दोपहर 12.40 तक इन सेना के आदेश पर अर्धसैनिक बलों ने गुरु रामदास लंगर पर फायरिंग शुरू कर दी। आठ लोग मारे गए तो पता चला कि यहां हरमंदिर साहब में आपरेशन ब्लू स्टार आपरेशन शुरू हो चुका है। दिल्ली का माहौल भी गर्म हो चला था। किसी की समझ में नहीं आया कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने यह कौन सा कदम उठा लिया। कनाट प्लेस में सिखों की दूकानें धड़ाधड़ बंद हो गईं और राजधानी के गुरद्वारा सीसगंज समेत सभी ऐतिहासिक गुरुद्वारों में मुर्दनी छा गई। हर सिख शोक और क्षोभ में डूबा था। सिखी का इतिहास वीरता और उदारता का रहा है। उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह क्या हो गया।

लगभग एक हफ्ते तक आपरेशन चला और अकाल तख्त पूरी तरह कब्जा हो जाने के बाद ही आपरेशन खत्म हुआ। कुछ लोगों की नजर में प्रधानमंत्री का यह कदम बेहद वीरतापूर्ण था क्योंकि सिख खाड़कुओं पर कब्जा पाने का यही अकेला और अंतिम इलाज था। लेकिन सिख इसे क्रूर सामंती कार्रवाई मान रहे थे। उन्हें लगता था कि वे मानों एकाएक 17 वीं सदी में भेज दिए गए। इंदिरा गांधी की इस कार्रवाई का चौधरी चरण सिंह समेत सारे आर्य समाजी राजनेताओं ने समर्थन किया था। इतनी बड़ी घटना हो जाने के बाद भी सिखों के अलावा किसी भी धार्मिक समुदाय के नेता अथवा विपक्ष के राजनेता ने कोई प्रतिक्रिया नहीं जताई ऐसा लग रहा था कि वे सभी भी ऐसे ही किसी कदम की अपेक्षा कर रहे थे। लेकिन अंदर ही अंदर सिख समुदाय इससे बुरी तरह आहत हुआ और देश की आंतरिक सुरक्षा देख रही एजेंसियां इसे समझ नहीं पाईं। हिंदी के सारे अखबार भी इस आग में घी ही डाल रहे थे। एक भी अखबार ने इस घटना का विरोध नहीं किया। ऐसे मौके पर प्रभाष जोशी ने सिखों के मर्म को समझा और उन्होंने इस कांड का विरोध किया तथा सिखों के क्षोभ से भरे लेख छापे गए।

ऐसे में जनसत्ता अचानक सिखों का अखबार कहा जाने लगा और यह माना गया कि व्यवस्था व सरकार का विरोध करने की क्षमता सिर्फ जनसत्ता में ही है। उधर जनसत्ता सिखों का प्रिय अखबार बन गया और जनसत्ता खरीदने के लिए पंजाब के दूर दराज के गांवों में सिखों ने हिंदी सीखी। अपने जन्म के कुल छह महीनों के भीतर ही इस अखबार की प्रसार संख्या ढाई लाख पार कर चुकी थी। प्रभाष जी के लेख पढऩे के लिए लोग इंतजार करते और दिल्ली के आसपास का सारा इलाका जनसत्ता की बढ़त के बोझ के तले दबा था। दिल्ली से छपने वाला जनसत्ता बीकानेर और जैसलमेर के रेतीले इलाकों में तीसरे दिन पहुंचता और अमृतसर के गांवों में भी लेकिन लोगबाग बस अड्डों पर इंतजार करते या सांडनियों का जिनके जरिए जनसत्ता वहां पहुंचाया जाता।

पर अखबार सिर्फ संपादकीय विभाग के बूते नहीं चलता। वह मार्केट के बूते चलता है और मार्केट जनसत्ता का विरोधी होता चला गया। इसके संपादक प्रभाष जोशी को अखबार को बढ़ाने में तो सफल रहे लेकिन रेवेन्यू उगाहने में नहीं। यह सब 1984 से ही साफ होने लगा था। इस वजह से इसकी प्रसार संख्या घटाई जाने लगी। यह शायद पहला अखबार था जिसके संपादक प्रभाष जोशी ने पहले पेज पर अपनी बात लिखी जिसमें कहा कि पाठक गण कृपया जनसत्ता मिल बांट कर पढ़ें क्योंकि अब और ज्यादा इसे छाप सकने की हमारे प्रबंधन की क्षमता नहीं है।

मैं कई बार सोचता हूं कि हिंसा का जवाब हिंसा नहीं होती। हम किसी को भी प्यार और दुलार से समझा सकते हैं लेकिन इसके लिए धैर्य चाहिए, साहस चाहिए और निडरता भी। १९८४ का जवाब १९८४ और फिर १९८४ नहीं था। लेकिन तीन बार यह दुर्घटना घटी। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को उनके ही दो अंगरक्षकों ने आपरेशन ब्लू स्टार के पांच महीने के भीतर ही मार दिया। उस इंदिरा गांधी को जिनके बारे में हम रोज अखबारों और रेडियो पर प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी उवाच इतनी बार सुन चुके थे कि हमें कभी यह लगा ही नहीं कि इंदिरा गांधी को जाना भी पड़ सकता है। एक सर्वशक्तिशाली महिला जिसने राजाओं के ताज छीन लिए और पूंजीपतियों से उनके बैंक। वह महिला जिसके बारे में कहा जाता था कि 'इंदिरा बहिन का है राजरानी, प्यासा न पावै हिन कहूं पानी।' इंदिराजी के ऐसे अलौकिक गुणों को हम सब इतनी बार सुन चुके थे कि हमें यह सूचना एक अफवाह सी लगी।

लेकिन ३१ अक्टूबर को सुबह ११ बजे जब मैं एक्सप्रेस बिल्डिंग पहुंचा और यह बताया गया कि इंदिरा गांधी को किसी ने गोली मार दी है तो कुछ समझ ही नहीं आया। ऐसा कैसे हो सकता है? छठे दरजे में पढ़ता था जब इंदिरा जी प्रधानमंत्री बनी थीं और सारी पढ़ाई व आवारगी पूरी कर नौकरी भी करने लगा लेकिन कभी यह लगा ही नहीं कि इंदिरा जी इस देश की मायने नहीं हैं। भले बीच में मोरार जी देसाई तथा चरण सिंह प्रधानमंत्री रहे हों पर हरदम लगा यही कि अरे ये तो पिन्नी टाइप के नेता हैं जिनकी इंदिरा गांधी को देखते ही फूंक सरक जाया करती थी। चरण सिंह जब गृह मंत्री थे तो इंदिरा जी को गिरफ्तार करने की योजना बनाई। इंदिरा जी जाकर एक पुलिया पर धरने पर बैठ गईं तो खुद यही नेता उन्हें मनाने गए कि बहिन जी आप घर जाओ। कोई आपको नहीं पकड़ेगा। एक ऐसी महिला को कोई मार सकता है भला।

लेकिन वह अफवाह नहीं थी और सच था। बाद में पता चला कि उन्हें गोली मारने वाले उनके सिख अंगरक्षक बेअंत सिंह और सतवंत सिंह थे। मजे की बात कि इन्हें इंदिरा जी के अंगरक्षक पद से हटाने का दबाव था पर इंदिरा जी ने ऐसा नहीं होने दिया। कुछ ही देर बाद चारों ओर अंधेरा छा गया। अक्टूबर की धूप के बावजूद सूरज दोपहर में ही ढल गया। बताया गया कि जून में हुए आपरेशन ब्लू स्टार का बदला था लेकिन इसके बाद जो कुछ हुआ वह सोचा तक नहीं गया था। एक पूरी कौम को निशाना बनाकर हमला किया गया।

इस खूरेंजी में हिंदू मुसलमान दोनों ही बराबर के शरीक थे। यहां इंदिरा जी की हत्या का बदला कम लूट की बहुतायत थी। सिख एक मेहनतकश संपन्न कौम रही है। उनके पास पैसा था और उस जमाने में ऐसी-ऐसी चीजें लूटी गईं जो आम मध्यवर्ग कल्पना नहीं कर सकता था। पूरी दिल्ली समेत सारे हिंदी भाषी इलाकों में सिखों के घरों को लूटा जाने लगा। और बूढ़े व बच्चों समेत सभी मर्दों की हत्या का खूनी खेल शुरू हो गया। यह कोई दंगा नहीं था बल्कि हिंदुओं और मुसलमानों, खासकर हिंदी भाषी इलाकों के, की कुंठा थी। आलसी और मूर्ख लोगों का हुजूम सिखों को लूट रहा था और जो लोग कुछ कर सकते थे वह इसे निस्सहाय से देख रहे थे। लाशों की सड़न से दिल्ली गंधा रही थी। अखबार चुप थे लेकिन जनसत्ता नहीं। आलोक तोमर ने ऐसे-ऐसे तमाम घर ढूंढ़ निकाले जहां सिर्फ विधवाएं बची थीं। नौनिहाल शिशु बचे थे या सिर्फ खंडहर। ऐसा लगता था कि राजधानी में सिख कौम खत्म कर दी गई है। एक सभ्य देश की राजधानी का यह आलम दुखद था।

इंदिरा जी के बेटे राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनाया गया जो अभी कुछ साल पहले तक सिर्फ जहाज उड़ाया करते थे। इंदिरा गांधी ने अपने छोटे बेटे संजय की आकस्मिक मौत के बाद उन्हें सहारे के लिए अपने साथ किया हुआ था। तब कैबिनेट में वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी वरिष्ठतम थे लेकिन उन्हें मौका नहीं देकर राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनवा दिया। राजीव घाघ राजनेता नहीं थे। भोलाभाला चेहरा और राजनीति के चौसर में एकदम सिफर। राजीव प्रधानमंत्री बने तो कारपोरेट हाउसेज ने उन्हें हाथोंहाथ लिया था। यहां तक कि इंडियन एक्सप्रेस समूह ने भी। राजीव गांधी के विरुद्ध तब कोई संपादकीय नहीं छप सकता था। और जनसत्ता में जब ऐसा ही एक संपादकीय उस समय के एक सहायक संपादक, जो सर्वोदयी थे, ने लिखा तो उसे रोक लिया गया। यह उन्हें बहुत अपमानजनक लगा और उन्होंने इस्तीफा दे दिया तथा दफ्तर आना बंद कर दिया। लेकिन यह प्रभाष जी का बड़प्पन था कि उन संपादक के घर गए और उनका इस्तीफा वापस करवा कर ही मानें।

…जारी…

लेखक शंभूनाथ शुक्ला वरिष्ठ पत्रकार हैं. जनसत्ता, अमर उजाला, दैनिक जागरण समेत कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. पत्रकारीय जीवन का अपना संस्मरण वह अपने फेसबुक वॉल पर प्रकाशित कर रहे हैं.


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धक्का देने पर राजीव शुक्ला ने तब जवाब दिया- 'प्रभाष जोशी से पूछो'

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