हिंदुस्‍तानी जबरदस्‍ती : आओ राजनीति करें या तो खेल बिगाड़ें

इलाकाई दबंगई कायम रखने में अपराधी या नेता ही नहीं, बुद्धिजीवियों का चश्मा कहे जाने वाले अखबार भी पीछे नहीं है। बुलंदशहर में "हिन्दुस्तान" अखबार के पत्रकारों ने मतदाता जागरूकता अभियान के तहत खेले गये एक मैत्री मैच में इसी संकुचित मानसिकता का परिचय दिया है। जिलाधिकारी बुलंदशहर के बेहतर प्रयासों के अन्तर्गत काफी समय के बाद बुलंदशहर के यमुनापुरम स्टेडियम में जिला प्रशासन और पत्रकारों के बीच एक मैत्री मैच का आयोजन किया गया जिसका मकसद था.. जिले में मतदाताओं को मतदान के लिए प्रोत्साहित करना।

मकसद बड़ा था सो इस मैच में मुख्य अतिथि और प्रशासन एकादश की टीम के कप्तान बने मेरठ मंडल के कमिश्नर भुवनेश कुमार। कई दिनों से इस मैच को सफल बनाने की कवायद जिलाधिकारी कामिनी चौहान रतन द्वारा की जा रही थी और इसी प्रयास में जिला प्रशासन ने पहले से ही पत्रकार संघ की टीम के खिलाड़ियों के नामों की सूची ले ली। तय नियमों के मुताबिक 'हिन्दु्स्तान', 'अमर उजाला' और 'दैनिक जागरण' से प्रति बैनर दो खिलाड़ियों का लेना तय हुआ था और जिला प्रशासन को खिलाड़ियों की सूची भी उसी हिसाब से प्रेषित की गई थी। लेकिन मैदान के बीचों-बीच और दर्शकों से भरे मैदान में 'हिन्दु्स्तान के पत्रकारों' ने बबाल काटना शुरू कर दिया। 'हिन्दुस्तान' की ओर से तीन पत्रकार खिलाड़ी बनने पर तुले थे।

बुलंदशहर में ऐसा पहली बार हुआ था कि कमिश्नर किसी टीम के कप्तान हो और मैच के मुख्य अतिथि भी। शायद कमिश्नर के साथ खेलने के लालच में 'हिन्दुस्तान के पत्रकारों' ने हंगामा शुरू कर दिया। पहले तो पत्रकारों में आपसी तनातनी हुई और फिर उसके बाद जिला सूचना अधिकारी को 'हिन्दुस्तान के पत्रकारों' ने निशाने पर लेकर उनके साथ भरे मैदान में सबके सामने आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग किया और बदसलूकी की। लेकिन बाकी पत्रकार भी अड़े थे, इसलिए 'हिन्दुस्तान के पत्रकारों' की गुन्डई नही चल सकी। सारा वाक्या 'हिन्दुस्तान' के ब्यूरोचीफ निशांत के सामने हुआ, लेकिन उन्होंने अपने साथियों को हंगामा करने से नहीं रोका। बाद में 'हिन्दुस्तान' के पत्रकार मैच का वायकाट करके मैदान से निकल लिये।

मैच हुआ और शानदार हुआ। छोटे से स्टेडियम में करीब 2000 से ज्यादा लोग दर्शक बने और जमकर मैच का लुत्फ उठाया। इसके अलावा जिला प्रशासन मतदाता जागरूकता के अपने मकसद में भी सफल रहा। असल बात शुरू हुई रविवार को। 'हिन्दुस्तान' अखबार के पत्रकारों ने अपनी निजी खुन्नस के चलते अखबार में इतने बड़े आयोजन की खबर नहीं छापी। जबकि 'अमर उजाला' औऱ 'दैनिक जागरण' में यही खबर मंडल संस्करणों में छापी गई है। सवाल यह है कि लोकतन्त्र के महायज्ञ में भागीदारी के लिए निजी स्वार्थ बड़ा है या अभियान का मकसद? 'हिन्दुस्तान' के पाठकों का विश्वास बड़ा है या उस विश्वास को तोड़ने वाले पत्रकारों की निजी राजनीति?

सब जानते है कि विधानसभा चुनाव में मतदाता जागरूकता बढ़े, वोट प्रतिशत बढ़े, इस अभियान को देश में सबसे पहले 'हिन्दुस्तान' ने चलाया और उस अभियान के अग्रदूत बने हिन्दुस्तान के प्रधान संपादक शशिशेखर। 'हिन्दुस्तान' बुलंदशहर भी कई बार अपने कार्यालय में गोष्ठियों का आयोजन कराकर एक-एक पन्ने की खबरें छापता रहा है। सवाल ये है कि जो इस आंदोलन के अग्रदूत है, वही अपने निजी स्वार्थ के लिए अखबार की छवि बिगाड़ने में लग गये? आखिर यह मानसिकता कितनी उचित है? अखबार की छवि, लोकप्रियता और पाठकों का विश्वास, 'हिन्दुस्तान के पत्रकारों' की आपसी राजनीति, गुडंई और दबंगई से छोटे हो गये और लोकतन्त्र में अपनी बात कहने के लिए जाने जाने वाले अखबार में मतदाता जागरूकता अभियान की आवाज को कुचल दिया गया।

पत्रकारों के लिए किसी मैच में खेलना ज्यादा महत्वपूर्ण है या उस मैच के पवित्र मकसद को जन-जन तक पहुँचाना? हिन्दुस्तान अखबार के पत्रकार बड़े क्रिकेटर है या ईमानदार पत्रकार। खबर नहीं छपी, ये बहुत बड़ी बात नहीं, लेकिन नैतिक मूल्यों और सामाजिकता की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले पत्रकार छोटी बातों को किस तरह अपनी प्रतिष्ठा से जोड़कर अखबारों का दु्रुपयोग करते है यह जानिये। जान लीजिए.. पाठक और अखबार बड़ा नहीं होता, पत्रकारों की गुन्डई बड़ी होती है। जान लीजिए, मकसद बड़ा नहीं होता, अपना स्वार्थ बड़ा होता है। जान लीजिए, कमिश्नर और उसकी लोकतन्त्र में भूमिका बड़ी नहीं होती, वो पत्रकार बड़ा होता है जो खेल नहीं पाता, तो अपने अखबार को ताक पर रखकर खेल खराब कर देता है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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