हिमालय में आईआईएमसी और पुरानी यादों का रोमांच

लोहाघाट : रोज की तरह ये भी एक खुशनुमा दिन था। हल्की बरसात के बाद पारा करीब 15 डिग्री के निशान तक पहुंचा हुआ था। यहां स्वेटर-जैकेट पहनकर दिल्ली के मौसम को याद करना काफी अजीब का एहसास दे रहा था। इसी दिन मेरी मुलाकात केंद्रीय विद्यालय, लोहाघाट के प्रधानाचार्य डॉ. एचपी सिंह के साथ हुई। रामनगर में मेरे दोस्त गणेश रावत की बदौलत हमारा संपर्क हुआ। डॉ. सिंह पिछले दो साल से यहां नियुक्त हैं। उत्तराखंड के चंपावत जिले का लोहाघाट मेरा गृहनगर है, और मैं दो दिन पहले ही दिल्ली ये यहां पहुंचा था। आप कहेंगे .. ‘तो! इसमें क्या खास बात है’।

दरअसल डॉ. एचपी सिंह से मेरी ये मुलाकात करीब चौदह साल बाद हुई। हितेंद्र प्रताप सिंह और मैं भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली (IIMC) से साथ-साथ पासआउट हुए, वर्ष 1997-98 का बैच था। तब के बाद ये पहली मुलाकात है। IIMC के दिनों के किसी दोस्त का यूं दिल्ली से सैकड़ों किलोमीटर दूर, दुर्गम पहाड़ी कस्बे, वो भी मेरे अपने लोहाघाट में मिलना एक अनूठा संयोग है, सुखद आश्चर्य। देवदार के पेड़ों के पास ठंडी हवाओं के झोंकों के बीच घंटों बातें होती रहीं, पुराने फोटोग्राफ्स को नई नजर से कई बार उलट-पलट कर देखा। श्री जांगिड़ सर के साथ खींचे गये दीक्षांत समारोह के फोटोग्राफ्स में खुद को, दोस्तों को खोजा। लगा कि कोई विज्ञान कथा हकीकत बन गई है और किसी टाइममशीन ने हमें चौदह साल पीछे के बेहतरीन वक्त में लौटा दिया है। एक ऐसा वक्त जहां अनंत उम्मीदों की लहरों वाले सागर का शोर रहता था। बातों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा था, कटवारिया सराय, बेरसराय से लेकर आईटीओ और आईएनएस बिल्डिंग की बातें, ज़ी न्यूज से लेकर दैनिक जागरण तक का हाल।

हितेंद्र को सहपाठी दोस्तों के बारे में जानने की बेचैनी थी तो मुझे जल्द से जल्द बताने का उल्लास। शंभू झा कहां है, पंकज झा कहां है, संजय मिश्रा, जयप्रकाश कहां है। हितेंद्र के सवालों का सिलसिला तेज होता गया। मैं भी मानो समूची याददाश्त तो बस उड़ेल देना चाह रहा था। सुदूर पहाड़ों में चौदह साल बाद IIMC के दिनों को याद करना एक अजीब सा रोमांच था। राठौर, आकाश, अविनाश, महेंद्र, मुनेंद्र, रामकेश, अतुल, अमित के बारे में बातें हुईं। अनवर, अभिरंजन, समरेंद्र, शंभूनाथ, प्रणय, बृजमोहन, बृजपाल, तड़ित, नवीन की खोजखबर ली गई। शिल्पी, दीप्ति, निवेदिता, सोनाली, चंद्रप्रकाश, परमानंद, मनोज, विनोद, शशि, ओमप्रकाश, दुर्गेश का हालचाल।

बातों का सिलसिला चलता रहा, घंटों बीत गये। यूं तो हमेशा लोहाघाट आकर मुझे एक नई ऊर्जा मिलती रही है लेकिन इस बार कुछ और भी मिला। मुझे नहीं मालूम कि हितेंद्र से मेरी मुलाकात दिल्ली की आपाधापी में कहीं बसों में, मेट्रो में या किसी न्यूज रूम की दमघोंटू चकाचौंध के बीच होती, तो क्या तब भी ऐसा ही एहसास होता, पता नहीं। तब शायद ना इतना वक्त होता, लोहाघाट के ये खूबसूरत देवदार के पेड़ ना होते और मई के महीने में हम लोग स्वेटर पहनकर फुर्सत से घूम नहीं रहे होते। दिल्ली में चौदह सालों की नौकरी का वनवास खत्म होने के बाद ही मुझे ये फुर्सत नसीब हो पाई है। जिस शहर में हमारी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा नौकरी खोजने, नौकरी बचाने या नौकरी हड़पने की कवायद में खर्च हो रहा हो वहां शायद इस तरह के अहसासों की ना कोई कीमत है और ना ही कोई जरूरत।

ये मेरा सौभाग्य ही है कि लोहाघाट में स्कूली तालीम की एक नई जमीन तैयार हो रही है और इसमें मेरे सहपाठी दोस्त ने अपनी काबिलियत का बखूबी इस्तेमाल किया है। डॉ. एचपी सिंह की पहचान समूचे क्षेत्र में बेहद अनुशासित, ईमानदार और जनसरोकारों से जुड़े अफसर के तौर पर है, शायद यही उनकी सबसे बड़ी पूंजी भी है। जाहिर है, अनुभव और ज्ञान हमेशा ही अपना असर दिखता है। मित्र गणेश रावत का एक बार फिर से आभार, और सभी दोस्तों को लोहाघाट भ्रमण का हार्दिक आमंत्रण।

लेखक श्रीनिवास ओली पत्रकार हैं. इनसे संपर्क मोबाइल नम्‍बर 09412097000 के जरिए किया जा सकता है.

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