हिम्मत और हुनर से मैं मसाले बेचकर भी मिसाल बन गया

जमाने में बंटवारा एक पुराना दस्तूर है। न जाने यह कब से चला आ रहा है और कोई नहीं जानता कि यह कब तक चलेगा। कोई घर बांटता है, तो कोई दुकान बांटता है। नए जमाने में मां-बाप को भी बांटने का रिवाज है। मैं ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं हूं, इसीलिए नहीं जानता कि कौनसी चीज बंटवारे के लिए बनी है। अजीब लगता है यह सोचकर कि मुल्क का भी बंटवारा होता है।

हिंदुस्तान आजाद क्या हुआ कयामत आ गई। इनसान का एक चेहरा छुपा हुआ भी होता है, यह उसी दिन मालूम हुआ। तब सोचना पड़ता था जान बचाने के लिए कि हर-हर महादेव चिल्लाऊं या अल्लाहो अकबर के नारे लगाऊं! वक्त बीत गया लेकिन वो दर्द आज भी है। बंटवारा मुल्क का हुआ था, इसलिए सरहद पार के उस घर को यहां कैसे ले आता जिसकी मिट्टी में खेलकर मैं बड़ा हुआ था। जिंदगी के कई रंग देखे लेकिन साल 47 के वे रंग सबसे ज्यादा डराते हैं। दुआ करता हूं कि किसी की जिंदगी में ऐसा कोई दिन न आए जब उसे खुद के ही देश में शरणार्थी बनकर गुजारा करना पड़े।

लोग अपने डिग्री-डिप्लोमा लेकर भाग रहे थे, लेकिन मैं क्या लेकर भागूं? मेरे पास तो वह भी नहीं थे। पांचवीं जमात के बाद कभी स्कूल नहीं गया। कुछ ज्यादा अक्लमंद लोग हमेशा अपनी जेब में ताला लेकर घूमते थे। कोई भी अच्छी-खासी हवेली मिली, कब्जा कर लिया। मुझे घर छोड़ना पडा, आखिर आजादी की एक कीमत जो चुकानी होती है। घर के ढोर-जानवर छोड़ने पड़े क्योंकि इनसान नाम के एक प्राणी ने सरहद पर ऐसे इंतजाम कर दिए कि जो जिंदा निकल गया, समझो बड़ा खुशनसीब है। इन सबसे कहीं ज्यादा गम इस बात का है कि मैं मेरी जिंदगी के हिस्से की कई यादें उस पार छोड़कर आ गया।

भारत आने के बाद मेरे परिवार ने दिल्ली को अपना बसेरा बनाया। नहीं मालूम था कि अब क्या करेंगे? कैसे जिंदगी की गाड़ी आगे बढ़ेगी? एक बार तो लगता था कि अब कुछ नहीं होने वाला। इन्हीं दिल्ली की गलियों में एक दिन भटकते हुए मर जाऊंगा। दिल्ली में बड़ा शोर था लेकिन मेरे जेहन में खामोशी थी। मेरे साथ आए कई लोगों के पास ऊंची तालीम की डिग्रियां थीं, इसलिए वे किसी अच्छी नौकरी की उम्मीद कर सकते थे। अंग्रेजी बोलने का तजुर्बा था इसलिए बाबू लोगों पर रौब जमा सकते थे। मेरे पास तो ये दोनों ही नहीं थे लेकिन पेट को इन बातों की परवाह नहीं थी। वह तय वक्त पर अपने हिस्से की रोटी मांग लेता। मैं उसे कैसे समझाता कि कुछ दिन सब्र करना सीख ले!

आखिर एक दिन मैंने तय किया कि मुझे भी कोई काम करना चाहिए। मैं कर भी क्या सकता था? बहुत सोचने के बाद मैंने योजना बनाई कि मैं अब तांगा चलाऊंगा। इस समय यही एक काम है जिसे मैं कर सकता हूं। मैं दिनभर सवारियां ढोता और आवाज लगाता – दो आने में, पहाड़गंज… साब। मेरे बोलने के लहजे से लोगों को साफ मालूम होता कि यह इस पेशे में नया आया है। काफी दिनों बाद मेरे परिवार ने मिर्च-मसालों की एक छोटी-सी दुकान लगानी शुरू की।

बात दूं कि बंटवारे से पहले भी हमारी मसालों की दुकान थी। मैं बचपन से ही मसालों की पिसाई और बिक्री से जुड़ी तमाम बातों को करीब से देखता आया हूं। हमने एक बार फिर इसी काम में किस्मत आजमाने का फैसला किया। भले ही इस काम की मेरे पास कोई डिग्री नहीं थी लेकिन जो अनुभव था वह किसी भी डिग्री से कहीं ज्यादा बड़ा था। सरहद पार से मैं मसालों की समझ के अलावा और कोई बड़ी चीज लेकर नहीं आया। इसके अलावा मेरे पास कोई पूंजी नहीं थी। दिल्ली में छोटी-सी दुकान से शुरू हुआ यह सफर आज देश-दुनिया में एमडीएच मसालों के नाम से जाना जाता है। दिल्ली की गलियों से गुजकर कोई मामूली तांगेवाला एमडीएच जैसी कंपनी बना सकता है!! यह सच में ताज्जुब की बात है, लेकिन यह पूरी तरह सच है। मैंने कई घरों की थाली का जायका बदला। असल में मैं एक पेंटर हूं जो हर घर की रसोई में स्वाद का रंग भरना चाहता है।

दिल्ली के वे रास्ते मुझे आज भी याद हैं जिन पर मैं कभी तांगा चलाया करता था। इस दौरान काफी-कुछ बदल गया। गांव बड़े शहर और शहर महानगर बन गए। लेकिन एक चीज आज भी नहीं बदली। वह है मेरे मसालों का स्वाद। हालात ने मुझे शरणार्थी और तांगे वाला बना दिया था। कुछ लोग कहते हैं हिम्मत और हुनर से मैं मसाले बेचकर भी मिसाल बन गया।

चलते-चलते

इन दिनों मैं एक किताब ‘तांगेवाला कैसे बना मसालों का बादशाह’ पढ़ रहा हूं। इसके लेखक एमडीएच मसाला कंपनी के मालिक धर्मपाल गुलाटी हैं। सिर्फ पांचवीं तक पढ़ा कोई व्यक्ति पाकिस्तान में अपना सबकुछ लुटाकर लगभग खाली हाथ दिल्ली आता है और एक दिन अपनी मेहनत के बल पर मिसाल बनता है। किताब युवाओं के लिए काफी प्रेरणादायक है। ऊपर मैंने भारत-पाक विभाजन और एक तांगेवाले द्वारा कंपनी के निर्माण की बात खुद के शब्दों में लिखी है। किताब पूरी पढ़ने के बाद अगला लेख प्रकाशित करूंगा। तब तक के लिए… राम-राम सा।

राजीव शर्मा

संचालक: गांव का गुरुकुल

ganvkagurukul.blogspot.com

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