हेमचंद्र पांडे की दूसरी बरसी पर गौतम नवलखा बताएंगे पत्रकारिता की हालत

: 2 जुलाई को आयोजित है व्‍याख्‍यान : इस साल का हेमचंद्र पांडे मेमोरियल लेक्चर जाने-माने नागरिक अधिकार कार्यकर्ता और ईपीडब्ल्यू के संपादकीय सलाहकर गौतम नवलखा देंगे. दूसरा हेम चंद्र पांडे स्मृति व्याख्यान 2 जुलाई, 2012 को है. वक़्त है शाम 4.30 बजे. स्थान- जवाहर लाल नेहरू नेशनल यूथ सेंटर (जीपीएफ़ के नज़दीक), दीन दयाल उपाध्याय मार्ग, आईटीओ, दिल्ली. विषय: भारतीय लोकतंत्र, जनाधिकार और पत्रकारिता की हालत.

हेम चंद्र पांडे आज हमारे बीच नहीं हैं. लेकिन जिस रास्ते पर चलते हुए उन्होंने अपनी जान दी उसे भारतीय पत्रकारिता में एक मिसाल के तौर पर याद किया जा सकता है. आज देश में पत्रकारिता ख़रबों का धंधा बन चुकी है. उसमें काम करने वालों से हमेशा पेशेवर होने की मांग की जाती है. इस पेशे को कुछ इस तरह से समझाया जाता है कि जैसे पत्रकार समाज से बिल्कुल कटा हुआ प्राणी है और उसे घटनाओं को जैसे का तैसा रिपोर्ट कर देना है, बस. हेम कॉरपोरेट की तरफ से प्रचारित ऐसी पत्रकारिता के ख़िलाफ़ थे. हेम लोगों की तकलीफ़ों को अपनी लेखनी का विषय बनाते थे. ज़रूरत पड़ने पर जन-आंदोलनों में भी शरीक होते थे. पत्रकारिता में निष्पक्षता की दुहाई देकर धन्ना सेठों का पक्ष लेने वाली अभिजात पत्रकारिता के ख़िलाफ़ आम जनता के पक्ष में खड़े पत्रकार थे.

जब दो जुलाई दो हज़ार दस को आंध्र प्रदेश पुलिस ने हेम को भाकपा (माओवादी) प्रवक्ता आज़ाद के साथ फ़र्जी मुठभेड़ में मार डाला तो उनकी व्यापक सामाजिक सक्रियता का ही नतीज़ा था कि अन्याय के ख़िलाफ़ बड़ी संख्या में लोग सामने आए. पत्रकारों और न्यायपसंद लोगों ने फर्जी मुठभेड़ की कहानी को खुली चुनौती दी. फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग के लिए गई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, वकीलों और पूर्व न्यायाधीशों की एक टीम ने फर्जी मुठभेड़ के सारे सुबूत इकट्ठा किए. हत्याकांड की निष्पक्ष जांच की मांग हुई, लेकिन सरकार जांच के लिए तैयार नहीं हुई. बाद में सर्वोच्च अदालत के आदेश पर सरकार को सीबीआई जांच के लिए तैयार होना पड़ा. तब भी सवाल उठा था कि जब गृह मंत्री ही हेम और आज़ाद के क़त्ल का आरोपी हो तो उसके मातहत काम करने वाली सीबीआई कैसे निष्पक्ष जांच करेगी? आख़िरकार वही हुआ जो होना था. कुछ दिन पहले सीबीआई ने जांच की औपचारिकता निभाकर सर्वोच्च न्यायालय में कह दिया है कि हेम और आज़ाद को पुलिस ने असली मुठभेड़ में मारा था.

इस मामले में अदालती कार्यवाही के दौरान एक बार सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि गणतंत्र अपने बच्चों की हत्या की इजाज़त नहीं दे सकता. उसने सीबीआई को इस मामले की जांच करने का आदेश दिया. तब हेम की मां रमा पांडे ने भावुक होकर अदालत की इस टिप्पणी को न्याय की उम्मीद की तरह देखा था. लेकिन सीबीआई और अदालत ने मुठभेड़ को असली ठहराकर इंसाफ़ की आस लगाए एक मां की उम्मीद पर पूरी तरह पानी फेर दिया है. लेकिन न हेम की मां और न ही हम इस झूठ को मानने को तैयार हैं. हम इतना ज़रूर समझते हैं कि अपने से असहमत बच्चों के प्रति ये गणतंत्र कितना क्रूर है इसका अमुमान हेम चंद्र पांडे की हत्या से लगाया जा सकता है. व्यवस्था से असहमति रखने वालों को सींखचों के पीछे डालने और मिटा देने का चलन दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है. इलाहाबाद की पत्रकार और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता सीमा आज़ाद और उनके पति विश्व विजय को उम्र क़ैद की सज़ा इसकी ताज़ा मिसाल है.

ऐसे दौर में, हेम को याद करने का मतलब हर तरह के अन्याय के ख़िलाफ़ एकजुट होना है. असहमति के अधिकार के लिए लड़ना है. हेम की मौत के बाद उनके पुराने साथियों और हम-ख़्याल पत्रकारों ने मिलकर हेम चंद्र पांडे मेमोरियल कमेटी बनाई थी. तब हमने तय किया था कि हेम के आदर्शों को ज़िंदा रखने के लिए हर साल उनके शहादत दिवस पर एक व्याख्यान करवाएंगे. इस बहाने भारतीय समाज, राजनीति और पत्रकारिता के रिश्तों पर बात की जाएगी और बेहतर समाज का विकल्प तलाशने की कोशिश भी जारी रहेगी. इस बार दूसरा हेम स्मृति व्याख्यान होना है.

पहला व्याख्यान वरिष्ठ पत्रकार और लेखक सुमंता बनर्जी ने दिया था. उन्होंने पत्रकारिता और जन- पक्षधरता पर बात करते हुए कहा था कि “हेम एक्टिविस्ट पत्रकारों की उस परंपरा में आते हैं जो जॉन रीड, एडगर स्नो, जैक बेल्डेन, हरीश मुखर्जी, ब्रह्मा बंधोपाध्याय से लेकर सरोज दत्त तक फ़ैली है. इस परंपरा में वे अज्ञात किंतु सचेत पत्रकार भी शामिल हैं जो हमारे देश के अलग-अलग हिस्सों में न्याय के पक्ष में साहस के साथ खड़े हैं.” इस बार हमने  जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों के पक्ष में मजबूती से खड़े रहने वाले नागरिक अधिकार कार्यकर्ता और इकोनोमिट एंड पॉलिटिकल वीकली के सलाहकार संपादक गौतम नवलखा को भारतीय लोकतंत्र, जनाधिकार और पत्रकारिता की हालत पर बोलने के लिए बुलाया है. दूसरे हेम मेमोरियल लेक्चर में आपकी मौज़ूदगी असहमति की हत्या करने वालों के ख़िलाफ़ एक राजनीतिक टिप्पणी की तरह होगी.

हेम चंद्र पांडे मेमोरियल कमेटी की तरफ़ से भूपेन सिंह द्वारा जारी.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *