अंतत: बरेली के गंगाशील अस्पताल का भट्टा बैठ गया। उसका रजिस्ट्रेशन निरस्त कर 250 शैय्याओं वाले इस अस्पताल को 24 घंटे में खाली करने का अल्टीमेटम दिया गया है। अन्यथा यह सीज कर दिया जाएगा। इसी के साथ दर्ज दो मामलों को गंभीर प्रकृति का कर दिया गया है । कथित दुराचार के आरोपी भाईयों के खिलाफ मामले को बढा कर गैंग रेप का कर दिया गया है।
पीडिता के परिवार को फोन पर धमकाने के आरोप में अस्पताल के मालिक डा. निशांत गुप्ता के खिलाफ दो दिन पहले दर्ज की गयी एनसीआर को संज्ञेय अपराध की धारा में बदल दिया है। डा. निशांत गुप्ता , डा. शालिनी गुप्ता और मामले में लपेटे गये अन्य लोगों की गिरफ्तारी को पुलिस टीमें दौड रही हैं। इन्हें और अस्पताल को अब अदालत का ही सहारा है।
एक तरफा दबाव बनाने की तेजी और तज्जनित प्रशासनिक हठधमिर्ता से कुछ नये सवाल खडे हो गये हैं। यह अस्पताल उन कुछ अग्रणी अस्पतालों में शामिल है जिनसे बरेली महा नगर की पहचान है। समुन्नत आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं के चलते यहां बरेली संभाग के जिलों के अतिरिक्त कुमाऊं तक के मरीज आते रहे हैं। क्या ताबड़तोड़ कार्रवाइयों के बम गिराते हुए 24 घंटे में इसे बंद करने का फरमान देना उचित है?
ऐसी मारक कार्रवाई की तो तब अपेक्षा रहती है जब अस्पताल किसी या किन्ही गंभीर आपराधिक गतिविधियों में लिप्त हो और जांच में दोषी पाया जाय। प्रश्नगत मामले में तो प्रबंधन पर अस्पताल के एक कक्ष में अटेंडेंट के साथ वहीं के एक कर्मचारी पर दोपहर दो ढाई बजे दुराचार और उसके भाई पर दरवाजा बंद कर इसमें सहयोग करने का ही आरोप है। संड डे होने की वजह डा निशांत गुप्ता , उनकी पत्नी डा. शालिनी माहेश्वरी और अन्य प्रमुख डाक्टर अस्पताल में नहीं थे।
निशांत और डा. शालिनी पर इस कथित घटना को दो दिन दबाये रखने और समझौते के लिए दबाव बनाने का ही आरोप है । इसके बावजूद अस्पताल और उसके प्रबंधन के खिलाफ हुई कार्रवाई यह ध्वनि देती है जैसे डा.निशांत गुप्ता इस दुराचारी घटना में स्वंय शामिल रहे हों और अस्पताल संगठित आपराधिक कृत्यों का अड्डा हो। अस्पताल प्रबंधन का पक्ष न सुना जाना प्रशासन के पूर्वाग्रही अतिरेक को ही दर्शाता है । पूरा मामला पीड़िता की समुचित सहायता, दोषियों को उनके अपराधानुसार दंडित कराने से ज्यादा अस्पताल को बर्बाद कर देने की ओर मुड गया लगता है ।
अस्पताल में 20 -22 अच्छे डाक्टर और डेढ दो सौ कर्मचारी कार्यरत बताये जाते हैं । अपरोक्ष रूप से कई अन्य परिवारों की आजीविका का आधार भी यह अस्पताल है। अस्पताल में वेंटीलेटर वगैरह में रखे गये गंभीर रूप से बीमार करीब एक दर्जन मरीज भर्ती हैं। 24 घंटे में अस्पताल को समेट लेने के आदेश से इन सब का क्या होगा। कहां जायेंगे अस्पताल के डाक्टर , कर्मचारी और मरीज ? क्या यह भी एक मानवीय पहलू नहीं है? बताते हैं कि अस्पताल पर 80 – 82 लाख रुपये का कर्ज है। बैंक -किश्तें हैं। यह एक ऐसा मामला हो गया है जिसके विभिन्न पक्षों पर विचार-चिंतन है। ताकि मीडिया , प्रशासन -पुलिस , अस्पतालों और जिम्मदार नागरिकों की भूमिका समाज निर्माण में रचनात्मक ही रहे तथा और रचनात्मक बने।
वरिष्ठ पत्रकार शंभू दयाल बाजपेयी के फेसबुक वॉल से.
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